देश को नाज, लेकिन शहीद को गांव में 3 डिसमिल जमीन मयस्सर नहीं

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संतोष कुमार सिंह

देश बदल रहा है। आगे बढ़ रहा है। गांव भी अब मॉडल हो गया है यानी आदर्श। लेकिन ये सब सिर्फ नारे मात्र ही लगते हैं। जब वह देश, वह गांव इस बदलाव के झूठे नारों के बीच अपने शहीद के लिए 3 डिसमिल जमीन भी देने को तैयार नहीं होता। सिर्फ इसलिए वो शहीद तो था,लेकिन नट था। बेघर। बेजमीन। जिसके पास देश के लिए शहीद होने का जज्बा तो था,लेकिन गांव की सोच को कैसे बदले। जातीवादी बेड़ियों को कैसे तोड़े। और लता मंगेशकर का वो गीत जिसे सुनकर सुना है नेहरू रो पड़े थे। ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आंखो में भर लो पानी..जो शहीद हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी। लेकिन पानी कहां से आएं। आखों का पानी मर जो गया। और कुर्बानी भले ही देश को याद रहे,लेकिन अपने गांव के लिए वो शहीद कहां। निचली जाती का है।

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कुछ ऐसा ही घटित हुआ जम्मू-कश्मीर के पंपोर में सीआरपीएफ पर हुए हमले में शहीद जवान वीर सिंह के साथ। हेड कॉन्स्टेबल वीर सिंह उन 8 जवानों में थे, जिनकी जान शनिवार को पम्पोर आतंकी हमले में चली गई। उत्तर प्रदेश के शिकोहाबाद स्थित नागला केवल गांव में सार्वजनिक जमीन पर शहीद वीर सिंह के अंतिम संस्कार के लिए इजाजत देने से इनकार कर दिया। वीर सिंह यहीं के रहने वाले थे। गांव की ऊंची जति के लोगों ने शहीद की नट जाति को इसकी वजह बताया। अंतिम संस्कार में उनकी जाति को लेकर हंगामा हो गया। उनके पैतृक गांव के पास श्मशान में दबंग और ऊंची जाति के लोगों ने अंतिम संस्कार की इजाजत देने से मना कर दिया।

जिला प्रशासन की दखल के बाद हुआ अंतिम संस्कार

मामले की सूचना मिलने के बाद स्थानीय प्रशासन को इसमें दखल देना पड़ा। जिला पदाधिकारी के सामने आने के बाद गांव वालों को सहमत किया गया. इसके बाद 10 गुना 10 मीटर की जमीन शहीद के अंतिम संस्कार के लिए दी जा सकी। वीर सिंह के घर वाले उनकी मूर्ति भी लगवाना चाहते थे। लेकिन गांव वालों ने ये भी नहीं करने दिया. ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ से बात करते हुए ग्राम प्रधान विजय सिंह ने बताया, ‘शहीद का परिवार सरकारी जमीन पर शहीद का दाह संस्कार करना चाहता था और उनकी मूर्ति लगवाना चाहता था। गांव वाले इस पर राजी नहीं थे। लेकिन एसडीएम से बातचीत के बाद, गांव वाले मान गए।’

लगभग 80 वर्ष की उम्र में फिरोजाबाद में रिक्शा चलाकर भरण—पोषण कर रहे शहीद वीर सिंह के पिता रामसनेह ने कहा कि, ‘मेरे बेटे ने देश की जमीन की रक्षा के लिए जान दे दी। लेकिन यहां उसके अपने लोग उसकी लाश जलाने के लिए 10 मीटर की जमीन नहीं दे रहे। मुझे नहीं पता अब उसके बच्चों का ख्याल कौन रखेगा।’

 

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