बाल शिक्षा में हुई प्रगती, समानता के लिए और निवेश की दरकार,तेज हो रफतार: यूनिसेफ

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            दुनिया के सबसे अधिक उपेक्षित बच्चों पर गरीबी, निरक्षरता और अकाल मृत्यु का साया: यूनिसेफ

संतोष कुमार सिंह

नई दिल्ली,– गोली चलने की आवाज। रोनिबला और उनके साथ खड़े बच्चे थोड़ा पीछे हट जाते हैं। तभी एक मासूम सी दिखने वाली बच्ची की आवाज गूंजती है। मैं रोनिबला मणिपुर से आईं हूं।। रोनिबला की मांग है कि मणिपुर में आफसपा खत्म किया जाए। क्योंकि इसी आफसपा उनके पिता को उनसे मात्र 8 साल की उम्र में ही छीन लिया। कहती हैं..पिता रिक्शा चलाते थे। एक दिन गांव गये थे। उसी दौरान गोलीबारी में मारे गए। तब से मां ही पूरे परिवार का भरण पोषण करती है। हम सब उनकी मदद करते हैं। लेकिन रोनीबला के मन में सवाल है। हमें समानता का अधिकार क्यों नहीं? बच्चों के बीच भेदभाव क्यों? कुछ इसी तरह के सवाल बिहार से आने वाले विशाल के मन में है। कहते हैं,हममें अच्छाई देखे, बच्चों से स्कूलों में भेदभाव ठीक नहीं। हरियाणा से आयी लड़की के मन में सवाल है, लड़को के लिए पीटीएस क्यो? हमारे लिए होम साईस क्यों? किसी बच्चे की शिकायत है स्कूल घर से काफी दूर है। कुछ बच्चे कहते हैं जातीगत भेदभाव के कारण नहीं पढ़ पाते। मौका है यूनिसेफ इंडिया द्वारा जारी स्टेट आफ द वल्र्ड रिपोर्ट का।

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यूनिसेफ की प्रमुख वार्षिक रिपोर्ट द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रेन के अनुसार मौजूदा रुझानों के मुताबिक वर्ष 2030 तक पांच वर्ष से कम की उम्र के 6.9 करोड़ बच्चों की मौत ऐसी वजहों से होगी, जिनका निवारण किया जा सकता था। इसी अवधि तक 16.7 करोड़ बच्चे गरीबी में जीवन गुजारेंगे और 75 करोड़ महिलाओं का बाल विवाह कर दिया जाएगा। प्रत्येक वर्ष यूनिसेफ द्वारा जारी होने वाली यह रिपोर्ट थोड़ा डराती है, लेकिन उम्मीद भी जगाती है यदि हम जगे रहे और अपना दायित्व समझ पाये तो लाखों बच्चों के जीवन में खुशियां दौर सकती हैं और उनके जीवन का फेयर स्टार्ट हो सकता है, जो कि उनका हक है। इस भयावह स्थिति से बचने के लिए पूरी दुनिया को अपने इन सबसे वंचित बच्चों की दुर्दशा पर पहले से अधिक ध्यान देना होगा। गौरतलब है कि वर्ष 2030 को सतत विकास के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए समय सीमा के तौर पर निर्धारित किया गया है। अगर सरकारों, दानदाताओं, कारोबारी संस्थाओं और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने दुनिया के सबसे गरीब बच्चों की जरूरतों को पूरा करने के अपने प्रयासों को तेज नहीं किया, तो उनके भविष्य की तस्वीर बेहद डरावनी हो सकती है।

रिपोर्ट की मुख्य बातें

यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक पहले से अधिक बच्चों को स्कूलों से जोड़ा गया है और लोगों को गरीबी से मुक्ति दिलाने के कार्य में भी काफी तेजी आई है। वर्ष 1990 से अब तक पूरी दुनिया में पांच वर्ष से कम की उम्र के बच्चों की मृत्यु दर आधे से भी कम रह गई है। 129 देशों में प्राथमिक स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों में लड़कों और लड़कियों की संख्या बराबर है। वर्ष 1990 की तुलना में पूरी दुनिया में बेहद गरीबी में गुजारा करने वाले लोगों की तादाद भी लगभग आधी रह गई है।

लेकिन साथ ही यह रिपोर्ट यह भी दर्शाती है कि पांच वर्ष की उम्र से पहले मरने वाले गरीब बच्चों की संख्या दोगुनी हो गई है। यह सबसे गरीब बच्चे सबसे अमीर बच्चों की तुलना में काफी लंबे समय से कुपोषित भी हैं। इस रिपोर्ट ने अफ्रीका के उप सहारा क्षेत्र तथा दक्षिण एशिया में रहने वाले पांच वर्ष से कम की उम्र के बच्चों से जुड़े एक दिलचस्प तथ्य को उजागर किया है। ऐसा पाया गया है कि इन इलाकों में माध्यमिक शिक्षा हासिल कर चुकी माताओं के बच्चों की तुलना में अशिक्षित माताओं के बच्चों की मौत का आंकड़ा लगभग तीन गुना ज्यादा है। अमीर घरों की लड़कियों की तुलना में गरीब घरों की लड़कियों की बचपन में ही शादी किए जाने की संभावना भी दोगुनी होती है।

बच्चों के बीच भेदभाव कम करनें में शिक्षा अहम

बच्चों के बीच के अंतर को पाटने में शिक्षा काफी अहम भूमिका निभाती है। लेकिन, वर्ष 2011 से स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों की संख्या में वृद्धि हुई है। स्कूल नहीं जाने वाले इन बच्चों का एक बड़ा हिस्सा पढ़ाई-लिखाई से दूर है। पूरी दुनिया में आज करीब 12.4 करोड़ बच्चे प्राथमिक अथवा निम्न माध्यमिक स्तर के स्कूलों में पढ़ने नहीं जाते हैं। इसके अलावा लगभग 5 में से 2 ऐसे बच्चे, जिन्होंने प्राथमिक स्कूलों की पढ़ाई पूरी कर ली है, उन्होंने पढ़ना-लिखना या सरल गणित भी नहीं सीखा है।

Pic1दिख रहा है सर्वशिक्षा अभियान का असर

सर्व शिक्षा अभियान के माध्यम से बच्चों का स्कूल जाना सुनिश्चित किया गया है और शिक्षा के अधिकार को कानून लागू किया गया है। इसका असर प्राथमिक शिक्षा के लिए होने वाले नामांकनों पर दिखने लगा है, जिसका आंकड़ा लगभग 100 प्रतिशत के करीब पहुंच चुका है। इसके अलावा स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों की संख्या में भी लगातार गिरावट हुई है। वर्ष 2009 में 6 से 13 वर्ष की उम्र के स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों की संख्या लगभग 80 लाख थी। वर्ष 2014 में यह संख्या घट कर 60 लाख रह गई है। हालांकि चुनौतियां अभी समाप्त नहीं हुई हैं। वर्ष 2014 में भारत में 3 से 6 वर्ष की उम्र के बीच के 7.4 करोड़ बच्चों में से लगभग 2 करोड़ बच्चे किसी तरह की प्री-स्कूल शिक्षा नहीं ग्रहण कर रहे थे। यह बच्चे ऐसे गरीब और पिछड़े परिवारों से संबंध रखते हैं, जो अक्सर पीछे छूट जाते हैं।.

सर्वाधिक गरीब बच्चों पर निवेश बढ़ाने की जरूरत

असमानता ना तो अजेय है और ना ही अपरिहार्य। बच्चों के बीच की असमानता को दूर करने में कई उपाय मददगार साबित हो सकते हैं। जैसे कि सबसे कमजोर बच्चों का बेहतर डेटा एकत्र कर, जिन चुनौतियों का सामना बच्चे करते हैं उनका एकीकृत समाधान करके, पुरानी समस्याओं को हल करने के नए तरीके अपना कर, अधिक न्यायसंगत निवेश करके और समुदायों की भागीदारी को बढ़ा कर इसे दूर किया जा सकता है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सबसे कमजोर बच्चों में निवेश करके तात्कालिक और दीर्घकालिक लाभ हासिल किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, पूरी दुनिया में नकद हस्तांतरण की वजह से बच्चे स्कूलों में ज्यादा वक्त व्यतीत करने लगे हैं और ऊंची कक्षाओं तक शिक्षा हासिल करने लगे हैं। कोई बच्चा जितने अतिरिक्त वर्षों तक शिक्षा ग्रहण करता है, उसके अनुपात में उसकी कमाई में औसतन लगभग 10 प्रतिशत की वृद्धि होती है। इसी तरह देश के युवा जितने अतिरिक्त वर्षों की स्कूली शिक्षा पूरी करते हैं, उसके अनुपात में देश की गरीबी की दर में औसतन 9 प्रतिशत की गिरावट होती है।

किसने क्या कहा

यूनिसेफ के कार्यकारी निदेशक एंथनी लेक ने कहा, “लाखों-करोड़ों बच्चों को जीवन में एक उचित मौका नहीं देने से सिर्फ उनका ही भविष्य खतरे में नहीं पड़ता, बल्कि इससे वंचितों की पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाले दुष्चक्र को ईंधन मिल जाता है। यह दुष्चक्र वंचित समाज के भविष्य को संकट में डाल देता है।एंथनी ने यह भी कहा, “हमें कोई एक विकल्प चुनना होगा: या तो इन बच्चों में अभी निवेश किया जाए या अपनी दुनिया को और अधिक विषम और विभाजित बनने के लिए छोड़ दिया जाए।”

इस रिपोर्ट को जारी करते हुए यूनिसेफ इंडिया के प्रतिनिधि लूई-जॉर्ज अर्सेनॉल्ट ने कहा, “जीवन के शुरूआती साल इसे आधार प्रदान करते हैं, इसलिए जो बच्चे देर से सीखना शुरू करते हैं, वे पीछे छूट जाते हैं। विशेष तौर पर जब सबसे पिछड़े तबके के और वंचित बच्चे अच्छी प्री-स्कूल शिक्षा के बिना किसी स्कूल में प्रवेश करते हैं, तब इसका दीर्घकालिक दुष्परिणाम नजर आता है। आगे चलकर शिक्षा के मामले में वंचित बच्चों और अन्य बच्चों के बीच की खाई को पाटना मुश्किल होता चला जाता है।”

गौरतलब है कि शिक्षा को सामाजिक समानता बढ़ाने का मुख्य औजार मानते हुए भारत में लॉन्च की गई इस रिपोर्ट के केंद्र में शिक्षा को रखा गया था। यूनिसेफ द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के सचिव डॉ. एस.सी खुंटिया, भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के संयुक्त सचिव डॉ. राजेश कुमार, दिल्ली स्थित अम्बेडकर यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफेसर श्याम मेनन और शिक्षा, नीति, नागरिक समाज, सीएसआर प्रमुख तथा मीडिया के क्षेत्र से जुड़ी कई अन्य गणमान्य हस्तियां भी उपस्थित थीं।

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