हमारे नीति निर्माता जिस तरह से बाजार या शहर के बीच से भीड़-भाड़ को कम करने के लिए बाईपास सड़क बनाते हैं वैसे ही किसानों को बाईपास करके आगे बढ़ने की प्रवृति बढ़ी है। हम देखते है कि पूरी आर्थिक सुधार की प्रक्रिया खेती को बाईपास करके आगे निकल गई है।
संतोष कुमार सिंह
नयी दिल्ली: ऐसा नहीं है खेती में कुछ भी नहीं बदला। अन्य पेशों की तरह इसमें समृद्धी नहीं आई लेकिन दुर्भाग्य से समुद्र मंथन में जो भेदभाव हुआ था, और कुछ लोगों को अमृत मिला और ज्यादातर लोगों को विष। इसी भेदभाव की प्रक्रिया से कृषि क्षेत्र को भी गुजरना पड़ रहा है। उपरोक्त बातें प्रो आनंद प्रधान ने अमर शहीद स्मृति समारोह 2016 के अवसर पर गांधी शांति प्रतिष्ठान में आयोजित परिचर्चा,’उदारीकरण के दौर में खेती किसानी’ विषय पर कही।
प्रो प्रधान ने आंकड़ो के जरिए विस्तार से रखा। उन्होंने कहा कि जीडीपी में कृषि का योगदान 14—15 फीसदी है, जबकि आज भी कृषि पर 70 फीसदी लोग निर्भर हैं। एक सोची समझी रणनीति के तहत हमारे गांवो को खाली कराया जा रहा है। यह आश्वासन दिए गये हैं कि उन्हें वर्क फोर्स का हिस्सा बनना है। सेवा क्षेत्र को विस्तार देना है। लेकिन ये कामगार कहां लगे हुए है। ये कौन लोग हैं इनका वेतन क्या है, सामाजिक सुरक्षा मिली हुई है या नहीं। इसका विश्लेषण करने पर पता चलता है कि हमारे गांव के नौजवान इसी शहर में गार्ड के काम में, रेस्तरां में, छोटे-छोटे कारखानों में न्यूनतम वेतन पर काम कर रहे है। ये सब लोग गांव से निकले हुए किसानों के बेटे हैं, जिनके विषय में यह कहा जाता रहा है कि खेती-किसानी लाभप्रद नहीं रही, इसलिए इन्हें शहरों मे रोजगार मिल रहा है।
प्रो प्रधान ने आगे कहा कि रोजगार तो मिल रहा है,लेकिन रोजगार की प्रकृति कैसी है यह प्रश्न विचारणीय है। उसके गुणवत्ता को लेकर प्रश्न है। कृषि और किसानों के विकास के सवाल पर उन्होंने कहा कि बार—बार ये नारे दिए जाते हैं कि खेती लाभप्रद नहीं है इसलिए हमें किसानों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए परंपरागत खेती और परंपरागत फसलों के उत्पादन को छोड़ नकदी फसलों के उत्पादन के दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए। लेकिन जैसे जैसे हम नकदी फसलों की आगे बढ़े यह प्रयोग विफल ही साबित हुआ। और आंकड़े देखें तो नकदी फसल उगाने वाले किसानों के आत्महत्या की घटना बढ़ी है। 1991 के बाद अपनाये गये आर्थिक सुधार की प्रक्रिया ने किसानो के जीवन को जटिल बना दिया।
1995 के बाद लाखों किसानों की आत्महत्या की घटना सामने आयी है। हमारे नीति निर्माताओं ने जिस तरह से बाजार या शहर के बीच से भीड़—भाड़ को कम करने के बाईपास सड़क बनाते हैं वैसे ही किसानों को बाईपास करके आगे बढ़ने की प्रवृति बढ़ी है। दावा यह किया जा रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को पीछे छोड़ आधुनिक अर्थव्यवस्था की ओर छलांग लगाई है। इसी का परिणाम है कि एक ओर जहां देश में आर्थिक विकास दर पिछले दो वर्षों में 6—7 फीसदी रही है, वहीं कृषि विकास दर मात्र एक से डेढ़ फीसदी रही। इस तरह से हम देखते है कि पूरी आर्थिक सुधार की प्रक्रिया खेती को बाईपास करके आगे निकल गई है। एक आकंड़े के मुताबिक देश में 48 फीसदी किसान खेती किसानी छोड़ना चाहते हैं। खेती में लागत बढ़ती जा रही है और यदि किसी परिवार में बाहरी आमदनी न हो तो खेती करना मुश्किल है। हमारी खेती और किसान इस दुष्चक्र से नहीं निकल पा रहे हैं। इस मौके पर प्रो प्रधान ने अमर शहीद शिवपूजन राय और सहजानंद सरस्वती सहित अन्य शहीदों को याद करते हुए कहा कि हम यह न भूलें कि वे कैसा समाज चाहते थे। वे चाहते थे कि देश में गैर बराबरी का समाज बने, लेकिन आज जिस तरह का देश बन रहा है,उनमें गरीब किसानों के लिए कोई जगह नहीं।
इस परिचर्चा में वरिष्ट पत्रकार एन के सिंह,साहित्यकार राघव शरण शर्मा,जैविक कृषि विशेषज्ञ अरूण महादेव,रामाज्ञा राय ने भी अपनी बात रखी। कार्यक्रम में शहीद के गांव शेरपुर एवं उसके आसपास के ग्रामीणों ने बड़ी संख्या में उपस्थित होकर 1942 के शहीदों को श्रद्धांजली दी।



