पंचायत खबर टोली
मऊ : “ मां निषाद त्वं गमं: शास्वती समा यत क्रौंच मिथुनामेदिकम्…” इस आदि छंद की उदगात्री पौराणिक नदी तमसा आज प्यासी और प्रदूषित हो गई है। पुराणों के अनुसार कामभाव से लिप्त क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक को बेधने के पश्चात दूसरे के आर्त स्वर से द्रवित महर्षि वाल्मिकी द्वारा बहेलिए को दिया गया शाप आदिछंद बना। इस समय नदी नित्यप्रति लाखों लीटर मल-जल के बीच अपना अस्तित्व तलाश रही है। निष्क्रिय प्रशासन, संवेदनशून्य नागरिक भविष्य की भयावहता को जानने के बाद भी मानने को तैयार नहीं हैं। दूसरी ओर जिले में बहने वाली उत्तरवाहिनी घाघरा दोहरीघाट में अपने गोल कटान वाले भाग में अज्ञात शवों की शरणस्थली बनी हुई हैं, लोगों की आकांक्षा का बोझ सहने में अक्षम छोटी सरयू भूमिगत हो गईं हैं। प्रदूषण के बोझ तले सिसक रही तमसा के निर्मलीकरण के लिए अक्षमता छोड़ सद्प्रयास की गति में ईमानदार व जवाबदेह तीव्रता नहीं लाई गई तो निकट भविष्य में इसके समाप्त होने की प्रबल संभावना है। नगर में 10 किमी बहाव के बीच प्रतिदिन तीन लाख लीटर मलजल के साथ स्लाटर हाऊस से पशु वध के अवशेष निरंतर गिर रहे हैं इसमें। आश्चर्य यह कि नगर की लाइफ लाइन मानी जाने वाली तमसा के तट पर प्रतिदिन नगरपालिका द्वारा कूड़ा-कचरा गिराकर जलाने, अतिक्रमण करने के साथ नदी को प्रदूषित करने का प्रयास प्रशासनिक सोच व सच्चाई की कलई खोल देता है।
ऐतिहासिक—धार्मिक महत्व है
स्वर्णीम अतीत से बदहाल हालात तक सघन वन के बीच प्रवाहित होती तमसा का इतिहास रामायण सहित कई धर्मग्रंथों में मिलता है। नदी का पावन तट अयोध्या से निर्वसन के बाद प्रजा को यहीं छोड़ श्रीराम जानकी और लखन लाल के साथ आगे बढ़े थे। लव कुश का जन्म, बाल्यकाल और अयोध्या की सेना को परास्त होता देखना भी तमसा के स्वर्णीम अतीत में छुपा है। अंबेडकर नगर से निकल आजमगढ़, मऊ होते बलिया में गंगा में समाहित हो जाने वाली एेतिहासिक नदी मऊ नगर में अति दयनीय हालत में पहुंच गई हैं। भेदसरा से भीटी तक 10 किमी तक डेढ़ लाख लोगों के मलजल को 10 नालों से निरंतर गिराया जा रहा है। कागजात में बद स्लाटर हाऊस से निकलने वाले पशुवध के अवशेष मस्जिदिया घाट पर देखे जा सकते हैं। सर्वत्र प्लास्टिक, गंदगी और प्रदूषित जलप्रवाह का उपयोग नित्यप्रति हजारों लोग करते हैं। प्रदूषण का आंकड़ा खतरनाक स्तर को पार कर गया है। राष्ट्रीय उपयोगी कृषि सूक्ष्मजीव ब्यूरो (एनबीएआईएम) कुशमौर की रिपोर्ट में नदी तट पर उगने वाली फसल भी प्रदूषित जल के कारण स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो गई हैं। जून के महीने में वर्षा न होने की स्थिति में नगर की गंदगी का प्रवाह तमसा की पहचान बन गया है। ढेकुलियाघाट पूल से नदी को देखने के बाद इसके दर्द से रूबरू हुआ जा सकता है। नदियों को बचाने की देशव्यापी मुहिम के बाद जिला प्रशासन की चुप्पी समझ से परे है।
नगरपालिका के प्रयास और करतूत नागरिकों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध नगरपालिका द्वारा नदी की सुरक्षा को लेकर संज्ञाशून्यता का रवैया अपनाया जाता है। नगर के सैकड़ो टन कचरे को स्टालर हाऊस के पास नियमित रुप से गिराया जा रहा है। कचरे को गिराने के साथ आग लगा दिया जा रहा है। मस्जिदियाघाट से बमघाट के बीच क्रमवार गिराए ईंट के पीछे नियमित धुआं का उठाता गुबार नगरपालिका के प्रयास के एक रुप को दर्शाता है। प्रदूषण रोकने के लिए सभी नालों पर नगरपालिका द्वारा डबल घेरादार चेंबर बनाने की योजना अभी पूरी तरह से क्रियान्वित नहीं हो पाई है। बेलवाघाट पर पहली बार सफल क्रियान्वयन के बाद बमघाट में भी इसका निर्माण कराया गया। लेकिन इसके बाद भी अन्य नालों को लेकर नगरपालिका के निष्क्रिय प्रयास से नदी में दिन प्रतिदिन प्रदूषित मल-जल गिर रहा है। नगर की लाइफ लाइन से कही जाने वाली नदी में प्रदूषण रोकने के लिए दैनिक जागरण द्वारा चलाए गए समाचारीय अभियान के तहत नगरपालिका ने सभी नालों पर घेरादार चेंबर बनाने का वादा किया था। बेलवाघाट और बमघाट के सफल प्रयोग के बाद भी इस दिशा में अन्य नालों पर योजना का क्रियान्वयन न करने के पीछे नगरपालिका की चुप्पी समझ से परे है।
जलस्तर में गिरावट के साथ ही नदी में अवध खनन का कार्य जोरों से शुरू हो जाता है। भदेसरा से लेकर सरवां तक दर्जनों स्थान पर खनन माफिया सक्रिय हो जाते हैं। प्रशासनिक लापरवाही के बीच इनकी मिलीभगत की आशंका से माफियाओं का मन बाढ पर है। भदेसरा, बेलवाघाट, हनुमानघाट, बमघाट, ढेकुलियाघाट, भीटी, नसोपुर सहित सरवां में मध्य रात्रि से लेकर भोर तक धड़ल्ले से खनन का कार्य किया जा रहा है। प्रशासन के नाक के नीचे हो रहे अवैध खनन से नदी के स्वरूप में बदलाव होने के साथ दुर्घटना का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। अवधेश सिंह आदि बताते हैं कि नदी में नियमित रूप से हो रहे अवैध खनन की जानकारी प्रशासन की मिली भगत से होती है। मध्य रात से लेकर भोर तक दर्जनों नावों के माध्यम से राेज खनन कार्य किया जा रहा है। इस दिशा में प्रशासन की निष्क्रियता उनकी मिलीभगत की आशंका को स्पष्ट कर देती है। प्रशासन द्वारा इस पर रोक लगाने के लिए त्वरित प्रयास नहीं किया गया तो नदी के अस्तीत्व की रक्षा के लिए व्यापक धरना-प्रदर्शन किया जाएगा। पौराणिक नदी तमसा के पास बने रेलवे आेवर ब्रिज के नीचे ठीक पाए के साल भर से लगी आग अभी भी अनवरत रूप से सुलग रही है। नगर की गंदगी को नित्यप्रति गिरने के कारण आग बुझने का नाम नहीं ले रही है। इससे एक तरफ जहां ब्रिज की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। वहीं दूसरी आेर जहरीले रसायनों से निकलता धुंआ स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। नगरपालिका परिषद द्वारा इस दिशा में की जा रही लापरवही पर प्रशासन की चुप्पी सालने वाली है। इस परेशानी और जहरीले धुंए के बीच स्थानीय लोग जीने को विवश हैं। इसे लापरवाहीं कहें की जानबुझ कर की जा रही नादानी समझ से परे हैं।
घाघरा के विनाश बीच छोटी सरयू भूमिगत
इसके साथ दोहरीघाट में घाघरा की विनाशकारी लहरों द्वारा काटकर गोल बनाए गए घेरा दर्जनों अज्ञात शवों की शरणस्थली है। पूल से उतरकर निकट जाने के बाद सड़ते शवों पर मंडराते पक्षियों के झुंड को देखना हृदय विदारक होता है। इससे जल की गुणवत्ता प्रभावित होती है। कटान के लिए प्रतिवर्ष कई करोड़ रुपये खर्च करने वाले प्रशासन द्वारा नदी की सुरक्षा के प्रति लापरवाही बरती जाती है। कछुओं की निरंतर तस्करी के साथ अवैध मत्स्य कारोबार भी निरंतर संचालित किया जा रहा है। प्रशासन मौन होकर अपने हिस्से की उगाही करने में मस्त है। दूसरी ओर छोटी सरयू अतिक्रमण अौर अत्यधिक दोहन के कारण भूमिगत हो गई हैं। 10 वर्ष पूर्व विशेषज्ञों के शोध में निर्मल जल के स्रोत को 20 फीट नीचे से बहते हुए बताया गया। घाघरा के जल को छोटी सरयू से जोड़ते हुए तमसा में गिराए जाने से तीनों नदियों के भविष्य को संवारा जा सकता है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
भूगोलवेत्ता डॉ.प्रभाकर सिंह बताते हैं कि नदी के अस्तीत्व की रक्षा के लिए पालिका प्रशासन को ठोस प्रयास करना होगा। बढ़ती जनसंख्या और भविष्य को देखते हुए नदी के पुनोद्धार के लिए घाघरा को छोटी सरयू से जोड़ते तमसा में जल की उपलब्धता सुनिश्चित करना होगा। नदी में जल प्रवाह नियमित बनाए रखने के साथ प्लास्टिक, कूड़ा-कचरा जाने से रोकने के ठोस प्रयास करने होंगे। तटबंध पर सघन पौधरोपण कर हरा-भरा बना कर लोगों को नदी से जोड़ना होगा। प्रशासन के साथ आमजन को नदी के विषय पर जागरुक होना होगा।
संगीताचार्य पंडित गिरिजाशंकर त्रिपाठी कहते हैं कि आंदिछंद के रुप में दुनिया को पहली कविता देने वाली नदी को आज लोगों की नितांत आवश्यकता है। नदी के पुनरोद्धार किए जाने के लिए प्रशासन द्वारा नियोजित योजना के साथ लोगों को जागरुक करते हुए उनके उत्तरदायित्व तय करने होंगे। अच्छी और बड़ी बातों को छोड़कर छोटे और सार्थक प्रयास करने की जरुरत होगी। दुर्भाग्य से ऐसा होता अभी दिख नहीं रहा है।


