छुट्टे की छूट नहीं..तो सामान बिके कैसे..थम गया बाजार

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आलोक रंजन
बलिया: चार बजा नहीं कि गोर्वधन सिंह हांक लगाने लगे कि आज चट्टी पर कोई ना जाई का। बबलू बोला, काका 500 का नोट बंद हो गया। लेकिन हाट तो जाना ही है..गंवई जनजीवन का जरूरी पहलू है हाट। हाट में सीधे खेत से सब्जी लेकर आई तुरहिन का आज बोहनी नहीं हुआ। बाजार में भीड़ तो है। लेकिन खरीदार नहीं। जो आए हैं उनके पास नकदी नहीं। जिनके पास नकदी है वो मान्य नही है। 500 का नोट चल नहीं रहा है। नया नोट है नहीं। यदि किसी के पास है तो 2000 का नोट। ऐसे में एक किलो परवल चाहिए, दो किलो प्याज, दो किलो आलू। छुट्टा हो तो कैसे। यहां तो पूरे दोड़े का जथा अर्थात सामान ही 2000 हजार का है।

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यही हाल पड़ोस के दुकानदार का भी है..किसी को राशन चाहिए, तो किसी को तेल चाहिए तो किसी को चीनी। मिठाई के दुकान पर यही हाल है। परिवार है तो सामान चाहिए ही। लेकिन सामान के लिए न तो दुकानदार के पास ज्यादा जमा पूंजी है, और न ही खरीदार के पास। जिनके पास है वे किसी तरह चाहते हैं कि छुट्टा मिल जाए। कुल मिला कर यही हाल बाजार का है। पप्पू की अम्मा के पास 100 का नोट है। लेकिन कोशिश ये कर रही हैं कि घर में रखा 500 का नोट भंज जाए। बैंक जाना उनके वश का नहीं। पप्पू को समझा बुझा के स्थानीय हाट में भेजती हैं कि जाओ दो किलो चीनी लाओ। ये 100 का नोट रख लो, लेकिन देना ये 500 का नोट। कहना अंकल चेंज कर दो। इससे घर में भी 400 के छुट्टे आ जाएंगे और नोट भी चल जाएगा। कौन बैंक के चक्कर काटे। लेकिन न माने तो 100 का नोट देना। पप्पू इस दुकान से उस दुकान तक चक्कर काटता है लेकिन जान पहचान वाले दुकानदार भी कन्नी काटता है..हारकर एक दुकानदार तैयार हुआ वो भी इस शर्त पर कि 500 का नोट जमा करवा दो..सामान ले लो। आगे भी सामान ले जाना।

hatttttttttttttttttमर्मू समोसे के शौकीन है..बाजार जाते हैं तो छोले समोसे जरूर खाते हैं। आदतन दुकान में प्रवेश किए..छोले समोसे का आडॅर दिया भी नहीं कि दुकानदार ने कहा छुट्टा है न। मर्मू ने कहा 500 का नोट। फुटकर न होने की बात कहने पर कहा गया कि 500 रुपये पूरा जमा कीजिए, आने वाले दिनों में भी समोसे खाइये। ऐसे में उसे  मिल पाया।
ऐसा नहीं है केवल ग्राहक परेशान है। दुकानदार भी परेशान है। हाट में फल की दुकान लगाने वाले छबीला अजीब कशमकश में है। रोजाना 500—1000 कमाते थे। 8 तारीख को ही 5000 का सामान लाये थे। उसने फल तो मंगा लिए लेकिन अब उसके फल सड़ रहे है। वह क्या करें, कुछ समझ में ही नहीं आ रहा है। एक तो कम खरीदार आ रहे हैं, जो आ रहे हैं उनके पास 500 रुपये की नोट होने के कारण वह फलों को बेच नहीं पा रहा है।
यह मामले, एक हजार व 500 रुपये के नोट बंद होने के बाद बाजार व आम आदमी पर पड़े असर का सच बयां कर रहे हैं। दो दिनों से लगातार बैंक खुल रहे हैं लेकिन बाजार की रफ्तार थमी हुई है। जिन दुकानों पर सुबह से लेकर शाम तक भीड़ रहती थी, आज वहां पर सन्नाटा है। दुकानदार के माथे पर चिंता की लकीरें हैं। हमेशा लोगों से गुलजार रहने वाले गंवई बाजार में खामोशी है। दुकानदारों का कहना है कि सरकार ने निर्णय तो ठीक लिया है लेकिन इसके असर ने आम आदमी को परेशान कर दिया है।

hat-4-600x433सामान तो है लेकिन खरीदार नहीं है। फुटकर पैसे न होने के कारण लोग सामान नहीं ले पा रहे हैं, जिसका असर बाजार पर पड़ रहा है। कारीगर व मजदूर खाली हाथ बैठे हैं। क्या करें, कुछ समझ में नहीं आ रहा है। यही हाल कमोबेश किसानों का है। खेती किसानी का समय है। खाद खरीदना है। बीज खरीदना है। पटवन करना है। सब के लिए पैसा ही चाहिए। सरकार की इस कार्रवाई का असर राइस मिलर्स पर भी पड़ा है। दरअसल, किसान फसल का नकद दाम चाह रहे हैं। फुटकर न होने के कारण उन्हें पैसा नहीं मिल पा रहा है, जिससे वह फसल नहीं ला रहे हैं। मजदूर भी परेशान है। उन्हें मजदूरी नहीं मिल पा रही है। शादी विवाह का मौसम है। इन दिनों में फूलचंद कुम्हार के यहां आर्डर का भरमार है। बंधे—बंधाये ग्राहक हैं। गृहस्थ है। अब ऐन वक्त पर उनके पास नकदी नहीं है तो मना तो नहीं किया जा सकता है। वे कहते हैं कि बाजार पर नोट बंदी का प्रभाव पड़ा है। पूरा-पूरा दिन बीत जा रहा है, बोहनी नहीं हो पा रही है। कब तक लोग इससे जूझेंगे, कुछ पता नहीं। हर किसी के जेब में हजार व पांच सौ के नोट थे तथा सभी की बेचैनी उसके छुट्टे की थी। संशय के कारण कोई छुट्टे  देने को तैयार नहीं। दुकानदार भी अपना हाथ खड़ा कर दिये है। जिस कारण लोगों को परेशान होना पड़ रहा है और खरीद बिक्री लगभग ठप है।

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