अनछुए पूर्वोत्तर को जानने-समझने का प्रयास है.. पुस्तक लाल नदी, नीले पहाड़

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रविशंकर रवि
देश के अन्य हिस्से में रहने वाले लोगोें के लिए पूर्वोत्तर अभी अनछुआ है। जबकि पूर्वोत्तर अभी भी देश के अन्य हिस्सों के पर्यटकों के लिए अनछुआ है। हरे और घने जंगलों, दुर्गम पहड़ियों की श्रृंखलाओं के बीच बसे जनजाति गांव स्वर्ग की तरह लगते हैं। प्रकृति ने दिल खोलकर पूर्वोत्तर को संवारा है। उतने ही आत्मीय इधर के लोग हैं। एक तरफ हिमालय की पहाड़ियों से उतरने वाली लाल नदियों का जाल है तो दूसरी तरह ब्लू पाइंस के पेड़ो से भरे नीले दिखने वाले पहाड़ों की श्रृंखलाएं। असम के कार्बी आंग्लांग से आरंभ होने वाली बराइल रेंज की पहाड़ियां तो म्यांमार की सीमा के अंदर तक चली जाती है। अरुणाचल के लोगों के लिए हिमालय ही जीने का आधार है। उनकी उपासना और कथाओं में हिमालय और सूर्य की महत्ता का गुणगान देखने को मिलता है। उनकी बहुरंगी संस्कृति और परंपरा में प्रकृति और वन्यजीवों के साथ जीने की अदम्य इच्छा का अहसास हर किसी को हो जाता है।

purvotar_oकृष्ण की नगरी मथुरा और वृंदावन से काफी दूर होने के बावजूद मणिपुर की कृष्णभक्ति सहसा उत्तर भारतीय को चौंका देती है। मणिपुर घाटी के लोगों के लिए ही कृष्ण ही सब कुछ हैं। वहां की चार दिवसीय होली के सामने तो उत्तर भारत की होली भी फीकी पड़ जाती है।
मेघालय की पहाड़ियों पर गुजरते हुए अचानक बादल से घिर जाना आम बात है तो नगालैंड के पहाड़ी रास्ते में घने जंगल के बीच हल्की बारिश के साथ भीगी ठंड में रास्ते किनारे की कुटिया में गर्म चाय पीने का सुख एक अलौलिक अहसास दिलाता है। तवांग की चुप्पी भी लोगों से कुछ कहती है तो मिजोरम का बांस वहां लोगों की अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार है। असम के मिसिंग आदिवासी पानी के बीच ही जिंदगी जीते हैं तो संत श्रीमंत शंकरदेव ने एशिया का सबसे बड़ा नदी द्वीप माजुली को वैष्णव संस्कृति के केंद्र के रूप में विकसित किया । आज भी माजुली के सत्र गुरु-शिष्य की परंपरा का निर्वाह करने के लिए गुरु कुल आश्रम जैसी व्यवस्था के माध्यम से वैष्णव धर्म का ध्वाजा गाड़े हुए हैं। असम की विहुला-विषहरी की कथा बिहार के अंग जनपद भागलपुर के साथ सूत्र स्थापित करती है।
पूर्वोत्तर के रंग-बिरंगे और विविध रूप भारत में शायद ही कहीं हो, लेकिन उग्रवाद की वजह से शेष भारत के लोग अपने देश को ऐसे सौंदर्य को करीब से नहीं देख पाए। इतनी सारी संस्कृतियां, रंग-बिरंगे वेषभूषा, अलग-अलग बोलियां, खान-पान की विविधता आदि एकसाथ शायद ही देश के किसी अन्य हिस्से में देखने को मिले। परिधान के रंगों और उन पर आंकी गई आकृतियों के आधार अलग-अलग जनजातियों को पहचाना जा सकता है। हरियाली के बीच पहाड़ों से घिरे खुले आकाश के नीचे पैर से लेकर लिलाट तक सजे परंपरागत आभूषणों से परिपूर्ण नृत्य करती, गीत गाती सुंदर युवतियों का समूह एक अलग अहसास कराता हैया पर चाय बागानों में चाय की पत्तियां तोड़ती महिलाओं का सामूहिक गायन । ऐसे दृश्य नदी के किनारे, झरने के पास, पहाड़ी से उतरती पगडंडियों, धान के खेतों के बीच अक्सर या अनायास दिख जाते हैं।
उग्रवाद ढल चुका है। हर क्षेत्र तक पहुंचने के लिए उन्नत व्यवस्था हो चुकी है। पर्यटक स्थलों तक ठहरने का इंतजाम हो चुका है। पूर्वोत्तर की हर राज्य सरकार पयर्टकों के लिए विशेष संसाधन जुटा रही है। यही वजह है कि अब पयर्टकों की संख्या बढ़ने लगी है। अब पयर्टक सिर्फ गुवाहाटी और शिलोंग ही नहीं, दूरदराज के स्थलों तक जाना चाहते हैं।
पिछले करीब 26 वर्षों से पूर्वोत्तर में रहते हुए इसके विविध रूपों को महसूस किया है। उसे इस पुस्तक लाल नदी, नीले पहाड़ में लाने का प्रयास किया है। इसका प्रकाशन बोधि प्रकाशन ने किया है।

ravi_nलेखक परिचय
भागलपुर के कोहड़ा ग्राम के रविशंकर रवि1986 से नवभारत टाइम्स से सक्रिय पत्रकारिता में आए। वे स्व. शिव प्रकाश अवस्थी और रामलला देवी के प्रथम संतान हैं। उनका जन्म अगस्त, 1963 में हुआ। फिलहाल गुवाहाटी और जोरहाट से प्रकाशित दैनिक पूर्वोदय के संपादक।  पूर्वोत्तर में पिछले 25 वर्षों से पत्रकारिता और पूर्वोत्तर की हिन्दी पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम। इससे पूर्व नवभारत टाइम्स और आज के लिए झारखंड में सक्रिय रहे। पूर्वोत्तर के साहित्य और संस्कृति को पूरे देश के हिन्दी पाठकों तक पहुंचाने के लिए गुवाहाटी से उलुपी  नामक पत्रिका का 1997 से संपादन-प्रकाशन। पूर्वोत्तर के बारे में नई दुनिया, हिन्दुस्तान, जनसत्ता, आउटलुक, राष्ट्रीय सहारा समय समेत कई राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन और जर्मन रेडियो-डच वेले और व्याइस आफ अमेरिका की हिन्दी सेवा के लिए पूर्वोत्तर से संवाद सेवा।  गुवाहाटी से दूरदर्शन एवं निजी न्यूज चैनलों एनईटीवी के लिए नियमित कार्यक्रम ।
पुस्तक संपादन: रूपकुअंर ज्योतिप्रसाद आगरवाला, असम साहित्य सभा- असम का महाकुंभ, असमिया का प्रतिनिधि कहानियां
प्रकाशित पुस्तक: नमकीन मोती (असमिया से हिन्दी अनुवाद)
सम्मान:     विष्णु प्रभाकर पत्रकारिता सम्मान
असम सरकार के अधीन असम पयर्टन विकास निगम का बेस्ट फीचर (प्रिंट)अवार्ड

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