गैर राजनीतिक किसान आंदोलन को लेकर सदन में राजनीतिक दलों का हल्ला बोल

संतोष कुमार सिंह

नयी दिल्ली: दिल्ली के बोर्डर पर किसान जमे हुए हैं। कृषि कानूनों की वापसी की मांग को लेकर कांग्रेस के सांसद संसद परिसर में स्थित महात्मा गांधी की मूर्ति के सामने प्रदर्शन किया। संसद के दोनों सदनों में तीन कृषि कानून को लेकर हंगामा हुआ।

राज्यसभा में जब विपक्षी सांसदों ने कृषि कानून को लेकर चर्चा की मांग की तो चेयरमैन वेंकैया नायडू ने कहा कि कृषि कानूनों पर पहले ही चर्चा हो चुकी है, इसलिए अब उसकी जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर आप चाहें आपके सामने चर्चा का रिकॉर्ड रखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन पर आज नहीं, कल चर्चा होगी, क्योंकि परंपरा के हिसाब से पहले चर्चा लोकसभा में शुरू होगी। लेकिन विपक्षी सांसद ने आसन की बात नहीं मानी राज्यसभा में विपक्षी दलों ने किसानों की मांग पर चर्चा के लिए जमकर नारेबाजी की। सरकार विरोधी नारे लगाए और कृषि कानून वापस लेने की आवाज उठाई। लेकिन चर्चा नहीं की गई। सुबह से ही हंगामा होता रहा और तीन बार कार्यवाही स्थगित होने के बाद दोपहर 12.30 बजे जब सदन शुरू हुआ तो फिर जय जवान, जय किसान के नारे लगने लगे। ये हंगामा देखते हुए राज्यसभा की कार्यवाही बुधवार सुबह 9 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई।
लोकसभा में भी कमोबेश यही स्थिती रही। संसद के बजट सत्र के तीसरे दिन लोकसभा की कार्यवाही अपराह्न 4 बजे आरंभ होने के साथ ही कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और द्रमुक के सदस्य अध्यक्ष के आसन के निकट आकर नारेबाजी करने लगे। वे तीनों विवादास्पद कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे थे। विपक्षी सदस्य ‘कानून वापस लो’ के नारे लगा रहे थे. कई सदस्यों के हाथों में तख्तियां भी थीं जिन पर कृषि कानूनों को वापस लेने की मांगें लिखी थीं।


लोकसभा में ए राजा, असदुद्दीन ओवैसी, के सुरेश, नुसरत जहां रूही, बदरूद्दीन अजमल, उत्तम कुमार रेड्डी, कनिमोई करूणानिधि और माला राय सहित कई सदस्यों ने कृषि मंत्री से पूछा था कि
‘‘क्या सरकार संसद द्वारा तीन विवादास्पद कृषि विधेयकों को पारित करने और कानून बनने से पहले किसानों और अन्य हितधारकों के साथ परामर्श करने में असफल रही .’’ उनसे यह भी पूछा गया था कि ‘‘क्या सरकार को नये कृषि कानूनों के विरोध में हजारों किसानों के पिछले दो महीने से प्रदर्शन करने की जानकारी है और उनके साथ वार्ता के बाद सरकार क्या उनकी जायज मांगों पर विचार करने के बारे में सोच रही है.’’
जिसके बाद कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि सरकार ने पिछले कई वर्षों से कृषि सुधारों के संबंध में सभी पक्षकारों के साथ वार्ता की है तथा नये कृषि कानूनों से जुड़े मुद्दे के समाधान के लिये सरकार एवं आंदोलनकारी किसान संगठनों के बीच 11 दौर की वार्ता में कानूनों में संशोधन को लेकर सरकार ने एक के बाद एक कई प्रस्ताव रखे हैं। कृषि मंत्री ने यह भी दोहराया कि नये कृषि कानूनों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ेगा।


नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में कृषि सुधार कानूनों के कार्यान्वयन पर रोक लगा दी है. एक अन्य प्रश्न के उत्तर में कृषि मंत्री ने कहा, ‘‘पिछले कई वर्षों से कृषि सुधारों के संबंध में सभी पक्षकारों के साथ वार्ता की गई।’’

उन्होंने कहा कि भारत सरकार कृषि विपणन क्षेत्र में सुधारों के लिये लगभग 2 दशकों से राज्यों के साथ सक्रिय रूप से गहनता से कार्य कर रही है। इसका उद्देश्य किसी भी समय और किसी भी जगह बेहतर मूल्य पर अपनी उपज की बिक्री करने के लिये पहुंच वाली मंडियों एवं बाधा मुक्त व्यापार की सुविधा प्रदान करना है।

तोमर ने स्पष्ट किया कि कृषि (सशक्तीकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा करार अधिनियम 2020 किसानों एवं प्रायोजकों के बीच किसानों की उपज के कृषि समझौते के लिये है, न कि किसानों की भूमि की संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) के बारे में। उन्होंने कहा कि इस अधिनियम के अध्याय 3 के खंड 15 में यह बताया गया है कि किसानों की कृषि भूमि के विरूद्ध किसी भी राशि की वसूली के लिये कोई भी कार्रवाई नहीं की जायेगी।
इस बीच लोकसभा में हंगामा होता रहा और एक बार के स्थगन के बाद सदन की बैठक शाम 7 बजे तक स्थगित कर दी गई।

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