गाजीपुर: ‘‘नाडेप यूनिट बनाने की तकनीक’’ विषय पर कृषि विज्ञान केन्द्र, पीजी कालेज, गाजीपुर में तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के समापन के अवसर पर केन्द्र के वरिष्ट वैज्ञानिक डाॅ दिनेश सिंह ने प्रशिक्षणार्थियों को प्रमाण-पत्र देते हुए कृषि से जुड़े प्रशिक्षणों में भाग लेकर कृषि की नवीनतम जानकारी लेने को प्रोत्साहित किया। साथ ही नाडेप यूनिट लगाने की प्रक्रिया पर विस्तार से चर्चा किया।
केन्द्र के मृदा वैज्ञानिक डीके सिंह ने बताया कि नाडेप यूनिट बनाने के लिए भूमि समतल हो तथा जल भराव की समस्या न हो। टांका निर्माण हेतु आन्तरिक माप 10 फीट लम्बी, 6 फीट चौड़ी और 3 फीट गहरी रखनी चाहिए। इस प्रकार टांका का आयतन 180 घन फीट हो जाता है। टाॅका की दीवार 9 इंच चौड़ी रखनी चाहिए। दीवार को बनाने में विशेष बात यह है कि बीच-बीच में यथा स्थान छेद छोड़ें जाएं, जिससे कि टाॅका में वायु का आवागमन बना रहे और खाद सामग्री आसानी से पक सकें। प्रत्येक दो इंटों के बाद तीसरी ईंट की जुड़ाई करते समय 7 इंच के छेद छोड़ देना चाहिए। 3 फीट उॅंची दीवार में पहले, तीसरे, छठे और नवें रद्दे में छेद बनाने चाहिए। दीवार के भीतरी व बाहरी हिस्से को गाय या भैंस के गोबर से लीप दिया जाता है। फिर तैयार टांका को सूखने देना चाहिए। इस प्रकार बने टांका में नाडेप खाद बनाने के लिए मुख्य रूप से चार चीजों की आवश्यकता होती है जैसे-व्यर्थ पदार्थ या कचरा जैसे सूखे हरे पत्ते, छिलके, डंठल, जड़ें, बारीक टहनियाॅं आदि। इसके साथ ही 100 किलोग्राम गाय या भैंस का गोबर या गैस संयंत्र से निकले गोबर का घोल। कुल मिलाकर करीब 1500 से 2000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। गोमूत्र या अन्य पशु मूत्र मिला देने से नाडेप खाद की गुणवत्ता में बढोत्तरी होती है। नाडेप कम्पोस्ट की गुणवत्ता में अधिक वृद्धि के लिए आधा इंच मिट्टी की परतों के उपर 1.5 किलोग्राम जिप्सम 1.5 किलोग्राम राॅक फास्फेट $ नाइट्रोेजन का मिश्रण बनाकर सौ ग्राम प्रति परत बिखेरते जाते हैं। टांका भरने के 60 से 70 दिन दिन बाद राइजोबियम $ पी0एस0बी0 $ एजोटोबैक्टर का कल्चर बनाकर मिश्रण को छेदों के द्वारा प्रविष्ट करा देते हैं।
नाडेप कंपोस्ट काफी उपयोगी
टांका में 60 प्रतिशत नमी का स्तर हमेशा बना रहे। इस तरह से नाडेप कम्पोस्ट 90 से 110 दिनों में बनकर प्रयोग हेतु तैयार हो जाती है। लगभग 3.0 टन से 3.25 टन तक प्रति टैंक नाडेप कम्पोस्ट बनकर प्राप्त होती है तथा इसका 100 से 120 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से खेती में प्रयोग करना पर्याप्त होता है। इस कम्पोस्ट के पोषक तत्वों की मात्रा नत्रजन के रूप में 0.50 से 1.5 फाॅस्फोरस के रूप में 0.5 से 0.9 तथा पोटाश की रूप में 1.2 से 1.4 प्रतिशत तक पायी जाती है। नाडेप टांका 10 वर्ष तक अपनी पूरी क्षमता से कम्पोस्ट बनाने में सक्षम रहता है।
रसायन की जगह जैविक खाद पर कृषि वैज्ञानिक जोर दे रहे हैं। इस दशा में कंपोस्ट खाद की अहमियत और बढ़ गई है। हालांकि मवेशियों की तादात घटने से गोबर भी कमी है। बावजूद कम से कम गोबर में कंपोस्ट खाद तैयार किया जा सकता है। नाडेप कम्पोस्ट बनाने हेतु प्रति टांका निर्माण में लगभग 10 से 12 हजार रूपये की लागत आती है। यदि 6 टांका का निर्माण कर अंतराल रूप एक-एक टांका भरकर कम्पोस्ट बनाई जाये तो गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले व शिक्षित बेरोजगारों को चार हजार रूपये प्रति माह के हिसाब से आर्थिक लाभ हो सकता है। प्रशिक्षण में 21 प्रशिक्षणार्थियों ने भाग लिया।



