संतोष कुमार सिंह
- नाम किसानों का लोन का फायदा अंबानी ब्रदर्स को
- बड़े अखबार,चैनलों से गायब हुई कृषि रिर्पोटिंग..किसी भी अखबार में एक भी पूर्णकालिक कृषि संवाददाता नहीं।
नयी दिल्ली: प्रभाष परंपरा न्यास द्वारा आयोजित कार्यक्रम में जाने माने कृषि पत्रकार पी साईनाथ ने मीडिया इन एग्रेरेरियन काईसिस खेती—किसानी और मीडिया रिर्पोटिंग विषय पर उन्होंने विस्तार से बात रखी। पी साईनाथ ने कहा कि 17 साल पहले गरीबी के उपर एक हिंदी में किताब लिखा था..किताब का नाम है तीसरी फसल। उस किताब से जो रॉयल्टी आयी उसे दो ग्रामीण पत्रकारों को पुरस्कृत करने के लिए रखा गया। पहला पुरस्कार झारखंड के दयामनी बारला को प्रभाष जोशी के हाथों दिलवाया। प्रभाष जोशी इसलिए तैयार हुए कि आदीवासी लडकी को पुरस्कार जीत रही है। यह किताब अंग्रेजी में एवरी बडी लव्स ए गूड ड्राउट के नाम से प्रकाशित हुई है।
इस किताब की पृष्टभूमी है कि झारखंड के एक इलाके में घूमते हुए राम लखन नाम के एक व्यक्ति से मुलाकात हुई। जब उससे पूछा कि कोई किसान दिख नहीं रहा है तो उसने कहा कि सब तीसरी फसल लेने गये है। उत्सुकता वश पूछा कि ये तीसरी फसल क्या है? तो जानकारी हुई तीसरी फसल यानी सूखा राहत। ब्लॉक डेवलपमेंट आॅफिसर यानि ब्लॉक द डेवलपमेंट आॅफिसर।
देश में कृषि संकट 20 वर्षों से है। वर्ष 2000 से इस विषय पर गंभीर रिर्पोटिंग शुरू हुई। यदि वर्तमान विषय के संदर्भ में देखें तो हमें मीडिया और पत्रकारिता के बीच फर्क करके कृषि रिर्पोटिंग को समझना होगा। मीडिया का मतलब मालिक और जर्नलिज्म का मतलब पत्रकार। आज वैसे तो किसी भी अखबार में कृषि को कवर करने वाला रिर्पोटर ही नहीं है। कृषि संवाददाता कृषि मंत्रालय को कवर करता है किसानों को नहीं। अखबार चाहे जिस भाषा में हो मालिक एक ही है। राष्ट्रीय अखबार यानी एक संस्करण दिल्ली से और एक और संस्करण। यदि खबरों के कवरेज का विश्लेषण करें तो 67 फीसदी खबरें नयी दिल्ली से, मुंबई,दिल्ली कोलकाता आदि महानगरों से मात्र नौ फीसदी कवरेज होती है। जबकि इस देश में 42 शहर ऐसे हैं जहां 10 लाख से ज्यादा की आबादी रहती है। शहरी क्षेत्र में लगभग 55 फीसदी लोग रहते हैं। इसलिए ग्रामीण भारत की बात कौन करे मीडिया शहरी भारत को भी कवर नहीं करता। पहले पन्ने पर कभी भी ग्रामीण भारत की खबरों को कवरेज एक फीसदी से ज्यादा नहीं रहा जबकि 69 फीसदी लोग ग्रामीण भारत में ही रहते हैं। इसी दौरान चैनल,अखबार आदि पर कॉरपोरेट का मालिकाना हक के तहत आ गया। बड़े अखबारों या चैनल में भी कोई भी एक पूर्णकालिक कृषि संवाददाता नहीं है। न ही श्रम विभाग देखने वाला कोई संवाददाता है। जबकि 1980 में प्रत्येक अखबार में कृषि और श्रम को कवर करने के लिए संवाददाता होते थे। आज अखबारों में बिजनेस कवर करने के लिए 10—12 संवाददाता हैं। इससे साफ जाहिर होता है 75 फीसदी आबादी हमारी खबरों के कवरेज से बाहर है। जब बीट ही खत्म हो गयी तो विशेषज्ञता कहां से आयेगी। मालिक की रूची नहीं है क्योंकि इससे अखबार को पैसा नहीं आता। जब उसे किसी किसान को दर्शाना होता है तो वह आसमान की ओर देखता हुआ किसान की तस्वीर लगाता है। इस तरह से यह तस्वीर इतनी बार दुहराई गयी है मानो हम किसान के सम्मान का क्षय कर रहे हैं।
भारत में किसान कौन यह भी तय नहीं हो पाया है। इस देश में अमिताभ बच्चन भी किसान है। अरविंद पनगढ़िया और जगदीश भगवती कि किसान संबंधी समझ बस इतनी है कि देश में किसान की आत्महत्या कम है। भारत में मात्र 53 फीसदी किसान हैं। ये कहते हैं किसान की आत्महत्या का अनुपात इतना कम है कि बाकी के समाज को उस अनुपात पर लाया जाए तो यह सुखद स्थिति होगी। ये समझ नहीं पाये हैं कि देश में 53 फीसदी लोग कृषि क्षेत्र से जुड़े हैं जिसमें वानिकी, मत्सयपालन,पशुपालन आदि भी शामिल है। किसान कौन है इससे क्या फर्क पड़ता है। जबकि हकिकत यह है किसानों की आबादी दिनोंदिन कम हो रही है। किसान में कामगार और गैर कामगार दोनो शामिल है। जो 180 दिन खेती किसानी के काम में लगा हुआ है वह मार्जिनल वर्कर है। किसानों की जनसंख्या में तेजी से गिरावट आ रही है। पिछले 20 सालों में 150 लाख लोगों ने खेती किसानी का काम छोड़ दिया है। प्रतिदिन 200 किसान खेती छोड़ रहे हैं। जबकी खेत मजदूरों की संख्या बढ़ रही है। इसका मतलब यह हुआ कि लाखों किसानों की जमीन छीन ली गयी और वह खेत मजदूर बन गया। केवल किसान ही दुरावस्था का सामना नहीं कर रहा है अपितु खेती किसानी से जुड़ा ग्रामीण समाज..यानी बढ़ई आदी के आत्महत्या के आंकड़े बढ़े हैं। किसान दीवालिया होता है तो बढ़ई,बुनकर आदि आत्महत्या करते हैं। खेती किसानी की हमारे पत्रकारों की समझ मात्र इतनी है कि वह लोन के दुष्चक्र में है। मानसून से प्रभावित है। देश में जो पिछले बीस सालों से चला आ रहा है वो सिर्फ मानसून जनित सूखा नहीं है वह बड़ा सूखा है। 10 मानसून भी बेहतर होगा तब भी सूखा समाप्त नहीं होगा। बारिश का कम होना मेट्रोलोजिकल ड्राउट फैल्योर है। जबकि हमारे खेती का संकट हाईड्रोलोजिकल ड्राउट फैल्योर और जमीन के अंदर पानी की कमी का संकट भी है। जहां से शहर में पानी आता है वह गांव संकट में है। पानी की कमी से जूझ रहा है। महानगरों में अपार्टमेंट बन रहे हैं। बहुमंजिलों ईमारतों में हर मंजिल पर स्वीमिंग पूल बनाये जा रहे हैं और वो स्वीमिंग पूल बनाने वाला मजदूर कौन है। हमारा किसान। जो पानी के कमी के कारन शहरी मजदूर बन कर रह गया है। वह कहता है कि गांव में पानी नहीं तो खेती क्या करूं? यह सब कई वर्षों से अपनायी गयी नीतियों का परिणाम है।
अब यदि किसानों के लोन की बात करें तो 50,000 हजार से कम लोन लने वाला सीमांत किसान है। दो लाख से कम लोन लेने वाला छोटा किसान। जबकी किसानों के नाम एक करोड़ से लेकर 10 करोड़ से उपर तक का भी लोन है। ये कौन लोग हैं। दो लोगों का नाम मेरी जानकारी में है मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी। नाबार्ड द्वारा दिया जाने वाला 53 फीसदी लोन मेट्रो ब्रांच के पास है। इन मेट्रो शाखाओं में कौन किसान जाता है। किसानों के नाम पर दिये जाने वाले ज्यादातर लोन एग्री बिजनेस कंपनियों को मिल रहे हैं। लोन का सबसे ज्यादा फायदा इन एग्री बिजनेस कंपनियों को ही मिला है। क्रमश: जारी…
