मुजफ्फरपुर के लीचिया खिअइह बालमा…..

0
2071

alokkk_n

आलोक रंजन, युवा पत्रकार

भोजपुरी कोकिला शारदा सिन्हा का गीत है- मुजफ्फरपुर (बिहार) के लीचिया खिअइह बालमा हो मुजफ्फरपुर …। इस शाही लीची को देखकर मुंह में पानी आ जाता है। खाने पर तो समझिए सीधा स्वर्ग की अनुभूति होती है। लेकिन इस बार तो खुद के लिए ही लाले पर जाएंगे। न बलमा धनी को खिला पाएंगे और न ही नाते रिश्तेदार के घर शाही लीची पहुंच पाएगी। लीची किसान बदहाल हैं। न सिर्फ फसल सूख रही है है बल्कि पूरा का पूरा बागान झुलसने लगा है।

लीची किसानों के लिए यह साल भी अच्छा नहीं रह रहा है। जिले के हजारों एकड़ में लगी लीची की फसल सूखने लगी है। पेड़ों पर लीची के फलों की जगह बस झुलसे पत्ते नजर आ रहे हैं। व्यवसायी अपनी अग्रिम राशि छोड़कर बागान लेने से पल्ला झाड़ने लगे हैं। 2015 में लीची की बरबादी की वजह से इस बार 60 फीसदी तक काम व्यापारी लीची बागान खरीदने पहुंचे हैं. ऐसे में किसान परेशान हैं, जिनके बाग नवंबर-दिसंबर महीने में ही बिक जाते थे, वो अप्रैल तक खाली हाथ हैं। देश की लगभग 10-15 फीसदी लीची मुजफ्फरपुर में पैदा होती है। यहां की शाही लीची का देश-विदेश में नाम है, लेकिन मौसम की मार ने किसानों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

litchi_storyimage

पूरा जिला प्रभावित

तेज गर्मी और पछिया हवा से जमीन में नमी खत्म हो गयी है। इससे बोचहां के पटियासा, पटियासा जलाल, हमीदपुर, मिर्जापुर व गरहां सहित पूरे जिले में लीची के बाग झुलस गये हैं। पहले लीची के पत्ते उसके बाद डालियों के साथ पेड़ भी सूख रहे हैं। सिर्फ बोचहां ब्लॉक में ही 500 एकड़ में लीची के पेड़ सूख गए हैं। किसान पटवन कर लीची का पेड़ बचाने की कोशिश कर रहे हैं। बोचहां के बड़े लीची उत्पादक विजय कुमार सिंहा ने बताया कि उनके संयुक्त परिवार में करीब 40 एकड़ लीची की खेती होती है. पिछली बार नवंबर माह में ही व्यवसायी ने लीची खरीद ली थी. पटियासा के लीची किसान शिवजी साह ने बताया कि उन्होंने ढाई एकड़ बागान में नौ बार पटवन कर चुके हैं। बावजूद पेड़ हरे नहीं हो रहे हैं। फल तो इस साल गये ही लीची के पेड़ ही बच जाएं तो गनीमत है। इस फसल पर उनका परिवार आश्रित है। किसान दो साल से नुकसान झेल रहे हैं। मुआवजा तो दूर उनके लोन भी माफ नहीं किये गये। लीची बागान के मालिकों का कहना है कि यहां 500 करोड़ की लीची का उत्पादन होता है, जिसमें लगभग पांच सौ व्यवसायी व बड़े किसान लगे हैं. इसके अलावा हजारों लोगों के पास छोटे बगान हैं.

lichi 2_nबागन से दूर व्यापारी

किसान परेशान हैं, जिनके बाग नवंबर-दिसंबर महीने में ही बिक जाते थे, वो अप्रैल तक खाली हाथ हैं. यहाँ तक की जिनके बैग बीके भी हैं अर्थात अग्रिम राशि मिल भी गयी है, वहां भी व्यापारिओं के आने के कोई असर नजर नहीं आ रहे हैं। हर साल लीची के पेड़ों में मंजर आने के साथ उनका सौदा (खरीद) हो जाता था। बाग खरीदनेवाले व्यापारी तय राशि की चौथाई अग्रिम के रूप में किसानों को दे जाते थे, लेकिन इस बार कम ही व्यवसायी मुजफ्फरपुर का रुख कर रहे हैं। बनारस के डेढ़ दर्जन व्यवसायी सीधे गांव के किसानों से संपर्क कर उनसे लीची खरीदते थे, लेकिन वहां से कोई व्यापारी नहीं पहुंचा। व्यवसायी सोनू कुमार ने बताया कि पिछले साल बारिश कम होने के कारण लीची की फसल अच्छी नहीं हुई। उन लोगों को किसानों को जो राशि दी थी। वो भी वापस नहीं हुई। इसके साथ ही दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, गोरखपुर, बस्ती, बरेली, आगरा, राजस्थान, जयपुर, पंजाब व काठमांडू आदि से भी व्यापारी आते थे, वो भी इसबार नहीं आए हैं।

lichi bagan

किसानों के मोटी आमदनी का जरिया है लीची

खेत की फसलों से वैसे तो अमूमन किसानों का रोजाना का खर्च और खान—पान चल जाता है,लेकिन लीची के बागान से होने वाली मोटी आमदनी छोटे बड़े किसानों के लिए बड़े कामों में बहुत सहायक होता है। इसके जरिए किसी को अपना कर्ज उतारना होता है, तो किसी को बेटी की शादी करनी होती है,तो कोई बाहर रहकर पढाई कर रहे बेटे—बेटी की मोटी फीस अदा करता है। किसानों के सामने अब बेटी की शादी रुकने तक की नौबत आ गई है। लेकिन लगातार दूसरे साल लीची बागान पर गर्मी की मार के कारण न सिर्फ लीची और पेड़ झुलस रहे हैं बल्कि किसानों के अरमान भी झुलसने के आसार नजर आ रहे हैं।

राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र, मुशहरी के डायरेक्टर, विशालनाथ कहते हैं,  किसान राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक गंभीरता से इस समस्‍या पर काम कर रहे हैं। किसानों को इससे बडा नुकसान हो रहा है। लीची को बचाने की कोशिश की जा रही है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here