महीना पहिले से मुखिया और भावी मुखिया जी फोन पर फोन किए जा रहे हैं। पिछले बार झबरूआ गया था मुखिया जी के दरवाजे पर। दूनो टांग सोफा पर फेंक के बैठिन थे। मलिकार जाती प्रमाण पत्र चाहिए था एगो एफिडेविट बना दीजिए..मुनवा के स्कूल में दाखिला खातिर। लेकिन तू ईहां रहता कहां है। हुजूर नहीं रहते हैं लेकिन बचवा सब एहीं रहता है। आरे तो ओकर पैसा लगता है। झबरूआ मन मसोस के रह गया..आखिर मुखिया जी खर्चा पानी के वास्ते लेईये लिये 500 रूपया। अब जब से पंचायत चुनाव का घोषणा हुआ है मुखिया जी हर तीसरे फोन दिन फोन करते हैं। काजी गांव आ रहे है न। विक्की के माई माने आपकी भौजाई चुनाव लड़ रही है। झबरू का कहे लेकिन मुखिया जी से उनके किये का हिसाब लेना है, और जो खर्चा दिया था वो सूद के साथ वसूलना है इसलिए झबरू पहिले ही मंगा लिया टिकट के वास्ते पैसा। बाकी गांव में जब से पहुंचा है खूब आवभगत हो रहा है। माने ई यारी कब तक,वोट गिराया तबतक। झबरू समझता है। एक एक वोट कीमत है। उसके पास 5 वोट है माने 10,000 हजार रूपया।
पंचायत चुनाव में वैसे तो वोटरों की संख्या हजारों में ही होती है, और पांच सौ से हजार वोट पाकर लोग मुखिया, बीडीसी,सरपंच बन जाते हैं। जिला परिषद का छेत्र थोड़ा बड़ा होता है, और इसमें हजारों वोट की आवश्यकता होती है। आज बिहार में पंचायत चुनाव का पहला चरण है। पंचायत चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी एक तरफ ग्रामीणों को लुभाने में जुटे हुए थे, लेकिन साथ ही दूर—दूर के नाते रिश्तेदार याद किये जा रहे हैं। दिल्ली मुंबई में रह रहे नौकरी पेशा लोगों को पहले ही टिकट बुक करा लेने को कहा गया था। जो आस पास के शहरों या पड़ोसी राज्यों में काम करते हैं,उनके लिए पहले ही गाड़ी भेज दी गयी थी। किसी के लिए स्पेशल तो किसी से कहा गया था,खुद रिजर्व कर के आ जाएं। पूरे परिवार के साथ। ग्रामीणों के साथ जो कि उनके आस पास रह रहे हैं। सबसे कहा गया है आने जाने का ख्रर्चा मिलेगा। इसके साथ ही अच्छा आवभगत के साथ ही दाम भी।
ऐसे प्रवासी मतदाताओं की संख्या हर गांव में है। क्योंकि हर घर से कोई न कोई बहरा माने परदेश में रहता ही है। भावी प्रत्याशी महीनों से ऐसे लोगों को साधने में लगे हुए हैं ताकि उन्हें उनका बहुमूल्य मत प्राप्त हो सके। यही कारण है कि बाहर रहने वाले अधिकांश प्रत्याशी मुखिया जी माने मुखिया जी के बुलावे पर गांव पहुंच गये है। दारूबंदी ने मजा किरकिरा कर दिया
पंचायत चुनाव में मुखिया जी का रास्ता दारू आासान कर दिया करता था लेकिन इस बार सरकार ने ऐन चुनाव के पहले ही दारूबंदी की घोषणा कर दी थी। इसलिए मुखिया जी को जो वोट दारू के बदौलत बेसुध हुए मतदाताओं से मिल जाते थे, उसको लेकर संदेह हो गया है कि होश में उंट किस करवट बैठेगा।


