-रमावती देवी की पीड़ा से अनजान हुए अपने-पराए
पुरुषार्थ सिंह
मऊ : सियासत अपना पीठ थपथपाने में लगी है। विकास के दावे हैं। इस बीच वीर रस के कवि की बेवा इस बात से हल्कान है कि न सिर्फ उसकी बल्कि उसके परिवार,गांव की सुधि लेने वाला कोई न रहा। जी हां मैं बात कर रहा हूं हल्दीघाटी, जौहर, जय हनुमान, परशुराम, शिवाजी, त्रेता के दो वीर, आरती जैसी कालजयी रचनाओं के प्रणेता श्यामनरायन पांडेय की। जिसके रचनाधर्मिता के साथ ओजस्वी वाणी की अनुगूंज से देश का लगभग सभी कोना गुंजित होता रहा। कवि पंडित जी के ओजस्वी स्वर की निनाद रोम-रोम में राष्ट्रभक्ति का भाव उदित कर देता था। उनके जाने के बाद सत्ता में बैठे स्वार्थी तत्वों ने साजिशन जहां पाठ्यक्रमों से उनकी रचनाओं को बाहर कर दिया, वहीं उनके परिवार की सुधि लेने वाला भी कोई नहीं रहा।
गुणगान तो किया परिवार को भूल गए
पंडितजी के नाम का गुणगान करने वाले उनके परिवार की स्थिति और सहयोग की दिशा में प्रयास करने के लिए न हीं कोई जनप्रतिनिधि पहुंचा, न प्रशासन। मदद की आस लिए उनकी बेवा 90 वर्षीय रामवती पांडेय की सुनी आंखे उजाले की उम्मीद में पथरा गई हैं।
उनका हाल पूछने पर वह एकबारगी फूट ही पड़ीं। बताया कि गांव के विकास के लिए पंडितजी ने राष्ट्रीय राजमार्ग से सड़क का निर्माण कराया। आयुर्वेदिक व पशु चिकित्सालय का निर्माण कराया। स्कूल, पंचायत भवन सहित अनेक कार्य किए। क्षेत्रीय लोगों से उनका लगाव इस कदर था की ताजोपुर गांव में आयोजित काव्य गोष्ठी के लिए दिल्ली में मिलने वाले सम्मान को लेने वह नहीं गए। वहीं गांव-समाज आज पराया सा हो गया है। पेयजल के लिए हैंडपंप, राशन कार्ड और पेंशन जैसे छोटे कार्यों के लिए कहने के बाद भी कोई सुनने को तैयार नहीं।
कहती हैं चुनाव के दौरान सब कुछ करने की बात करने वाले लोग जीत के बाद पहचानते तक नहीं। कभी-कभार कोई साहित्य क्षेत्र और प्रशासन से जुड़े लोग हाल-चाल जानने आते हैं। सबसे अपनी स्थिति को बयां नहीं किया जा सकता।
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सांसद ने दिया है पंडित जी को धोखा
रमावती देवी डुमरांव को आदर्श गांव के रुप में गोद लेने पर नाराजगी व्यक्त करते हुए बताती हैं कि वीर रसावतार के गांव को गोद लेकर सांसद ने अपनी बड़ी सोच का परिचय देते हुए खूब वाहवाही लूटी, लेकिन वर्ष भर गुजरने के बाद भी किसी तरह का कोई काम नहीं हो सका। इससे ग्रामीणों में निराशा और अाक्रोश है। इस दौरान उनके नाम से वाचनालय बनता। जहां उनकी रचनाओं का संग्रह और साहित्यिक पुस्तकें होती तो भी कुछ हुआ मान लिया जाता। सांसद ने सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए यह किया। उन्होंने पंडित जी को धोखा दिया है।