अंजली मिश्रा
नयी दिल्ली: कां है मेला बला खिलौना,
कलाकंद, लड्डू का दोना।
चूं चूं गाने वाली चिलिया,
चीं चीं करने वाली गुलिया।
चावल खाने वाली चुहिया,
चुनिया-मुनिया, मुन्ना भइया। लेकिन बदलते हुए दौर में तकनीक ने बच्चों के खेल का पूरा परिदृश्य बदल लिया है। अब वह टीवी से चिपका रहता है। उसे डोरेमौन पसंद है, सीनचैन देखता है..उसी की तरह ऐक्टिंग करता है। हमेंशा इलेक्ट्रानिक गजट से चिपका रहता है। उसी का परिणाम है कि रोज बाजार में नए-नए आकर्षक उत्पाद अपनी धाक जमा रहे हैं, हाट-बाजार में इलैक्ट्रॉनिक खिलौने अटखेलियां करते हुए नजर आ रहे हैं। इस बदले हुए परिवेश में हाथ से की गई कारीगरी और उसके द्वारा तैयार किये गये उत्पादों का बाजार सिमटता जा रहा है। वो कारीगर जो कभी बच्चों के लिए बड़े शौक से खिलौने बनाया करता था, वो आज भी इन खिलौंनों को बना रहा है लेकिन सिर्फ सजावट के लिए। आज ना तो कोई इन खिलौनों से खेलना चाहता है और ना ही इन्हे पसंद करता है। हां घर में सजावट के लिए इन्हे पसंद किया जा सकता है लेकिन अगर बच्चों को ये खिलौने खेलने के लिए दे दिए जाएं तो वो इन्हे पसंद नहीं करेंगे।

ऐसे में इन कारीगरों का संबल बना है दिल्ली स्थित गांधी स्मृति एवं दर्शन समिती। हाल ही में यहां कारीगर हाट का आयोजन किया गया। जहां देश भर से हाथ की कारीगरी करने वाले कारीगरों का जमावड़ा लगा था। ये रीमा हैं। महाराष्ट्र से आईं है लकड़ी से बने अपने खिलौंनों की प्रदर्शनी के लिए। इन खिलौनों को देखकर आपकी बचपन की यादें ताजा तो जरूर हुई होंगी। रीमा को ये उम्मीद है कि आजीविका के रूप में अपनी इस कारीगरी के लिए कोई बाजार इनको यहां मिलेगा। हालांकि लोग इनके स्टाल पर आते जरूर है और बहुत ही जिज्ञासा से खिलौनों को देख भी रहे हैं लेकिन साथ आए बच्चे तो यहां डोरेमोन और छोटा भीम को ही ढूंढते नजर आते हैं। हां वो अपने परिजनों से पूछ जरूर रहे है कि ये है क्या? लेकिन कोई इन खिलौनों को खरीदना नहीं चाहता कोई कीमत ज्यादा बता रहा है तो कोई कह रहा है कि इन खिलौनों से अब बच्चे कहां खेलते है उन्हे तो इलैक्ट्रॉनिक खिलौनें चाहिए। बात ठीक भी है चाइनीज खिलौनों की चकाचौंध के आगे अब इन खिलौनों की क्या बिसात? लोग आ तो जरूर रहे हैं। इनकी कारीगरी के खत्म होते बाजार पर चिंता भी जाहिर कर रहे है लेकिन सच तो ये है कि इन सब के प्रति उत्साह तो उनके अंदर भी नहीं है क्योंकि आखिरकार हम भी तो इसी बाजारवाद की इस अंधी दौड़ का हिस्सा है। लेकिन फिर भी रीमा दर्शकों के मुंह से वाह! कितना सुंदर है, किसने बनाया होगा इसे, बिल्कुल असली लग रहा है। ये सब वाक्य सुनकर के खुश हो रही हैं।

इनका कहना है कि कोई बात नहीं अगर कोई नहीं खरीद रहा तो कम से कम लोग प्रोत्साहन तो दे रहे है। ये प्रोत्साहन भी किसी पुरस्कार से कम नहीं है। इन्हीं के सामने हैं। ये रामकुंवर दोषी है, मध्यप्रदेश के देवास से आई हैं। इनका बरसों से अपने परिवार के साथ खजूर के पेड़ से झाडू बनाने का पुश्तैनी काम है। यहां भी ये अपने दो बेटों के साथ आईं हैं और जैसा कि हम सब जानते हैं कि खजूर की झाडू आजकल बहुत ही कम नजर आती है। गांव देहात की भाषा में इस कूची भी कहते है और बहुत ही शुभ इसे माना जाता हैं लेकिन धीरे-धीरे अब इनकी जगह आधुनिक सफाई के उपकरणों ने ले ली है हालांकि गांव-देहात में आज भी आप खजूर की इस झाडू या यूं कहिए कि कूची से घर की औरतों को घर बहारते देख सकते हैं।
रामकुंवर कहती हैं कि ये काम स्वंय सहायता समूहों की सहायता से ये अपने पुरखों के जमाने से करती आ रही है, लेकिन सरकार की तरफ से कोई खास प्रोत्साहन इन्हें नहीं मिल रहा है। इन सबके बावजूद रामकुंवर निराश नहीं हैं इन्होने एक अनोखा रिकार्ड बनाया है और वो रिकार्ड है एक माचिस की डिबिया में 40 झाडू रखने का रिकार्ड। रामकुंवर का दावा है कि इतनी छोटी झाडू इससे पहले किसी ने नहीं बनाई है। अब तक आपने खजूर की झाडू ही देखी होगी लेकिन रामकुंवर खजूर से लालटेन, गणेश जी की प्रतिमा और भी कई सुंदर कलाकृतियां बनाती है जिन्हे देखकर आप भी हैरान रह जाएंगे। रामकुंवर कहती हैं कि एक समय था जब लोग खजूर की झाडू खरीदते थे और उपयोग भी करते थे लेकिन अब धीरे-धीरे इसका बाजार सिमटता जा रहा है। रामकुंवर को सरकार से भी मदद की उम्मीद है ताकि इस कारीगरी के लिए खत्म होते बाजार को प्रोत्साहन मिल सके।

फोटो: हेमेंद्र गोयल
ऐसे ही देश के अलग-अलग राज्यों से आए कारीगरों को प्रोत्साहन देने के लिए और इनको बाजार उपलब्ध कराने के लिए संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली संस्था गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति की तरफ से राजघाट स्थित गांधी दर्शन के परिसर में कारीगर हाट का आयोजन किया गया। गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के निदेशक दीपांकर श्रीज्ञान कहते हैं कि,—’इसके पीछे गांधी दर्शन का ये उद्देश्य है कि देश के दूर-दराज के गांवों में दम तोड़ती कारीगरी को एक नया जीवन देकर उसे बाजार उपलब्ध कराया जाए। गांधी दर्शन के इस प्रयास से कारीगरों को भी उम्मीद जगी है कि उनके पुरखों ने जिस कारीगरी को अपने बचपन से पाल-पोस के बड़ा किया है उसका अस्तित्व खत्म नहीं होगा।’
