
समस्तीपुर, रोसड़ा: भारत एक कृषि प्रधान देश है। यह बात सुनते-सुनाते हम बड़े हुए हैं। इसका उल्लेख ऋग्वेद और अथर्वेद में भी मिलता है। लेकिन मौजूदा दौर में जलवायु परिवर्तन के कारण किसानों के लिए पारंपरिक फसलों की खेती घाटे का सौदा साबित हो रही है। लेकिन औषधीय पौधों की खेती से किसान जुड़ने लगे हैं और उनके लिए लाभप्रद भी साबित हो रहा है।
जाहिर है, लीक से हटकर अगर काम किया जाए, तो न केवल खेती भी लाभकारी हो सकती है, बल्कि नौकरी के पीछे भाग रहे युवाओं को भी नई राह दिखा सकती है। धीरे-धीरे ही सही, पर बिहार के कई जिलों किसान औषधीय पौधे की खेती कर पारंपरिक तरीके से खेती करने वाले किसानों के लिए नजीर पेश कर रहे हैं।
कुछ किसान अंजीर की खेती कर रहे हैं, तो कोई संतरा की। कोई सताबर, सफेद मूसली, काली हल्दी, तो कोई काली धान की खेती कर रहे हैं। ऐसे ही किसानों की बदौलत आने वाले समय में न सिर्फ किसानों में आर्थिक समृद्धि आएगी, बल्कि उनके कई पारिवारिक सपने भी सच होंगे। उल्लेखनीय है कि औषधीय पौधों की खेती और उपयोग देश में प्राचीन काल से होते आ रहा है। इसे वैज्ञानिक तरीके से कर हम अच्छी आमदनी प्राप्त कर सकते हैं।
औषधीय पौधों की खेती कर किसान बेहतर लाभ कमा सकते हैं। बिहार की मिट्टी में भी कई प्रकार के औषधीय पौधों की बेहतर उपज होती है। सरकारी स्तर पर भी किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। औषधीय पौधों की खेती कर अपनाकर क्षेत्र के किसान आर्थिक रूप से समृद्ध हो सकते हैं। उक्त बातें राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड के निदेशक डॉ संजय बाला ने कहीं।
निदेशक रोसड़ा के कल्पा आश्रम में किसानों के एक दिवसीय प्रशिक्षण शिविर को संबोधित कर रहे थे। शिविर में देश में करीब दो लाख हेक्टेयर में औषधीय पौधों व सुगंध पौधों की खेती होना बताते हुए कहा कि अमृत महोत्सव वर्ष में 75000 हेक्टेयर खेती का नया लक्ष्य रखा गया है। निदेशक ने अधिक से अधिक किसानों को औषधीय खेती से जुड़ने का आह्वान करते हुए इससे होने वाले कई प्रकार के फायदे बताएं। वही उपनिदेशक सौम्यजीत विश्वास ने पादप बोर्ड द्वारा उन्नत किस्म के बीज व पौधे उपलब्ध कराना बताते हुए फसल कटाई प्रबंधन एवं प्रसंस्करण की विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने इस क्षेत्र को सतावर, सर्पगंधा, मेंथा, लेमनग्रास, तुलसी, खस और कालमेघ आदि के लिए उपयुक्त बताया।
क्षेत्रीय सुविधा केंद्र व क्षेत्र के विपणन प्रबंधक सुदीप्तो घोष औषधीय पौधे की मार्केटिंग पर विस्तृत चर्चा किया। उन्होंने विभिन्न प्रकार के पौधों की उपज का अलग-अलग मार्केट होना बताते हुए कहा कि अब किसानों को औषधीय पौधों के बीज को भी बेचने में कोई कठिनाई नहीं है। भारतीय चिकित्सा विज्ञान संस्थान दरभंगा के प्रचार दिनेश्वर प्रसाद औषधीय पौधे और आयुर्वेद का संबंध बताते हुए विभिन्न पौधों से बीमारियों का इलाज होने की जानकारी दी।
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वहीं राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय पूसा के वैज्ञानिक डॉ दिनेश ने किसानों को खेती के वैज्ञानिक तरीके बताए। बिहार के 15 हजार हेक्टेयर भूमि में इस प्रकार की खेती होना बताते हुए कहा किकरीब ढाई हजार किसान इससे जुड़कर आर्थिक तरक्की की राह पर चल पड़े हैं।


