पटना:किसानों के ऋण माफी की मांग समय-समय पर उठती रहीं हैं। सरकारें किसानों की मांग के मद्देनजर सियासी गुणा भाग बिठाके ऋण माफी की घोषणाएं करती रही हैं। मंदसौर में हुए हिंसक किसान आंदोलन के बाद एक बार फिर से यह मांग तेजी से उठी है। जगह—जगह किसान गोलबंद हो रहे हैं। आंदोलन की खबरें आ रही हैं। पक्ष—विपक्ष में अलग—अलग तर्क आ रहे हैं। माफी से क्या बदलेगा इसको लेकर चर्चा है।
कई राज्यों ने की ऋण माफी की घोषणा
यूपीए प्रथम शासनकाल के दौरान वर्ष 2008 में कृषि ऋण माफी की घोषणा गई थी। तब से लेकर वर्ष 2014 तक 16 हजार किसानों ने आत्महत्या की। केवल बात सिर्फ इस महीने जून की की जाए, तो लगभग एक लाख करोड़ रुपए की कृषि ऋण माफी का ऐलान किया जा चुका है। इसमें उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना व महाराष्ट्र राज्य शामिल है। आने वाले दिनों में अगर पंजाब सरकार अपनी चुनाव पूर्व घोषणा को पूरी करती है, तो इस आकड़े और इजाफा देखने को मिल सकता है। इस इस् कड़ी मे एक और राज्य मध्य प्रदेश के भी देर-सबेर शामिल होने की पूरी गुंजाइश है।
नरेंद्र मोदी शासनकाल के दौरान वर्ष 2015 में 8007 किसानों ने आत्महत्या की। किसानों को दी जाने वाली ऋण माफी की सबसे बड़ी पहली घोषणा वर्ष 1990 में की गई थी। वहीं वर्ष 2008 में जीडीपी के 1. 3फीसदी के बराबर की कृषि ऋण माफ की गई इसे आंकड़ों में देखें, तो लगभग 65 हजार करोड़ रुपया सामने आता है। माना जा रहा है कि 2019 लोकसभा चुनाव से पहले लगभग 2.57 लाख करोड़ की किसान ऋण माफ करने की घोषणा विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा की जा सकती है। पिछले 9 वर्षों में राष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए तो लगभग 18928 करोड़ रुपए की किसान ऋण माफ की गई है। इन आंकड़ो को देखने से साफ जाहिर होता है कि मर्ज कुछ और है और इलाज कुछ और हो रहा है। ऋण माफी से किसानों को कितना भला होगा, खेती किसानी का परिदृश्य कितना बदलेगा, खेती कितनी लाभप्रद होगी इस पर चर्चायें आगे भी होती रहेंगी। लेकिन वर्तमान में जो सवाल है वो यह है कि क्या ऋण माफी की घोषणाएं राजनीतिक दलों का चुनावी जीत हासिल करने का निवेश मात्र है?या सियासत अपनी बिसात पर किसानों को तौल रही है।


