कॉरीडोरों की सरकारी मुहिम को विराम दने के लिए और इसके लिए लोगों को एकजुट करने के लिए जनआंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय एवं अन्य जनाधिकार संगठन मिलकर ” कॉरीडोर विरोधी संघर्ष अभियान” के बैनर तले एकजुट होकर लंबी लड़ाई की तैयारी में हैं। दो दिवसिय बैठक में फैसला लिया गया कि सरकार की कॉरीडोर के जरिए जमीन से बेदखल करने वाले नीतियों के खिलाफ अक्टूबर से देश भर में पदयात्रा किया जाएगा।
अच्छे दिन आने वाले हैं..प्रधानमंत्री के इस नारे ने लाखों लोगों के मन में नयी उम्मीद जगाई। लेकिन ये अच्छे कैसे दिन कैसे आयेंगे? किसके लिए आयेंगे यह सवाल आज देश के गांव—गांव में पूछे जा रहे हैं। क्या खेती को बढ़ाकर किसानों के अच्छे दिन आयेंगे या फिर उद्योगीकरण के जरिए। अब उद्योग लगेगा तो संकुल भी विकसित करने होंगे..कॉरीडोर भी बनाना होगा। ट्रेड कॉरीडोर,फ्रेट कॉरीडोर..औद्योगिक कॉरीडोर आदि। लेकिन ये कॉरीडोर बनेगा तो फायदा किसको होगा। उनको जो किसान हैं,मजदूर हैं, जिनकी हजारों एकड़ जमीन इस कॉरीडोर में जाएगी। और शुरू होगा विस्थापन का खेल। पलायन की प्रवृति। मुआवजे का झुनझुना। सरकार कॉरीडोर की घोषणा करती है। उद्योगों खासकर बड़े कॉरपोरेट घरानों की बांछे खिल उठती हैं। लेकिन जमीन कितना जायेगा। इससे जुड़े लोगों के वैक्लिपक रोजगार की क्या व्यवस्था होगी इस पर एक तरह की चुप्पी होती है।
मेधा पाटकर कहती हैं कि सरकार दिल्ली—मुंबई या फिर कोलकाता अमृशहर इंडस्ट्रियल कॉरीडोर की घोषणा करती है। अचानक किये गये इस सरकारी घोषणा से यह पुख्ता होता है कि इस पर रह रहे आदिवासी और किसान एक बार में ही इस औद्योगिक कॉरीडोर के दायरे में आ जाते हैं। घोषणा हुई दिन बीते,महीने गुजर गये। लोग आश्चर्य में होते हैं.गांव में तो कोई आया नहीं। लेकिन उनकी जमीन पर उनका दावा हो गया। किसान सोच में पड़ जाता है, आखिर ये कौन लोग हैं जो बिना उनकी सहमती के ही,बिना उनसे पूछे उनके भाग्य का फैसला कर रहे है। मेधा कहती हैं ऐसा ही अनुभव है इस औद्योगिक कॉरीडोर के निवासियों का जो समझ ही नहीं पा रहे कि उनके भाग्य का फैसला लेने वाला कौन है। वे पूछती हैं आखिर जनहित और जनता की भलाई के नाम पर बिना जनता से पूछे फैसले कैसे लिए जा रहे हैं। देश में जिस तरह से औद्योगिक बनाने की घोषणा में जनता की कोई भागादारी नहीं है,उससे ऐसा लगता है कि उनके सप्रभुता के अधिकार और जन संस्थाओं पर चोट किया जा रहा है। सर्वहारा जन आंदोलन, रायगड की नेता उल्का महाजन की राय है कि दिग्गी औद्योगिक पोर्ट एरिया के 78 गावों के 67,000 हजार एकड़ भूमी के अधिग्रहण के लिए अधिसूचना जारी कर दी गयी। लेकिन इन योजना बनाने वालों में से किसी के पास उनलोगों को बताने के लिए कोई प्रोजेक्ट प्लान नहीं है,ताकि वे उन्हें सही जानकारी दे सकें। परियोजना प्रस्तावित हो गयी। लेकिन किस तरह का निवेश या उद्योग आयेंगे इसे लेकर अनिश्चितता है। साफ है, योजना सिर्फ जमीन के लूट के लिए है। बड़ी आबादी के विस्थापन के लिए यह योजना है। कोई भी इस तरह की योजना सिर्फ बड़े उद्योगों के लिए बनाई जाती है। जनसघर्ष समन्वय समिति से जुड़े अनिल चौधरी की राय है कि सरकार जापान, सिंगापुर, हांगकौंग, जमर्नी,यूके, अमेरिका आदि विकसित देशों के साथ गंठजोड़ कर वहां के बड़े कॉरपोरेटों को लाभ पहुंचाने के लिए इस तरह की योजनाएं हैं। यहां तक की योजनाकारों को न भूमि की चिंता है, न पानी की, न जंगल की बस उन्हें ये सब चाहिए कारपोरेटों के लिए।
सरकार कॉरीडोर की घोषणा कर रही है लेकिन जो जमीनी स्थिति है उससे यही पता चलता है कि चुने हुए प्रतिनिधि यानी मुखिया,सरपंच विधायक और कुछ हद तक सासंद भी इन प्रोजेक्ट के विषय में नहीं जानते और उनकी राय नहीं ली गयी है। न तो ग्राम सभा से पूछा गया, न पंचायत से, न म्यूनिसपेलेटी से, न नगर निगम से। ऐसा लगता है कि पूरी सरकारी मशीनरी सलाहकारों के अधीन हो गयी है जो विकास के नाम पर निजीकरण को बढ़ावा दे रहे है।
कॉरीडोरों की सरकारी मुहिम को विराम दने के लिए और इसके लिए लोगों को एकजुट करने के लिए जनआंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय एवं अन्य जनाधिकार संगठन मिलकर ” कॉरीडोर विरोधी संघर्ष अभियान के बैनर तले एकजुट होकर लंबी लड़ाई की तैयारी में हैं। दो दिवसिय बैठक में फैसला लिया गया कि सरकार की कॉरीडोर के जरिए जमीन से बेदखल करने वाले नीतियों के खिलाफ अक्टूबर से देश भर में पदयात्रा किया जाएगा।


