ज्ञानेंद्र रावत,पर्यावरण कार्यकर्ता
- कुछ निजी आकलनों के मुताबिक, यूरोप में कुछ वर्षो में गौरैया की तादाद में करीब 85 प्रतिशत की कमी आई है।
- ‘हेल्प हाउस स्पैरो’ नाम से चल रहे वैश्विक अभियान में हमारी सरकार ने कोई खास पहल नहीं की है।
मुङो आज से पांच दशक पहले का समय याद आता है, जब घर के आंगन में गौरैया बेखौफ फुदकती थी और घर वालों को उसका फुदकना, चहचहाना बहुत भाता था। उसकी चहचहाहट को घर के लिए शुभ माना जाता था, लेकिन आज उसी गौरैया के दर्शन दुर्लभ हो गए हैं। ऐसा लगता है कि उनके बिना घर का आंगन सूना है। भारत, यूरोप, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और कई अमेरिकी देशों में पाई जाने वाली गौरैया अब कस्बों और गांवों से भी लुप्त हो चुकी हैं। यदि कहीं कभी उसके दर्शन हो गए, तो आप अपने को खुशकिस्मत समङिाए। हमारे देश में पक्षियों की तादाद जानने-बताने के लिए मुंबई में ‘बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी’ (बीएनएचएस) और ‘सलीम अली सेंटर फॉर ऑर्निथोलॉजी ऐंड नेचुरल हिस्ट्री’ हैं। लेकिन विडंबना यह है कि इन केंद्रों के पास गौरैया से संबंधित कोई जानकारी नहीं है। सरकार के पास भी नहीं।
यूरोप में चिड़ियों-पक्षियों की संख्या की जानकारी के लिए एक पूरा तंत्र है, पर दुखद है कि गौरैया के बारे में वह भी नाकाम साबित हुआ है। यदि बीते वर्षो के कुछ निजी आकलनों पर गौर करें, तो पता चलता है कि वहां कुछेक वर्षो में गौरैया की तादाद मेंतकरीबन 85 प्रतिशत की कमी आई है।इसकी विलुप्ति के पीछे अनगिनत कारण हैं। सबसे पहला कारण तो यही है कि आदमी में प्रकृति और इसके प्रति भावनात्मक जुड़ाव का अभाव और उसके रहन-सहन के तरीकों में बदलाव आया है। नए-नए तरीकों के बनते बहुमंजिला मकानों की वजह से गौरैया के लिए अपने घोंसले बनाने की जगह ही नहीं रही। घर की स्त्रियों द्वारा गेहूं भिगोकर आंगन में सुखाने की प्रवृत्ति के ह्रास के चलते गौरैया ने घरों से मुंह मोड़ लिया। देश में दिन-ब-दिन बढ़ती टावर संस्कृति और पर्यावरण प्रदूषण के कारण भी इनकी संख्या कम हो रही है। दरअसल, बढ़ते मोबाइल टावरों के विकिरण के कुप्रभाव से गौरैया के मस्तिष्क व उनकी प्रजनन क्षमता पर घातक असर पड़ा है। साथ ही वे दिशा भ्रम की शिकार होती हैं, सो अलग। गौरैया की संख्या सिमटते जाने की एक बड़ी वजह विकसित व विकासशील देशों में बिना सीसा वाले पेट्रोल का चलन है। इनके जलने से उत्पन्न होने वाले मिथाइल नाइट्रेट नामक जहरीले यौगिक से छोटे-मोटे कीड़े-मकोड़े खत्म हो जाते हैं। ये गौरैया को बेहद प्रिय हैं, जिन्हें वे बड़े चाव से खाती हैं। जब वे उसे खाने को ही नहीं मिलेंगे, तो वे जिएंगी कैसे? बढ़ते शहरीकरण, कंक्रीट की ऊंची इमारतों और जीवन की आपाधापी के बीच आज व्यक्ति के पास इतना समय ही नहीं है कि वह अपनी छतों पर कुछ जगह ऐसी भी छोड़े, जहां पक्षी अपने घोंसले बना सकें। यदि लोग बचे हुए अन्न के दानों को नालियों, सिंक में बहने से बचाएं और उनको छत की खुली जगह पर डाल दें, तो उनसे गौरैया अपनी भूख मिटा सकती है। पर आधुनिक भवन संरचना में दाने सीधे नालियों में गिरते हैं।आज सत्ता में बैठे लोगों में शायद ही कोई ऐसा हो, जो पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशील नजरिया रखता हो, उनके बारे में कुछ जानकारियां रखता हो, उन्हें पहचानता हो। इस मामले में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की जितनी भी प्रशंसा की जाए, वह कम है। एक बार भरतपुर प्रवास के दौरान उन्होंने केवलादेव पक्षी विहार में तकरीबन 80 चिड़ियों को उनके नाम से पहचानकर सबको चौंका दिया था। हमारे यहां ‘नेचर फॉरएवर सोसाइटी’ के संस्थापक दिलावर मोहम्मद खान अकेले ऐसे शख्स हैं, जो बीते डेढ़ दशक से गौरैया को बचाने के अभियान में लगे हैं। देखा जाए, तो गौरैया को बचाने के आज तक किए गए सभी प्रयास नाकाम साबित हुए हैं। ‘हेल्प हाउस स्पैरो’ नाम से समूचे विश्व में चलाए जाने वाले अभियान में हमारी सरकार की ओर से कोई सकरात्मक पहल नहीं की गई। यहां तक कि गौरैया को बचाने की दिशा में सरकार ने न कोई कार्यक्रम बनाया और न ही बाघ, शेर, हाथी की तरह कोई प्रोजेक्ट बनाने पर ही विचार हुआ। देश में पहले ही जीव-जंतुओं-पक्षियों की हजारों प्रजातियों के अस्तित्व पर संकट है, उसमें गौरैया और शामिल हो जाएगी, तो सरकार पर कोई खास फर्क पड़ने वाला नहीं। मगर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली का तो यह राजकीय पक्षी है। दुख यह है कि इस बारे में सब मौन हैं। ऐसे में, गौरैया आने वाले समय मे सिर्फ किताबों में रह जाए, तो क्या आश्चर्य! (ये लेखक के अपने विचार हैं.. हिन्दुस्तान से साभार)
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