नीरज प्रताप सिंह
दो दिन से रौनक बाबू गंगा स्नान की जिद लगाए हुए था,सो आज उसे ले गया गंगा स्नान को,पहली बार आये थे इस घाट पर नहाने। वे नदी में डुबकी लगा रहे थे, पानी के साथ किलोल कर रहे थे। जब तक वे किनारे पहुंचे तो बहुत सारी पुरानी बातें चलचित्र की भांति नज़रों के सामने घूमने लगी। जिस जगह पर नदी बह रही है वहां पर कभी तीन—तीन गांव हुआ करता था, बिश्वाश नहीं हो रहा था कि अब वो गाँव सिर्फ कागजों पर ही है। उत्सुकता हुई, पास ही परसादी मंडल मिले जो उन्होंने बताया अविश्वश्नीय था। एक—एक कर सारे घर व जमीन गंगा में समाते चले गए। लोग सिर्फ अपने उजड़ने का तमाशा देखते रहे। कल तक जो जमींदार कहलाते थे, कई जोड़े हल बैल खेत और दरवाजे की शोभा बढाते, मानो उनकी संपन्नता की कहानी कह रहे हो। आज उनके घर हरनाधा टंगा गया। फिर ख्याल आया जब घर ही नहीं तो फिर कहां हल और कहां नाधा। आज भिखारी बन गए थे। कुछ भी तो बचा नहीं पाये।सिर्फ किसी तरह जान बची , आखिर क्या कर सकते थे प्रकृति के आगे किसका बस चला है, कोई रिस्तेदार के यहाँ चला गया तो कोई आज सड़क के किनारे झोपड़ी बना के रह रहा है। कमलाकुंड ,बिंदटोली और बुद्धुचक ये तीन तीन गांव हुआ करता था यहां। हजारों एकड़ कि जमीन को गंगा ने लील लिया ,पूछा ये हुआ कैसे जीतनी मुंह उतनी बातें। पचास-सौ सालों में गंगा अपना रास्ता बदलती है ,तो कुछ नौजवान का कहना था कि भागलपुर में गंगा नदी पे जो पुल बना उसी में इंजीनियरों से कुछ गलती हो गयी और गंगा अपने पुरानी रस्ते से कुछ मु गयी ,,,,इन बातों में कितना दम है ये तो बिशेषज्ञ ही बता सकते हैं ,


मैंने पूछा, सरकार से मदद तो मिली होगी? जबाब हैरान करने वाले थे। बाबू, सरकार के ओर से तीन सौ करोड़ से ज्यादा खर्च हो गए, तीन सौ करोड़ जानते हैं न कितना होता है ? एक करोड़ में एक सौ लाख होता है ,अब आप सोच लीजिए। मदद के नाम पे हर साल फंड आ रहा है, बाँध बन रहा है और टूट रहा है। गंगा के साथ साथ भ्रष्टाचार कि गंगा भी बहा रही है ,लेकिन कटाव साल दर साल जारी है, जम के यहाँ इस भ्रष्टाचार कि गंगा में डुबकी लगायी जा रही है ,गंगा में कटाव तो रुकी नहीं तो क्या फायदा इसमें पैसा बहने से ? जितना इसपर खर्च हुआ है अगर उसका आधा भी पीड़ितों में बाँट दिया जाता तो सबक घर बन गया होता।
देखना है तो कुछ दिन बाद यहाँ आइएगा जब पानी बढ़ेगा ,तब देखिएगा बाँध में काम पे लूट शुरू होगा।
कभी ये जमीन सोना उगलती थी। नौगछिया का फेमस मकई का कटोरा कहलाता था ये क्षेत्र। गेंहूं ,सरसों ,परवल ककड़ी खीरा तरबूज ,खरबूजे जो भी लगाइए जम के होता था ,लेकिन आज उस जमीन पे नदी बह रही है ,जमीन जाने के साथ- साथ इस इलाके में अपराध भी बढ़ गया है ,जब लोगों के पास कुछ नहीं बचेगा तो यही होगा, जब बाढ़ का पानी उतरेगा तो बहुत सारी जमीन खेती योग्य निकलती है जिसमें कलाई (उरद )कि खेती जम के होती है जो बिना खर्चे कि खेती है ,और तब शुरू होता है जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहाबत,,,क्योंकि नदी से जो जमीन निकलती है वो पता लगाना मुश्किल होता है कि वो जमीन किसकी है। औेर इसी कारण शुरू होता है दबंगई जो दबंग है वो इस जमीं पे कब्ज़ा कर खेती करता है इस चक्कर में हर साल हत्याओं का दौर शुरू होता है ,,,,,यानि यों कहें कि यहाँ के लोगों को हर तरह का दर्द सहन होता है ,जमीन जाने का दर्द ,अपनों को खोने का दर्द ,और लगी लगाई फसल बाढ़ में डूबने का दर्द ,,,,,कुछ लोग आशान्वित हैं कि फसल बीमा से अब फसल बर्बाद होने पे नुकसान नहीं होगा ,लेकिन ये धरातल पे जब उतरेगा तब न तब तक इन्तजार कीजिये। एक लाइन याद आ गयी कि….जख्म खाये हैं इतने मैंने कि दर्द परेशां हैं कि उठें कहाँ से!

