खुद से सवाल करके गंगा को बचाने के रास्ते
- क्या गंगा ने ही देश को सोने की चिड़िया नहीं बनाया?
- क्या फरक्का और टिहरी में बांध बनाने से गंगा की धारा अविरल और प्राकृतिक रह गई?
- क्या गंगा और उसकी सहायक नदियों में शहरों की नालियों का मलमूत्र डालने के बावजूद उसकी पवित्रता कायम रह सकती है?
- क्या गंगा के किनारे लगाए गए बड़े बड़े कारखानों से निकलने वाली गंदगी को नदियों में बहाने की छूट मिलनी चाहिए?
- क्या खेतों में रासायनिक खाद और जहरीले कीटनाषक डालकर उन्हें नदियों में जाने से रोक सकते हैं?
- क्या पहाड़ और मैदानों में लगे विशाल जंगलों को काटकर भी गर्मी को बढ़ने से रोका जा सकता है?
- क्या बाढ़ की समस्या का बड़ा कारण पहाड़ों पर जंगलों का विनाश नहीं है?
- क्या भ्रष्टाचार के कारण ठेकेदारों और खान कंपनियों को अवैध खनन की छूट नहीं मिली हुई है?
- क्या नदियों में डाल्फिन, कछुए और मछलियों का अस्तित्व और उनपर निर्भर मछुआरों आदि का अस्तित्व एक दूसरे के बिना बच सकता है?
- क्या प्लास्टर आफ पेरिस और जहरीले रंगों से बनी देवी-देवताओं की मूर्तियों और पूजन सामग्री को गंगा में बहाकर हम उचित करते हैं?
- सिकुड़ते ग्लेशियर और नष्ट किए जा रहे जंगल से बढ़ते भू-धसान और प्राकृतिक जलस्रोतों पर अवैध निर्माण, कब्जा आदि से क्या गंगा नदी सूखती नहीं जा रही ?
- नदियों के नष्ट होने से भूमिगत जलस्तर भी घटता नहीं जा रहा?
- पेयजल हो, सिंचाई, उद्योग या अन्य कार्य अन्धाधुंध भूमिगत जलदोहन से क्या हम जल के अंतिम भंडार को भी समाप्त कर देने की ओर नहीं बढ़ रहे?
- नदियों के जल बंटवारे के नाम पर क्या हमारा देश विखंडन के कगार की ओर नहीं बढ़ रहा?
- हमारे लोभ और मूर्खतापूर्ण कुकृत्यों से हमारी राष्ट्रीय नदी मर रही है, क्या यह हमारे द्वारा गंभीर राष्ट्रद्रोह नहीं है?
- क्या आरती करने से गंगा की रक्षा हो जाना संभव है?
- क्या इस अन्याय का विरोध जरूरी नहीं है ?
इन सवालों का जवाब आपको खोजना है। आपके जवाब से गंगा को बचाने के रास्ते निकल सकते हैं। इसी उम्मीद के साथ अभियानियों का एक जत्था हुगली से निकल पडा है और गंगोत्री तक जाएगा। इस बीच हर मुलाकाती के समक्ष सवाल रखे जाएगे। गंगोत्री से लौटकर हरिद्वार मातृसदन में तीन दिनों की संगोष्ठी होगी। गंगा बचाने में सक्रिय हर अभियानी के लिए ‘मातृसदन’ तीर्थ बन गया है और 13 जून देवता के तिरोभाव का दिवस। वहां होने वाली संगोष्ठी में कोई रास्ता निकलने की उम्मीद स्वाभाविक है।
गंगा का सांस्कृतिक महत्व है। यह सांस्कृतिक महत्व गंगा के पवित्र भौतिक जल से शुरू होता है। यह जल जीवों का प्राण है। गंगा के कारण ही खेत और खलिहान आबाद हुए, बस्तियां बसी, नगर बसे। कवियों ने गीत गाए, काव्य और महाकाव्य लिखे गए। लाखों कहानियां है उसकी। अगर उसके किनारे किसानों के घर है तो बुनकरों की बस्तियां भी हैं। लाखों मछुआरे परिवार हैं जो गंगा पर निर्भर हैं। गंगा ने किसी के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार नहीं किया। जो भी उसके पास गया, उसने अपना सर्वस्व दान किया, चाहे हिन्दु हो या मुसलमान, सिख हो या ईसाई। लेकिन हम सबने क्या किया?
हम सबने जो किया, उसका कुल परिणाम हुआ ……..
कि गंगा का पानी न पीने लायक रहा न नहाने लायक।
कि गंगा की गहराई घट गई। उसका पेट रेत से भर गया।
कि बाढ़ और जल-जमाव की समस्या गहरा गई।
कि हजारों एकड़ जमीन गंगा के पेट में समा गई।
कि गंगा किनारे बसे नगरों और बस्तियों के लोग तरह-तरह की बीमारियों के शिकार होने लगे।
कि गंगा की मछलियों और जीवों का घोर अभाव होने लगा।
इन सवालों का क्या उत्तर सोचा आपने………..



