उनकी प्राथमिकताओं में नहीं पर्यावरण

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पूरी दुनिया पर्यावरण के खतरों को लेकर चिंतित है, लेकिन हमारे देश के राजनीतिक दलों को ये खतरे समझ में नहीं आते।

अनिल प्रकाश जोशी,पर्यावरणविद
पांच राज्यों में राजनीतिक दंगल जोरों पर है। सभी दलों ने घोषणापत्र जारी करने व तमाम तरह के वायदों की शुरुआत कर दी है। इन घोषणापत्रों को लुभावना बनाने की होड़ लगी है। कहीं दूध, घी, मक्खन, स्मार्टफोन, लैपटॉप वगैरह बांटने के वायदे किए जा रहे हैं, तो कहीं अन्य तरह की सेवाएं मुफ्त देने का जिक्र किया जा रहा है। वे सारी चीजें, जिनसे वोट हासिल हो सकते हैं, इन घोषणापत्रों में शामिल की जा रही हैं। लेकिन अब इनमें आपको ऐसा कोई वायदा नहीं मिलेगा, जो कोई बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव ला सके। आजकल के घोषणापत्रों में न तो ऐसी नीतियों की घोषणा होती है और न ही ऐसी किसी परियोजना का जिक्र होता है, जिससे अच्छे भविष्य का आश्वासन मिलता हो। पूरी दुनिया पर्यावरण-प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन को मानवता के आगे संकट की तरह देख रही है, लेकिन हमारे राजनीतिक दलों के लिए इनका जैसे अस्तित्व ही नहीं है।यही वजह है कि किसी भी पार्टी का घोषणापत्र हवा, मिट्टी और पानी जैसे लोगों के जीवन से जुड़े मुद्दों की बात करता नहीं दिखाई देता। पुराने दिनों में इन सबकी अनदेखी चल जाती थी, क्योंकि तब वातावरण के हालात इतने गंभीर नहीं हुए थे, पर अब इन्हें नजरअंदाज किया जाना आश्चर्यजनक तो है ही, चिंताजनक भी है।

कुछ दल तो अपने घोषणापत्रों में इनका जिक्र तक करना जरूरी नहीं समझते, तवज्जो तो खैर कोई भी नहीं देता।अगर हम चंद रोज पहले ही विदा हुए साल के आंकड़े को देखें, तो समझ सकते हैं कि हालात कितने खराब हो गए हैं। लोगों को इनका खामियाजा भी भुगतना पड़ रहा है। पानी का जिक्र करें, तो चाहे उत्तर प्रदेश हो या फिर उत्तराखंड, सभी राज्यों में पिछली गरमियों में पानी की कमी ने हाहाकर पैदा कर दिया था। और पंजाब तो अब भी अपने पड़ोसी हरियाणा से पानी के बंटवारे की लड़ाई लड़ रहा है। पिछले साल देश में 33 करोड़ लोगों ने इस भारी आपदा को ङोला था। उत्तर प्रदेश में तो कई जिलों व सैकड़ों गांवों पर सूखे की मार पड़ी थी। फिर भी पानी का यह मुद्दा चुनाव लड़ रहे दलों के घोपणापत्रों से गायब है। तकरीबन वे सभी राज्य, जहां इस समय विधानसभा चुनाव की गहमागहमी है, किसी न किसी रूप में पानी की बड़ी मार की चपेट में थे। पूरी गरमी लंबी पाइप लाइनें, जल रेल और अन्य जल-वाहन जोर-शोर से पानी की जरूरतें पूरी करने में जुटे रहे। मगर सभी जगह पानी उपलब्ध कराने के वायदे शायद इतने बड़े नहीं माने जाते कि उनसे वोट मिल सकें, इसलिए घोषणापत्रों में इनकी जगह नहीं होती।वायु का हाल तो और भी गंभीर हो चला है। राजधानी दिल्ली से हर दूसरे रोज वायु प्रदूषण के खतरनाक स्तर को पार कर जाने की चेतावनी आती रहती है, लेकिन पंजाब और उत्तर प्रदेश के हालात भी कोई बहुत अच्छे नहीं हैं। इन प्रदेशों के कई इलाके दूषित वायु की चपेट में आ चुके हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, अपने देश के कई शहर प्रदूषण की अंतरराष्ट्रीय फेहरिस्त में स्थान बना चुके हैं। इनमें कानपुर, लखनऊ, वाराणसी जैसे शहर शामिल हैं। हालांकि अमृतसर, लुधियाना, देहरादून व हरिद्वार भी कोई बहुत पीछे नहीं हैं। पंजाब में तो फसल की कटाई के बाद पराली जलाने से जो धुआं उठता है, वह आस-पास के कई प्रदेशों की हवा को जहरीला बना देता है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी के प्रयासों के बाद भी इसे पूरी तरह से रोका नहीं जा सका है। ज्यादातर युवा ही इसके शिकार बन रहे हैं, लेकिन हमारे राजनीतिक दलों के कानों पर मानो जूं तक नहीं रेंग रही।वनों को अक्सर हम पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण से गंभीर मसला नहीं मानते हैं, लेकिन आज भी वन गांवों की सामाजिकी, आर्थिकी का बड़ा हिस्सा हैं।

वन के गिरते हालात पर कहीं कोई राजनीतिक पार्टी गंभीर नहीं दिखाई देती। पंजाब और उत्तर प्रदेश के जंगलों के हालात देश में सबसे ज्यादा गंभीर हैं। उत्तर प्रदेश में अभी 33 प्रतिशत की जरूरत की बजाय महज पांच प्रतिशत वन हैं, जबकि पंजाब में वनों का पूरा सफाया ही हो चुका है। उत्तराखंड में जहां वन हैं भी, वहां उनकी गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं। यहां तो हर वर्ष लगने वाली आग बाकी बचे वनों को स्वाहा करने में जुटी है।अमूमन ऐसे हालात पूरे देश के हैं। पर्यावरण के बिखरते-बिगड़ते हालात को कोई भी तवज्जो देने वाला नहीं। इससे उपजी आपदाएं एक बार बड़ा शोर पैदा करती हैं, मगर परिस्थिति के सामान्य होने पर सब कुछ वैसे ही र्ढे पर चल पड़ता है। ऐसे में, राजनीतिक दलों द्वारा इनकी अनदेखी ज्यादा गंभीर मुद्दा है। आखिर उन्हें ही तो राज्य व देश को दिशा देनी है। अगर वही संजीदगी नहीं बरतेंगे, तो हालात बद से बदतर की ओर ही जाएंगे। यह सब अनदेखी तब हो रही है, जब पूरे देश में पर्यावरण के हालात बिगड़ते जा रहे हैं। देश का एक भी राज्य ऐसा नहीं, जो पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण से बेहतर कहा जाए। कहीं जल संकट है, तो कहीं अतिवृष्टि व अन्य प्राकृतिक आपदाएं अपना गुस्सा जता रही हैं। मगर तब भी ये सब विषय किसी भी राज्य में राजनीतिक दलों की प्राथमिकता में दिखाई नहीं देते।क्या पर्यावरण के मुद्दे हमारी राजनीति में हमेशा गौण ही बने रहेंगे? अगर हमारी राजनीतिक पार्टियां इनके प्रति असंवेदनशीलता बरतती हैं, तो क्या समाज को भी इन मसलों पर चुप्पी साध लेनी चाहिए? इस बात से ऐतराज नहीं है कि पर्यावरण से जुड़े संगठन और कार्यकर्ता अभी इन मसलों को लेकर इतनी जन-जागरूकता नहीं फैला सके हैं कि लोग इन्हें सबसे बड़ा मुद्दा मान लें। इसलिए उन्हें समाज को सड़क, अस्पताल, शिक्षा जैसी बुनियादी आवश्यकताओं के साथ जल, जंगल और जमीन जैसे मसलों को समझाना चाहिए। चूंकि संकट हमारे सिर पर है, इसलिए अगर कोशिश की जाए, तो लोग इस खतरे को आसानी से समझ जाएंगे। प्रदूषण के रूप में तो वे वैसे भी परेशानी ङोल ही रहे हैं। ( हिन्दुस्तान से साभार..ये लेखक के अपने विचार हैं)

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