दीप प्रकाश
‘बजट’ चाहे घर का हो या देश का, मायने तो रखता ही है. यह निश्चित पर देश,समाज,गांव—शहर की दिशा तय करता है। वर्तमान में श्रम ब्यूरो की रिपोर्ट की मानें तो अखिल भारतीय स्तर पर बेरोजगारी दर पांच फीसद पर पहुँच गयी है. ग्रामीण क्षेत्रों में यह दर ५.१ फीसद है. मतलब सवा अरब की आबादी वाले इस देश में १२ करोड़ से भी ज्यादा लोग बेरोजगार हैं (इसमें वे लोग शामिल नहीं, जो असंगठित क्षेत्र में दिहाड़ी मजदूर या अस्थायी कामगार हैं). ऐसे में सभी के लिए संतुलित बजट पेश करना सरकार की चुनौती है. इस कसौटी पर वह कितना खरा उतर पाएगी, यह १ फरवरी को पता चल जाएगा. यह तो हम जानते ही हैं कि हर बजट से पहले सभी क्षेत्रों की निगाहें उस पर टिकी रहती हैं कि इस बार उनके लिए क्या आने वाला है।
आर्थिक-सामाजिक कारणों और बसावट की दृष्टि से हमारा देश दो भागों में बंटा हुआ है- शहर और गाँव. दोनों ही क्षेत्रों की अपनी-अपनी जरूरतें हैं और एक दूसरे से भिन्न हैं. दोनों की अपनी प्रकृति है, अपना रहन-सहन, खान-पान, नौकरी-पेशा. पर, कुछ जरूरतें ऐसी हैं, जो दोनों की समान हैं. जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, पानी. अगर कहीं अंतर है तो वह है जीविकोपार्जन के साधन में. अगर ग्रामीण भारत के लिहाज से बात करें तो वर्तमान में कुछ अच्छी योजनाएं चल रही हैं, जो जरूरी और लाभदायक भी हैं. जैसे- मनरेगा, प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, फसल बीमा योजना, अटल बिहारी जीवन बीमा योजना आदि. इन सब को देखते हुए लोगों को एक खास उम्मीद बंधती दिख रही है कि आगे भी उनके हितों का सरकारख्याल रखेगी. नयी किसी योजना की उम्मीद छोड़ भी दी जाए और मौजूदा योजनाओं पर ठीक से अमल हो जाए तो इसमें कोई दो राय नहीं कि ग्रामीण क्षेत्र को खासा लाभ होगा.
हम देखते आये हैं कि हर बार बजट में लुभावनी बातें की जाती हैं। घोषणाएं करना और उन घोषणाओं को जमीन पर अमल में लाना दो अलग बिंदु हैं. जवाबदेही तय नहीं होती. नतीजा यह होता है कि घोषणाओं का वास्तविक लाभ जन तक पहुंच पाता. ग्रामीण क्षेत्र से होने के नाते मुझे भी उम्मीद है कि इस बार के बजट में उस क्षेत्र के लिए कुछ सार्थक कदम उठाए जाएंगे. गांवों की जरूरतें बहुत सीमित हैं, खेती-बारी से सम्बंधित, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, मकान और पानी जैसी मूलभूत जरूरतें ही ग्रामीणों की होती हैं. अगर इन सभी क्षेत्रों को दुरुस्त कर दिया जाए तो गांवों की तस्वीर बदल सकती है. मूलतः ग्रामीण क्षेत्र आज भी कृषि पर ही आश्रित है. ऐसे में इस बार के बजट से उसने कुछ उम्मीदें पाल रखी हैं, जिन्हें हम निम्न बिन्दुओं के तहत देख सकते हैं-
१. कृषि क्षेत्रों की मिट्टी की नियमित जांच की निःशुल्क व्यवस्था (वर्तमान में व्यवस्था है तो उसके नियमित क्रियान्वयन की जवाबदेही तय हो और अगर नहीं है तो उसकी व्यवस्था की जाए)
२. सूखे को ध्यान में रखते हुए पारंपरिक सिंचाई की व्यवस्था (तालाब, कुंआ, नहर वगैरह की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए)
३. बोआई, सिंचाई और कटाई के वक़्त बिजली की नियमित व्यवस्था
४. कम लागत पर बीज और खाद की व्यवस्था.
५. फसलों के लिए उचित मूल्य निर्धारण, बाजार और भण्डारण की व्यवस्था.
६. ग्रामीण क्षेत्रों में डेयरी उद्योग को बढ़ावा देने वाली योजना.
७. खादी उद्योग के संरक्षण और बाजार निर्माण की व्यवस्था.
८. ग्रामीण विद्यालयों में खाली रिक्त पदों पर योग्य शिक्षकों की भर्ती.
९. हर जिले में सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था और मौजूदा अस्पतालों में डॉक्टरों के रिक्त पदों की भर्ती और सस्ती दवाइयों की व्यवस्था.
१०. हर गाँव को राष्ट्रीय राजमार्ग से जोड़ने की व्यवस्था.
११. ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी परिवहन की व्यवस्था.
१२. बंद पड़ी मिलों और कारखानों को शुरू करने की व्यवस्था.
१३. इन सभी कार्यों को सुचारू रूप से करने के लिए देश के हर जिले में केन्द्रीय कार्यालय.
अगर गांवों से जुड़े आसपास के नगरों, कस्बों और शहरों में सरकारी बाजार की व्यवस्था हो और उस बाजार की जरूरतों को आसपास के ग्रामीण उत्पादों से पूरा किया जाये तो किसानों को अपने फसलों के नुकसान की चिंता से मुक्ति दी जा सकती है. इस क्षेत्र में ‘फसल बीमा योजना’ एक अच्छी पहल है इसे सही क्रियान्वयन के लिए ‘हेल्प डेस्क’ की आवश्यकता होगी. किसानों को कहीं न जाना पड़े, बल्कि बीमा वाले किसानों के पास आयें, ऐसी व्यवस्था करनी होगी. हर जिले में बाजार की व्यवस्था हो, जहाँ सरकार द्वारा कीमतों को निर्धारित किया जाए. ऐसी व्यवस्था से किसान सीधे तौर पर अपनी फसलों को बेच सकता है, बिचौलियों की जरूरत नहीं होगी और उनका मुनाफा भी बढेगा. मुनाफा बढेगा तो क्रय शक्ति बढ़ेगी. इससे बाजारों में काम करने वालों के लिए रोजगार का सृजन भी होगा और साथ ही महंगाई पर भी काबू पाया जा सकता है. परिवहन की उचित व्यवस्था होने से गांव शहरों से जुड़े रह सकते हैं और व्यापार सुलभ हो सकता है. जिले में सरकारी अस्पताल होने से लोग दूसरे शहरों में जाकर दर-दर भटकने से राहत पाएंगे और सस्ती दवाइयों की व्यवस्था से जरूरतमंद लोग दवा के अभाव में असमय मृत्यु को प्राप्त न होंगे. बंद पड़ी मिलों और कारखानों को दोबारा शुरू करने से गांवों में पढ़े-लिखे नौजवानों को या बेरोजगारों को रोजगार मिलेगा, जिससे गांवों की क्रय क्षमता का भी विकास होगा और गांवों से पलायन को रोका जा सकता है. गांवों को राष्ट्रीय राजमार्गों से जोड़ने पर ग्रामोद्योग को सुनिश्चित किया जा सकता है. इन सब के बीच यह ध्यान जरूर देना होगा कि गांवों को लेकर बनायीं जाने वाली योजनाओं में गांवों की पारंपरिक और आधुनिक तकनीक का संतुलन हो, क्योंकि गांवों का विकास शहर के तर्ज पर संभव नहीं.
वैसे उम्मीदें तो बहुत हैं लेकिन फिलहाल इन दस बिन्दुओं को ध्यान में रख कर अगर बजट का प्रारूप तैयार किया जाये तो हम गाँधी के उस सपने के करीब पहुँच सकते हैं, जिसका सपना हर ग्रामीण देखता है. उपर्युक्त बिन्दुओं में कई पर पूर्व से ही योजनाएं बनती रही हैं, लेकिन सिर्फ कागजों पर, जमीनी तौर पर योजनाएं गांवों से बहुत दूर हैं. नयी योजनाओं की घोषणा से अधिक बड़ी चुनौती पुरानी योजनाओं को सही तरीके से लागू करने की होगी.भारत में यह बड़ी समस्या रही है कि योजनाएं तो अच्छी और हितकारी बनती हैं, लेकिन भ्रष्टाचार के कारण उनका कार्यान्वयन ठीक से नहीं हो पाता. राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे तो उन्होंने कबूल किया था कि जनता के लिए सरकार से मिले एक रुपए में १० पैसे ही लाभुकों तक पहुंचते हैं. यानी देश के विकास में भ्रष्टाचार सबसे बड़ा बाधकहै. भ्रष्टाचार पर कड़ी मानीटरिंग से काफी हद तक काबू पाया जा सकता है. केंद्र को चाहिए कि तमाम मौजूदा योजनाओं और आगामी योजनाओं के सही क्रियान्वयन के लिए देश के हर जिले में केन्द्रीय कार्यालय हों, जो ग्रामीण क्षेत्रों का स्वयं निरीक्षण कर उचित निर्णय लें और उनका निदान सुनिश्चित करें. हम यह उम्मीद करते हैं कि केंद्र की सरकार अपने बजट में इसके मद्देनजर उचित प्रावधान करेगी. उम्मीद पर ही दुनिया टिकी है, ऐसा बड़े-बुजुर्ग कहा करते थे। इसलिए सारे अगर-मगर के साथ फिर से उम्मीद का दीया तो लोग जलाए बैठे ही हैं.
