याद किए जा रहे हैं प्रख्यात पर्यावरणविद सुंदर लाल बहुगुणा

मंगरूआ
देहरादून: चिपको आंदोलन के प्रणेता व जंगलों की रक्षा के लिए समर्पित योद्धा गांधीवादी सांचे में ढले प्रख्यात पर्यावरणविद सुंदर लाल बहुगुणा नहीं रहे। शुक्रवार 12 बजे 94 वर्ष के उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनका जन्म नौ जनवरी, 1927 को टिहरी जिले में हुआ था। वे डायबिटीज के साथ कोविड निमोनिया से पीड़ित थे।
राज्य सभा के उपसभा​पति हरिवंश लिखते हैं…

मशहूर पर्यावरणविद, गांधीवादी सुंदर लाल बहुगुणा के निधन की खबर से मन आहत है। चिपको आंदोलन के प्रणेता। तीन दशक पहले युवा दिनों में उनसे मिलने का मौका मिला। हिमालय के इलाके में पर्यावरण-प्रकृति के काम को दुनिया ने जाना। मुंबई के आदिवासी इलाके में अनूठे समाजसेवी थे। पर्यावरण-प्रकृति के लिए उनका काम आनेवाली पीढ़ियों को युगों- युगों तक प्रेरित करेगा।

जाने माने लेखक और पुलिस सेवा से सेवानिवृत्त अधिकारी ध्रुव गुप्त अपनी कविता के जरिए उन्हें याद करते हैं।
बचे रहें वे ऊंचे-ऊंचे वृक्ष
बचे रहे हरे-भरे जंगल
जीवनदायिनी हवा
निर्मल, अविरल नदियां
पिता से ये पर्वत
नीचे हरी दूब
ऊपर नीला आकाश
हम रहें, न रहें
बची रहे प्रकृति
बची रहे पृथ्वी
बची रहें हमारी संतानें
बचा रहे जीवन !

प्रकृति और पर्यावरण के अनवरत योद्धा पर्वतपुत्र सुंदर लाल बहुगुणा की स्मृतियों को नमन !

जाने माने पत्रकार सुशील बहुगुणा लिखते हैं
एक हिमनद बिछड़ गया
गंगा पुत्र चला गया
सुंदरलाल बहुगुणा के देह त्यागने के साथ ही आज जैसे एक हिमयुग का अंत हो गया। लेकिन वास्तव में देह तो उन्होंने दशकों पहले तब ही त्याग दी थी जब हिमालय और नदियों की अक्षुण्णता बनाए रखने और बांधों से उन्हें न जकड़ने की मांग को लेकर उन्होंने लंबे सत्याग्रह और उपवास किए। प्रकृति की ख़ातिर तभी वो विदेह हो चुके थे। अपने शरीर को कष्ट दे ये समझाने की कोशिश करते रहे कि कुदरत का कष्ट कहीं ज़्यादा बड़ा है, उसे जल्द समझा जाना चाहिए।
पर्यावरण के क्षेत्र में वो एक व्यक्ति नहीं बल्कि विश्वव्यापी विचार बन चुके थे जिन्हें सात समंदर पार के देशों की सरकारों और लोगों ने तो समझा लेकिन दूरदृष्टि दोष से ग्रस्त हमारी बौनी सरकारें देखने और समझने से इनकार करती रहीं। हमारे कारोबारियों, नेताओं, अफ़सरों और ठेकेदारों की चौकड़ी का ईमान इतना गिरा हुआ रहा कि वो सच को सामने देख भी उससे मुंह फेरते रहे। नतीजा सुंदरलाल बहुगुणा ने जो आगाह किया वो सामने दिखने लगा। हिमालयी क्षेत्रों में आए दिन आ रही विपदाएं उनकी दी हुई समझदारी से नज़र फेरने का ही नतीजा हैं।
जिस टिहरी राजशाही के विरोध में सुंदरलाल बहुगुणा ने अपनी जवानी लुटाई उसी को शरण देने वाली ऐतिहासिक टिहरी को बचाने के लिए अपने जीवन का उत्तरार्द्ध न्योछावर कर दिया। गांधीजी के नेतृत्व में आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लेने के दौरान जो संस्कार उनके भीतर पनपे वो ताज़िंदगी उन्हें आगे का रास्ता दिखाते रहे और नई पीढ़ी की रोशनी बने। लेकिन ये रोशनी थामने वाले हाथ शायद अभी उतने ताक़तवर नहीं हो पाए कि सरकारों की आंखों के आगे उजाला कर सकें।
सरकारों ने अगर सुंदरलाल बहुगुणा की बात सुन ली होती तो ऐतिहासिक टिहरी तो बच ही गया होता भागीरथी और भिलंगना नदियों का मीलों लंबा विस्तार आज भी कलकल बहती हिम धाराओं से सराबोर होता। लेकिन आज वहां एक ठहरी हुई झील की सड़ांध है जिसके नीचे कितनी ही यादों ने समाधि ले ली, कितने ही सपनों की बलि चढ़ गई। ख़़ूबसूरत गांव-खेत डूब गए, ज़िंदगी की किलकारियों से गूंजता ऐतिहासिक शहर गुम हो गया। मिला क्या बमुश्किल 700 से 800 मेगावॉट बिजली, उसमें भी उनका हिस्सा नहीं जिन्होंने इस बांध के लिए अपना सब कुछ गंवा दिया। टिहरी का एक बड़ा इलाका नीचे बड़ी झील के बावजूद ऊपर पानी की बूंद-बूंद को तरसता है. क्या यही सरकारों का विकास है?


सुंदरलाल बहुगुणा पेड़ों को बचाने के लिए पेड़ों का आलिंगन करने वाली पीढ़ी के एक नायक थे. गौरा देवी, चंडीप्रसाद भट्ट जैसे चिपको आंदोलन के प्रणेताओं में से एक. एक पत्रकार के तौर पर उन्होंने अपनी बातों को समझाने का हुनर भी संवारा था. जिस बात को कहने के लिए कई वैज्ञानिक लंबे-लंबे शोधग्रंथों का सहारा लेते हों, जटिल शब्दों से भरी भाषा इस्तेमाल करते हों उस बात को वो बड़े आसान शब्दों में जनता को समझाते रहे जैसे
क्या हैं जंगल के उपहार
मिट्टी-पानी और बयार
मिट्टी-पानी और बयार
ये हैं जीवन के आधार
या फिर
Ecology is permanent Economy
या फिर ये सूत्रवाक्य
धार एंच पाणी ढाल पर डाला, बिजली बणावा खाला-खाला
(ऊंचाई से पानी को ढाल पर डालो और झरने-झरने पर बिजली बनाओ)
यही तो वो छोटे-छोटे Run of the river project हैं जिन्हें अपनाने को वो लगातार कहते रहे। नदियों को बड़े-बड़े बांधों में बांधने की सोच का विरोध करते रहे। लेकिन सरकारों की Think Big जैसी छोटी सोच के आगे ऐसी समझदारी को कोई तवज्जो नहीं दी गई। मंत्रियों, अफ़सरों, ठेकेदारों ने बड़ा सोचा इसलिए उन्हें भी बड़ा हिस्सा मिला और ये बदस्तूर अब भी जारी है। हिमालय की छाती मशीनों से घायल हो रही है और नदियां बांधों में फंसी रो रही हैं। बड़ा करने की बड़ी मूर्खता ने क़ुदरत का कितना बड़ा नुक़सान कर दिया ये दोहराने की ज़रूरत नहीं।
आज हिमालय को देखने का एक ख़ूबसूरत नज़रिया चला गया, उम्मीद करें कि वो नज़रिया जाने से पहले हमारी आंखों में अपनी कुछ चमक छोड़ गया हो। प्रकृति को देखने का हमारा नज़रिया कुछ बेहतर कर गया हो। हिमालय से बिछड़े इस विराट हिमनद को सलाम।
झारखंड के सामाजिक कार्यकर्ता घनश्याम लिखते हैं
सुंदर लाल बहुगुणा जी की कुछ यादें

बात उन दिनों की है जब हमसब जवान थे और सुंदर लाल बहुगुणा प्रौढ़। सन् 84 की बात है। जेपी आंदोलन का दशक पूरा होने को था। हम मधुपुर के साथियों ने(ग्रामीण साथियों सहित) जंगल बचाने की लड़ाई जीत ली थी। 25,26 जनवरी को मधुपुर के जीतपुर- चेचालीमें बिर (“जंगल”) मेला लगाने का निर्णय लिया था। छात्र युवा संघर्ष वाहिनी और मजदूर किसान समिति इस मेले का आयोजक था। इस मेले में किन किन महानुभावों को आमंत्रित किया जाए यह प्रश्न हमसबों के सामने खड़ा था। चूंकि विनय चाचा (फौजी विनय सिंह) बहुगुणा जी से बहुत प्रभावित थे इसलिए उनका सुझाव था कि चिपको आंदोलन के प्रणेता सुंदर लाल बहुगुणा को बुलाया जाना चाहिए। उनका नाम तय होते ही उनसे संपर्क किया गया।और खुशी की बात यह थी उन्होंने मेले में भाग लेने की अपनी सहमति दे दी।
उनकी स्वीकृति मिलते ही हमसब खुशियों से झूम उठे। मेले की तैयारी होने लगी जोरोशोर से। इस मेले को स्थापित करने के लिए कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। पहला यह तय हुआ कि चेचाली के बीच जंगल में उस स्थान पर क्रांति ध्वज फहराया जाए जहां से जंगल के ठेकेदार भगाया गया था। इस झंडे को फहराने के लिए 25 जनवरी की तिथि तय की गई।सफेद झंडा में चिपको आंदोलन का प्रतीक पेड़ से लिपटी महिला और पुरुष की तस्वीर बनायी गयी।
बहुगुणा जी 24 जनवरी 84 को मधुपुर पधारे।उन्हें अरविंद जी के यहां ठहराया गया। बहुगुणा जी आते मुस्कुराते हुए कहा मैं तो अन्न ग्रहण नहीं करता।हां अगर दिक्कत नहीं हो तो साबूदाना खा लूंगा।इसके अलावे जो भी स्थानीय फल हो तो खा सकता हूं। हमारे साथियों को बहुत आश्चर्य हुआ कि वे अन्न नहीं खाते।लेकिन यही सच था।
दूसरे दिन जब सभी समय ये उठने की तैयारी कर रहे थे वे स्नान ध्यान से निवृत्त हो चुके थे।पूष की ठिठुरन भरी सुबह तड़के वे अरविंद जी के साथ जीतपुर पहुंच गए।जंगल के बीच बसा जीतपुर में उनका भव्य स्वागत हुआ।सफेद साफा माथे पर बांधे और सफेद पाजामा और कुर्ता पहने वे बीच जंगल में दिव्य -पुरुष सा लग रहे थे। चेहरे पर निश्छल मुस्कान उनकी दिव्यता में चार चांद लगा रही थी।चेचाली मोड़ पर पहला क्रांति ध्वज उन्होंने फहराया। बीच जंगल में नारे गूंज उठे—
“क्या हैं जंगल के उपकार ,
मिट्टी पानी और बयार!
मिट्टी ,पानी और बयार
ये हैं जीवन के आधार!!
क्रांति स्थल पर ही क्रांति कलेवा बांटा गया। यह सूजी और गुड़ से तैयार किया गया हलवा था। क्रांति स्थल से सभी नाचते गाते ,नारा लगाते जीतपुर मेला स्थल पहुंचे।वहां उन्हें देखने के लिए भीड़ जमा हो चुकी थी। बहुगुणा जी ने सबों का अभिवादन स्वीकार किया और उन्होंने सबों को अपने अपने स्थान पर बैठने को कहा।सभी वृत्ताकार में बैठ गए। चौधरी जी (कृष्ण प्रसाद चौधरी )ने बहुगुणा जी के सामने एक गीत गाने की इच्छा प्रकट की। बहुगुणा जी ने सहर्ष अनुमति दे दी।
चौधरी जी ने अपने मीठे स्वर में एक सुमधुर गीत :
“जंगलवा में आयल बहार, बलम संग तोड़ब पियार”
सुना कर बहुगुणा जी को मंत्रमुग्ध कर दिया। वे वाह वाह कर उठे।चौधरी जी ने धीमे से मेरे कान में कहा –“हमर जिनगी सार्थक भेय गेलो घनशाम भाई।” ऐसा कहते हुए चौधरी जी का चेहरा चमक उठा था।
गीत के बाद विनय चाचा ने उनके स्वागत में प्रशंसा के पुल बांध सबों को चौंका दिया।बोलते बोलते उन्होंने जंगल आंदोलन की पूरी कहानी सुना दी।बहुगुणा जी सुन रहे थे और अपनी अधपकी दाढ़ी और मूंछों के बीच मुस्कुरा रहे थे।विनय चाचा की बात खत्म होते ही दीपनारायण (रघुनाथपुर)ने जोर से नारा लगाया–
” जल ,जंगल ,जमीन की लूट
नहीं किसी को इसकी छूट !”
सबों ने समवेत स्वर में इस नारे को दुहराया।
अब बारी थी बहुगुणा जी के संबोधन की।उन्होंने बोलने के पहले चिपको आंदोलन का वही नारा लगवाया जो क्रांति ध्वज फहराते समय लगाया गया था। उन्होंने गंभीर मुद्रा में कहा –हमने आपसबों का नारा सुना और चिपको आंदोलन का नारा आपसबों ने लगाया।नारा गढ़ना और पूरे जज्बे के साथ लगाना अच्छी बात है लेकिन इससे भी अच्छी बात है नारे का अर्थ समझना और उसके संदेश को जीवन में आत्मसात करना।

और फिर उन्होंने चिपको आंदोलन की कथा विस्तार से सुनायी और जंगल के उपकार बताये।वहां की महिलाओं की आंदोलन में भूमिका की बात बताकर उपस्थित महिलाओं में आंदोलनों में महिलाओं के योगदान का महत्व भी बतला दिया। सभी उपस्थित श्रोता भावविभोर हो सुन रहे थे। उन्होंने जीतपुर और चेचाली गांव के लोगों की प्रशंसा की और धन्यवाद दिया ।
सभा समाप्ति के बाद हमने और अरविंद जी ने उन्हें आसपास जंगल का दर्शन कराया और जीतपुर की जोरिया को भी दिखाया।जोरिया में कलकल छलछल पानी को बहते देख बहुत खुश हुए और कहा यह पानी तभी तक है जब इसके कैचमेंट के आसपास जंगल है।जंगल कटा तो यह सोत भी सूख जायेगा।
बहुगुणा जी प्रसन्न हो मधुपुर लौटे।उन्हें बनारस लौटना था सो उन्हें स्टेशन छोड़ने के लिए मनोज तिवारी और उनके पिताजी श्री प्रद्युत तिवारी(अब स्वर्गीय ) साथ साथ साथ स्टेशन तक आये । चूंकि उस समय मनोज किशोरावस्था में था इसलिए वह बढ़चढ़कर बहुगुणा की सेवा में लगा रहा। विदा लेते हुए बहुगुणा जी ने मनोज को आशीर्वाद देते हुए कहा –यशस्वी भव:!
इसके बाद उन्होंने हमसबों के बहुत सारे कार्यक्रमों में सहभागिता निभाई। मार्गदर्शन किया। हम साथ साथ विदेशों में भी रहे। दुनिया के मंचों पर सुनने और सीखने का मौका मिला।
जब उन्हें कोविड हुआ था तब से मेरा मन आशंकित था,क्योंकि उम्र उनकी 94 वर्ष थी। इसलिए मन का एक कोना कह रहा था कि वे अब इस दुनिया को विदा कहने वाले हैं।लेकिन दूसरा कोना कह रहा था काश वो बच पाते ! तो भविष्य में हमसबों बहुत कुछ सीखने को मिलता। लेकिन जैसे ही उनके देहावसान की सूचना मिली मन बैठ गया। देश ने कुदरत को बचाने के लिए अनवरत योद्धा को खो दिया।उन्हें नमन और हूल जोहार!
वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह लिखते हैं
सादर नमन- सुंदरलाल बहुगुणाजी
सुंदरलाल बहुगुणाजी ने व्यक्तिगत स्तर पर पर्यावरण के प्रति जितना जागरण किया शायद ही कोई उतना बड़ा काम कर पाया हो। उनकी टक्कर के एक ही व्यक्ति इस समय पहाड पर हैं चंडीप्रसाद भट्टजी। वे एक व्यक्ति नहीं संस्था थे। जीवन भर सादगी, शालीनता और सहजता के साथ एक समर्पित गांधीवादी और स्वतंत्रता सेनानी के रूप में काम करते रहे। मेरा उनसे परिचय 1987 के दिनों में दिल्ली में हुआ था। तबसे अनगिनत यादें हैं। भारत का कोई भी सामाजिक क्षेत्र का व्यक्ति उनसे अधिक समृद्ध मुझे नहीं दिखा। शायद ही कोई जिला या कस्बा हो जहां पर उनके जानने और चाहने वाले लोग न मिले हो। वे जहां भी गए लोगों को अपने साथ बरबस जो़ड़ लिया। और काम करने के लिए कुछ मुद्दे और सवाल भी दिए। हिमालयी पर्यावरण पर उनका काम इतिहास में दर्ज रहेगा। उनको मेरी भावभीना श्रद्दांजलि।
पर्यावरण विद् हिमांशु कुमार लिखते हैं
एक महान व्यक्तित्व हमारे देखते-देखते इतिहास हो गया
सुंदरलाल बहुगुणा सर्वोदय आंदोलन में मेरे पिता श्री प्रकाश भाई के साथी और मित्र थे। यह चित्र दिल्ली में राजघाट का है जिसमें मेरी पत्नी मैं और बहुगुणा जी की गोद में हमारी बड़ी बेटी अलीशा है।यह 1998 का फोटो है।बहुगुणा जी हमेशा ऐसी शख्सियत के तौर पर याद किए जाएंगे जिन्होंने इतिहास में अपना कोई मौलिक योगदान दिया है चिपको आंदोलन नशा मुक्ति आंदोलन के साथ उनका नाम हमेंशा जुड़ा रहेगा।
सादर नमन
अंकिता जैन लिखती हैं
लोग कहने लगते हैं कुछ नहीं होगा, कोई नहीं सुनेगा, हीरे भी ज़रूरी हैं वग़ैरह वग़ैरह… ऐसे लोगों से कहने का मन होता है कि जब प्रकृति का विनाश हो रहा हो और आप “कुछ नहीं हो सकता” कहकर चुपचाप निकल लें तो आप असल में प्राकृतिक आपदाओं के दौरान होने वाले मानवीय संहार पर रोने का अधिकार खो रहे हैं। आज चिपको आंदोलन के प्रणेता सुंदरलाल बहुगुणा जी का कोरोना से निधन हो गया। उन्होंने यदि वह आंदोलन शुरू ना किया होता तो उत्तराखंड का और भी विनाशकारी रूप हम देख रहे होते। इतने आंदोलनों के बाद भी हम बहुत मामलों में पर्यावरण का विनाश होने से रोक नहीं पाते और नतीजे भुगतते हैं। तरक्की में इतने भी अंधे मत हो जाइए कि घर-घर वाटर फिल्टर के साथ ऑक्सीजन फ़िल्टर लगाने पड़ें और पीठ पर ऑक्सीजन बैग बाँधने पड़े। छतरपुर जिले के बकस्वाहा में लाखों पेड़ों को काटे जाने से रोकिए। अपनी आवाज़ बुलंद कीजिए। हमारा साथ दीजिए। चिट्ठी लिखिए, ट्वीट कीजिए, पोस्ट कीजिए, जो भी माध्यम अपना सकें अपनाइए और इस जंगल को बचाइए। बुंदेलखंड पहले ही जल संकट से जूझ रहा है। आज सुंदरलाल जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम जितना हो सके जंगलों को बचा लें।
वरिष्ठ पत्रकार पंकज चतुर्वेदी लिखते हैं …

खामोश हो गई पहाड़ की एक और आवाज। सुंदरलाल बहुगुणा नही रहे।
प्रकृति की पूजा करने वाले प्रख्यात पर्यावरण प्रेमी सुंदरलाल बहुगुणा को भी कोरोना ने नहीं छोड़ा , वे गत १२ दिनों से संघर्ष कर रहे थे , श्री बहुगुणा का देहावसान पर्यावरण खासकर उत्तराँचल के लिए अपूरणीय क्षति हैं। सुंदर लाल बहुगुणा जी का जन्म 9 जनवरी 1927 को उत्तराखंड के टिहरी जिले के सिल्यारा गांव में हुआ था। अपने गांव से प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद बहुगुणा लाहौर चले गए थे। यहीं से उन्होंने कला स्नातक किया था। फिर अपने गांव लौटे बहुगुणा पत्नी विमला नौटियाल के सहयोग से सिल्‍यारा में ही ‘पर्वतीय नवजीवन मंडल’ की स्थापना भी की।
साल 1949 के बाद दलितों को मंदिर प्रवेश का अधिकार दिलाने के लिए उन्होंने आंदोलन छेड़ा। साथ ही दलित वर्ग के विद्यार्थियों के उत्थान के लिए प्रयासरत रहे। उनके लिए टिहरी में ठक्कर बाप्पा हॉस्टल की स्थापना भी की गई। यही नहीं, उन्होंने सिलयारा में ही ‘पर्वतीय नवजीवन मंडल’ की स्थापना की।

1971 में सुन्दरलाल बहुगुणा ने चिपको आंदोलन के दौरान 16 दिन तक अनशन किया। जिसके चलते वह विश्वभर में वृक्षमित्र के नाम से प्रसिद्ध हो गए. पर्यावरण बचाओ के क्षेत्र में क्रांति लाने वाले बहुगुणा के कार्यों से प्रभावित होकर अमेरिका की फ्रेंड ऑफ नेचर नामक संस्था ने 1980 में पुरस्कार से सम्मानित किया। इसके साथ ही पर्यावरण को स्थाई सम्पति मानने वाला यह महापुरुष ‘पर्यावरण गांधी’ बन गया.अंतरराष्ट्रीय मान्यता के रूप में 1981 में स्टाकहोम का वैकल्पिक नोबेल पुरस्कार मिला। यही नहीं, साल 1981 में ही सुंदर लाल बहुगुणा को पद्मश्री पुरस्कार दिया गया। मगर, सुंदर लाल बहुगुणा ने इस पुरस्कार को स्वीकार नहीं किया।

लक्ष्मी प्रसाद पंत लिखते हैं…
पत्रकार के तौर पर 1996 से 2003 तक टिहरी बांध मेरी रिपोर्टिंग का अहम हिस्सा रहा है। एक जिंदा शहर को पानी में डूबते मैंने और हिमालय के रक्षक बहुगुणा जी ने साथ-साथ देखा है। बहुगुणा कहते थे-टिहरी नहीं डूबा बल्कि हमारा इतिहास-वर्तमान-भविष्य सबकुछ डूब गया है..!!!                                                             ——— सुंदर लाल बहुगुणा

रजनीश राज बहुगुणा को याद करते हुए लिखते हैं कि
प्रकृति पूजकों के देश में प्रकृति का सबसे बड़ा प्रेमी पंचतत्व में विलीन हो स्वयं प्रकृति बन गया। प्रकृति की पूजा और उससे प्रेम ही उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
टीवी पत्रकार कुमार विनोद लिखते हैं सुंदर लाल बहुगुणा जी…काॅलेज के दिनों में जनरल नॉलेज के हिस्सा थे। इसके बाद आदर्श जीवन का अंग बने। आज बरसों पुराने जुड़ाव को अपहिज महसूस कर रहा हूं। काश कि उनके जाने की खबर गलत होती!

डॉ शंभु कुमार सिंह लिखते हैं…1990 का समय था सम्भवतः? आदरणीय सुंदरलाल बहुगुणा जी का एक पत्र मुझे मिला था। पत्र बहुत स्नेह के साथ लिखे थे और एक आग्रह भी था। आग्रह यह था कि उनके पुत्र राजीव नयन बहुगुणा की पोस्टिंग नवभारत टाइम्स,पटना में हुई है तो हो सके तो एक सुंदर सुविधाजनक आवास उनको पटना में दिलवा दें। हालांकि जब मैं राजीव जी से मिलने गया तब तक वे एक आवास ले लिए थे किराए पर। फिर कभी कभार उनसे मिलता रहा । नवभारत में ही एक गुंजन जी थे तब । उनको जब मालूम हुआ कि मैं कविता भी लिखता हूँ तो उन्होंने मुझे कुछ कविता देने की बात की और मेरी कुछ कविताएं छापी भी उन्होंने। सम्भवतः 1 या 2 जून के अंक में ?
सुंदरलाल बहुगुणा जी से मैं बहुत ही प्रभावित था। तब शायद वे सिल्यारा में रहते थे ? उनसे कई बार मिला भी । अभी पांच छह वर्ष पूर्व स्पिकमैके के एक कार्यक्रम में उनको डी पी एस ,पटना बुलाया गया था। बच्चों ने उनसे पर्यावरण और प्रकृति संरक्षण पर बहुत सी जानकारियां पाई और ऐसे व्यक्तित्व से मिल बहुत प्रसन्न भी हुए थे क्योंकि इनके बारे में वे केवल किताबों में पढ़े थे,कभी मिले नहीं थे! तो मिलकर बहुत आह्लादित थे!
वे बहुत ही विनम्र और सहयोगी वृति के व्यक्ति थे। सादा जीवन था उनका। वे कहते भी थे ,जब तक जिंदगी में सादगी नहीं लाओगे प्रकृति को नहीं बचा पाओगे ! यह सत्य है कि उपभोक्तावादी प्रवृति ही हमें प्रकृति से दूर कर रही है। आज उनको श्रद्धान्जलि देते हम प्रण करें कि हम प्रकृति के अनुरूप सौम्य जीवन जिएंगे और पर्यावरण को संरक्षित करने केलिये सदा तत्पर रहेंगे।
आदरणीय सुंदरलाल बहुगुणा जी को हम सादर नमन करते अश्रुपूरित श्रद्धान्जलि अर्पित करते हैं।

 

 

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