नहीं रहे प्रख्यात पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा

संतोष कुमार सिंह
​देहरादून: चिपको आंदोलन के प्रणेता व जंगलों की रक्षा के लिए समर्पित योद्धा गांधीवादी सांचे में ढले प्रख्यात पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा नहीं रहे। शुक्रवार 12 बजे 94 वर्ष के उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनका जन्म नौ जनवरी, 1927 को टिहरी जिले में हुआ था। वे डायबिटीज के साथ कोविड निमोनिया से पीड़ित थे।                                                 ———–पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा
पर्यावरण को समर्पित रहा बहुगुणा का जीवन
पद्मविभूषण से सम्मानित हिमालय के रक्षक सुंदरलाल बहुगुणा की सबसे बड़ी उपलब्धि चिपको आंदोलन थी। वह गांधी के पक्के अनुयायी थे और जीवन का एकमात्र लक्ष्य पर्यावरण की सुरक्षा था। हालांकि उनका राजनीतिक—सामाजिक जीवन 13 वर्ष की उम्र में हीं शुरू हुआ था। 1956 में शादी होने के बाद राजनीतिक जीवन से उन्होंने संन्यास ले लिया। शादी के बाद उन्होंने गांव में रहने का फैसला किया और पहाड़ियों में एक आश्रम खोला। बाद में उन्होंने टिहरी के आसपास के इलाके में शराब के खिलाफ मोर्चा खोला। 1960 के दशक में उन्होंने अपना ध्यान वन और पेड़ की सुरक्षा पर केंद्रित किया।———-पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा

क्या था चिपको आंदोलन 
पर्यावरण सुरक्षा के लिए 1970 में आंदोलन शुरू किया गया। धीरे—धीरे यह आंदोलन पूरे देश में फैला। इस दौरान गढ़वाल हिमालय में पेड़ों के काटने को लेकर शांतिपूर्ण आंदोलन बढ़ रहे थे। सुंदरलाल बहुगुणा ने गौरा देवी और कई अन्य लोगों के साथ मिलकर जंगल बचाने के लिए चिपको आंदोलन की शुरूआत की थी। 26 मार्च, 1974 को चमोली जिला की ग्रामीण महिलाएं उस समय पेड़ से चिपककर खड़ी हो गईं जब ठेकेदार के आदमी पेड़ काटने के लिए आए। यह विरोध प्रदर्शन तुरंत पूरे देश में फैल गए।

सुंदरलाल बहुगुणा का मानना था कि पेड़ों को काटने की अपेक्षा उन्हें लगाना हमारे जीवन के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसलिए उन्होंने 1970 में गढ़वाल हिमालय में पेड़ों को काटने के विरोध में आंदोलन की शुरुआत की। इस आंदोलन का नारा – “क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार। मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार” तय किया गया था। वर्ष 1971 में शराब दुकान खोलने के विरोध में सुन्दरलाल बहुगुणा ने सोलह दिन तक अनशन किया।——पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा

हिमालय की 5,000 किमी लंबी यात्रा की
1980 की शुरुआत में बहुगुणा ने हिमालय की 5,000 किलोमीटर की यात्रा की। उन्होंने यात्रा के दौरान गांवों का दौरा किया और लोगों के बीच पर्यावरण सुरक्षा का संदेश फैलाया। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से भेंट की और इंदिरा गांधी से 15 सालों तक के लिए पेड़ों के काटने पर रोक लगाने का आग्रह किया। इसके बाद पेड़ों के काटने पर 15 साल के लिए रोक लगा दी गई।

टिहरी बांध के खिलाफ बहुगुणा का आंदोलन
सुंदरलाल बहुगुणा ने टिहरी बांध निर्माण का भी बढ़-चढ़ कर विरोध किया और 84 दिन लंबा अनशन भी रखा था। एक बार उन्होंने विरोध स्वरूप अपना सिर भी मुंडवा लिया था। टिहरी बांध के निर्माण के आखिरी चरण तक उनका विरोध जारी रहा। उनका अपना घर भी टिहरी बांध के जलाशय में डूब गया।
टिहरी राजशाही का भी उन्होंने कड़ा विरोध किया जिसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा। वह हिमालय में होटलों के बनने और लग्जरी टूरिज्म के भी मुखर विरोधी थे। महात्मा गांधी के अनुयायी रहे बहुगुणा ने हिमालय और पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागरूकता फैलाने के लिए कई बार पदयात्राएं कीं। ——————————————–पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा

 इन पुरस्कारों से किया गया सम्मानित
पर्यावरण के क्षेत्र में बहुमूल्य काम करने के लिए सुन्दरलाल बहुगुणा को वर्ष 1981 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा था। किंतु उन्होंने यह पुरस्कार लेने से मना कर दिया। उनका कहना था कि जब तक पेड़ कटते रहेंगे, तब तक मैं इस पुरस्कार को स्वीकार नहीं कर सकता। इसके बाद –

1985 में जमनालाल बजाज पुरस्कार
1986 में जमनालाल बजाज पुरस्कार (रचनात्मक कार्य के लिए सन)
1987 में राइट लाइवलीहुड पुरस्कार (चिपको आंदोलन)
1987 में शेर-ए-कश्मीर पुरस्कार
1987 में सरस्वती सम्मान
1989 में आइआइटी रुड़की द्वारा सामाजिक विज्ञान के डॉक्टर की मानद उपाधि दी गई।
1998 में पहल सम्मान
1999 में गांधी सेवा सम्मान
2000 में सांसदों के फोरम द्वारा सत्यपाल मित्तल अवॉर्ड
2001 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया

 

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