वो 5 वीरांगना जिन्होंने जिन्होंने देश को आजादी दिलाने में दिया अहम योगदान

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1892
वर्षा वर्मा

नई दिल्ली: अगस्त में रक्षाबंधन और 15 अगस्त सहित छुट्टियों की भरमार अगर जाना है बाहर घुमाने तो फटाफट करे हॅालिडे की तैयारी। आज हम घर में हो या के बाहर, महिला हों या पुरुष, बिना किसी भेदभाव के आजादी से रह सकते हैं। क्योकि आज देश में लोकतंत्र है। आपको याद होगा कि कैसे आजादी को हासिल करने के लिए लाखों लोगों ने अपना बलिदान दिया, इन वीर सेनानियों में अनेक महिलाएं भी थीं जिन्होंने न केवल क्रांतिकारियों की तरह तरह से सहायता की बल्कि संगठनों व सभाओं का नेतृत्व भी किया। जिनकी वजह से ही आज हम आजाद है और भारत में हर साल 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है इस दिन भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने दिल्ली के लाल किले के लाहौरी गेट पर भारतीय राष्ट्रीय झंडा फहराया था और अब 2024 में 78वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहे है आइए आज हम जानें कुछ ऐसी ही वीरांगनाओं के बारे में जो आज इतिहास के पन्नों में कहीं खो गई हैं।

1.रानी लक्ष्मीबाई

रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवम्बर 1828 को वाराणसी,उत्तर प्रदेश में हुआ था उनका असली नाम मणिकर्णिका था,लेकिन विवाह के बाद उन्हें लक्ष्मीबाई के नाम से जाना गया। इनके पिता का नाम मोरोपंत तांबे और माता का नाम भागीरथी सप्रे था लक्ष्मीबाई का जीवन देशभत्कि, साहस और बलिदान का प्रतीक है। उनकी कहानी हमें आज भी प्रेरित करती हैा लक्ष्मीबाई की युवावस्था में,झांसी के महाराजा गंगाधर राव ने उन्हें देखा और उनके साथ विवाह का प्रस्ताव भेजा मणिकर्णिका ने इस प्रस्ताव को स्वीकार किया और 1842 में महाराजा गंगाधर राव से विवाह किया विवाह के कुछ समय बाद 1853 में महाराजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गयी। पति की मृत्यु के बाद लक्ष्मीबाई ने झांसी की रानी के रूप मे शासन संभाला बुंदेले हरबोलों के मुंह से हमने सुनी कहानी थी की खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी ​थी। इन पंत्कियों से लगभग हर भारतीय परिचित है। रानी लक्ष्मीबाई ,जिन्होंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और झांसी की रानी के रूप में जानी जाती है वीरता और समर्पण की प्रतीक है रानी लक्ष्मीबाई भारत के पहले स्वतंत्रता के दौरान एक बहादुर वीरांगना थीं।झांसी की रानी ने आखिरी सांस तक अंग्रेजों से संघर्ष किया और उनकी वीरता की कहानियां आज भी जिंदा हैं। उनकी मृत्यु के बाद भी वे अंग्रजों के हाथ नहीे आई। रानी लक्ष्मीबाई अपनी मातृभूमि के लिए अपनी जान की बाजी लगाने के लिए तैयार थीं। मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी यह वाक्य आज भी हमारे दिलों में गूंजता है। रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु 18 जून 1858 मराठा शासित झांसी राज्य की रानी और 1857 की राज्यक्रान्ति की द्वितीय शहीद वीरांगना थीं। उन्होंने सिर्फ 29 वर्ष की उम्र में अंग्रेज साम्राज्य की सेना से युद्ध किया और रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हुई।

2. झलकारी बाई

झांसी के भोजला गांव के एक निर्धन कोली परिवार में झलकारी बाई का जन्म 22 नंवबर 1830 को हुआ था। बचपन में ही सिर से मां जमुना देवी का साया उठने के बाद इनके पिता सदोवर सिंह ने मां और पिता दोनों की भूमिका निभाते हुए उन्हें बड़े प्यार से पाला और घुड़सवारी व तीरंदाजी की शिक्षा दी। उनका विवाह रानी लक्ष्मीबाई की सेना के एक सैनिक के साथ हुआ। यहां वे रानी के संपर्क में आईं। रानी ने उनकी क्षमताओं से प्रभावित होकर उन्हें अपने महिला सैनिकों की शाखा दुर्गा दल में शामिल कर लिया। यहां उन्होंने तोप व बंदूक चलाना सीखा और दुर्गा दल की सेनापति बनीं। वे लक्ष्मीबाई की हमशक्ल भी थीं। इस कारण शत्रु को गुमराह करने के लिए वे रानी के वेश में भी युद्ध करती थीं। अपने अंतिम समय में भी वे रानी के वेश में युद्ध करते हुए वे अंग्रेज़ों के हाथों पकड़ी गयी और रानी को किले से भाग निकलने का अवसर मिल गया। उन्होंने प्रथम स्वाधीनता संग्राम में झांसी की रानी के साथ ब्रिटिश सेना के विरुद्ध अद्भुत वीरता से लड़ते हुए ब्रिटिश सेना के कई हमलों को विफल किया था। यदि लक्ष्मीबाई के सेनानायकों में से एक ने उनके साथ विश्वासघात न किया होता तो झांसी का किला ब्रिटिश सेना के लिए प्राय: अभेद्य था। झलकारी बाई की गाथा आज भी बुंदेलखंड की लोकगाथाओं और लोकगीतों में सुनी जाती है

3. दुर्गावती बोहरा (दुर्गा भाभी)

इतिहास में दुर्गा भाभी के नाम से जानी जाने वाली दुर्गावती बोहरा भारत के स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों की प्रमुख सहयोगी थीं। 18 दिसम्बर 1928 को भगत सिंह ने इन्हीं दुर्गा भाभी के साथ वेश बदल कर कलकत्ता-मेल से यात्रा की थी। दुर्गाभाभी क्रांतिकारी भगवती चरण बोहरा की धर्मपत्नी थीं। इनका जन्म 7 अक्टूबर 1902 को कौशाम्बी जिले के शहजादपुर गांव में हुआ था। दस वर्ष की अल्पायु में ही इनका विवाह लाहौर के भगवती चरण बोहरा के साथ हुआ। भगवती चरण के पिता शिवचरण रेलवे में उच्च पद पर थे। अंग्रेज सरकार ने उन्हें राय साहब की पदवी दी थी। पिता के प्रभाव से दूर भगवती चरण का क्रांतिकारियों से मिलना-जुलना था। उनका संकल्प देश को अंग्रेजी दासता से मुक्त कराना था। 1920 में पिता की मृत्यु के बाद पति-पत्नी दोनों खुलकर क्रांतिकारियों का साथ देने लगे। 28 मई 1930 को रावी नदी के तट पर साथियों के साथ बम बनाने के बाद परीक्षण करते समय बोहरा शहीद हो गए। अब दुर्गावती जो साथियों में दुर्गा भाभी के नाम से जानी जाती थीं और अधिक सक्रिय हो गईं। 9 अक्टूबर 1930 को दुर्गा भाभी ने गवर्नर हैली पर गोली चलाई परंतु वह बच गया। मुंबई के पुलिस कमिश्नर को भी दुर्गा भाभी ने ही गोली मारी थी, जिससे पुलिस उनके पीछे पड़ गई और गिरफ्तार कर लिया। दुर्गा भाभी का काम क्रांतिकारियों को हथियार पहुंचाना था। वे भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, बटुकेश्वर दत्त आदि के साथ काम करती थीं। उनकी शहादत के बाद वे अकेली पड़ गई और अपने पांच साल के बेटे शचींद्र को शिक्षा दिलाने के उद्देश्य से दिल्ली और फिर लाहौर चली गईं। जहां पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और तीन वर्षों तक नजरबंद रखा। 1935 में वे गाजियाबाद आ गईं और एक विद्यालय में पढ़ाने लगीं। इसके बाद अन्य कई स्कूलों में भी उन्होंने अध्यापन किया और 14 अक्टूबर 1999 को इस दुनिया से विदा हो गईं। इस क्रांतिकारी महिला को आज भी देश के इतिहास में सही सम्मान व पहचान का इंतजार है।

4. कनकलता बरुआ

असम की रहने वाली कनकलता बरुआ भारत की प्रमुख महि‍ला स्वतंत्रता सेनानी थीं, इनको अंग्रेजों ने 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के समय गोली मार दी थी। इन्‍हें बीरबाला के नाम से भी जाना जाता है। इनका जन्म 22 दिसंबर 1924 को असम के सोनीपुर जिले के गोहपुर गांव में हुआ था। बचपन में ही माता-पिता की मृत्यु के बाद उनकी नानी ने उन्हें पाला-पोसा। 1931 में 7 साल की कनकलता अपने मामा के साथ पहली बार गमेरी गांव में आयोजित रैयत अधिवेशन में क्रांतिकारियों के साथ शामिल हुई थी। इस अधिवेशन में भाग लेने वाले सभी क्रांतिकारियों पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चला तो पूरे असम में क्रांति की आग फैल गई। कनकलता क्रांतिकारियों के बीच धीर-धीरे बड़ी होने लगीं। एक गुप्त सभा में 20 सितम्बर 1942 को तेजपुर कचहरी पर तिरंगा फहराने का निर्णय हुआ। उस दिन बाइस साल की कनकलता तिरंगा हाथ में थामे जुलूस का नेतृत्व कर रही थीं। अंग्रेजी सेना की चेतावनी के बाद भी वे रुकी नहीं और छाती पर गोली खाकर शहीद हो गईं। अपनी वीरता व निडरता के कारण वे इतिहास में वीरबाला के नाम से जानी गईं। आज सबसे कम उम्र की बलिदानी कनकलता का नाम भले ही इतिहास के पन्नों से गायब है, लेकि‍न उनका बलिदान अमर रहेगा।

5. मातंगिनी हजारा

मातंगिनी हजारा भारत की प्रमुख क्रान्तिकारी थी। इन्‍हें इतिहास में ‘गांधी बुढ़ी’ के नाम से भी जाना जाता है। इनका जन्म 19 अक्टूबर 1870 को तत्कालीन पूर्वी बंगाल के मिदनापुर जिले के होगला गांव में हुआ था। गरीबी के कारण बारह वर्ष की उम्र में उनका विवाह 62 वर्षीय विधुर के साथ कर दिया गया। विवाह के छ: वर्ष के बाद वे निःसंतान विधवा हो गई। जैसे-तैसे गरीबी में दिन गुजार रही थीं। 1932 में देशभर में स्वाधीनता आंदोलन चला और जुलूस उनके घर के सामने से गुजरा तो वे भी जुलूस के साथ चल पड़ीं। इसके बाद वे तन-मन-धन से देश के लिए समर्पित हो गईं । इन्‍होंने 17 जनवरी 1933 को कर बंदी आंदोलन का नेतृत्व किया, गवर्नर एंडरसन को काले झंडे दिखाए तो गिरफ्तार कर ली गईं। छ: मास का सश्रम कारावास हुआ। भारत छोड़ो आंदोलन की रैली के लिए घर-घर जाकर 5000 लोगों को तैयार किया। तिरंगा हाथ में लिए रैली का नेतृत्व करते हुए मातंगिनी जुलूस के साथ जब सरकारी डाक बंगले पर पहुंचीं तो पुलिस ने वापस जाने को कहा। मातंगिनी टस से मस न हुईं। अंग्रेजी सिपाहियों ने गोली चला दी। गोली मातंगिनी के बाएं हाथ में लगी। तिरंगे को गिरने से पहले ही दूसरे हाथ में ले लिया। दूसरी गोली दाएं हाथ में और तीसरी माथे पर लगी। मातंगिनी वहीं शहीद हो गईं। इस बलिदान ने क्षेत्र के लोगों में जोश भर दिया परिणामस्वरूप लोगों ने दस दिनों के अंदर ही अंग्रेजों को वहां से खदेड़ दिया और स्वाधीन सरकार स्थापित की, जिसने 21 माह काम किया।

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