मौसम या प्रदेश भले ही भिन्न हो जब बात आती है दलहनी सब्जियों की तो सब्जी वाली मटर पहले नंबर पर होती है। जी हाॅं, आप तो जानते ही है कि मटर एक प्रमुख सब्जी की फसल है जो सब्जी से इतर अन्य पकवानों में भी प्रमुख रूप से सरीक होती है। इसमें प्रचुर मात्रा में प्रोटीन, कार्बोहाईड्रेट, विटामिन, तथा खनिज लवण पाये जाते है। इसके हरे पौधों को तुड़ाई उपरान्त उखाड़कर पशुओं के लिये हरे चारे के लिये भी प्रयोग कर सकते है। सब्जी वाली मटर में नत्रजन स्थरीकरण का गुण पाये जाने के कारण फसल उगाने के लिये अधिक मात्रा में नत्रजन का प्रयोग भी नहीं करना पड़ता है साथ में कम अवधि की फसल होने के कारण खरीफ की खेती समय से करने में मदद मिलती है।
सब्जी वाली मटर की खेती हमारे देश मे मैदानी क्षेत्र में सर्दिंयों में तथा पहाड़ी क्षेत्रों में गर्मियों में की जाती है। मध्य प्रदेश, बिहार,उत्तर प्रदेश,उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा आदि राज्यों में प्रमुख रूप से इसकी खेती की जाती है। मौजूदा समय में मटर की डिमाॅंड गैर मौसम में भी होने के कारण हरे बीजो के परिरक्षण के द्वारा डिब्बा बन्दी का कारोबार बढ़ गया है। एैसे में जरा से भी सूझबूझ दिखाने पर किसान भाई सब्जी वाली मटर की खेती कर भरपूर फायदा उठा सकते है।
ऽ न्यूट्रिटिव फैक्ट- नोट- उपस्थित अवयव की मात्रा खाने योग्य भाग के 100 ग्राम मात्रा के आधार पर है।
ऽ स्रोत- वेजिटेब्लस बाई बी चौधरी
क्र0सं0 अवयव मात्रा
1 नमी 72 ग्राम
2 वसा 0.1 ग्राम
3 रेशा 4 ग्राम
4 कैलोरी 93
5 मैग्नीशियम 34 मिली ग्राम
6 फास्फोरस 139 मिली ग्राम
7 सोडियम 7.8 मिली ग्राम
8 काॅपर 0.23मिली ग्राम
9 विटामिन ए 139 आई0 यू0
10 राइबोफ्लेविन 0.01मिली ग्राम
11 प्रोटीन 7.2 ग्राम
12 मिनरल्स 0.8ग्राम
13 अन्य कार्बोहाड्रेट 15.8ग्राम
14 कैल्शियम 20 मिली ग्राम
15 आक्जेलिक एसिड 14 मिली ग्राम
16 आयरन 1.5मिली ग्राम
17 पोटैशियम 79 मिली ग्राम
18 सल्फर 95 मिली ग्राम
19 थियामिन 0.25 मिली ग्राम
20 निकोटिनिक एसिड 0.8मिली ग्राम
21 विटामिन सी 9 मिली ग्राम
भूमि का चयन एवं खेत की तैयारी – अम्लीय भूमि सब्जी मटर की खेती के लिये बिल्कुल उपयुक्त नही है। परन्तु अच्छी जलनिकास वाली बलुई दोमट भूमि जिसका पी0 एच0 मान 6 से 7.5 के बीच हो, उपयुक्त मानी जाती है। यदि नमी की कमी हो तो खेत का पलेवा करके,ओट आने पर एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा दो जुताई देशी हल से या कल्टीवेटर से करके पाटा लगाकर खेत को भुरभुरा एवं समतल कर लेना चाहिये।
बुवाई का समय एवं बीज की मात्रा- मटर के बुवाई का समय अक्टूबर के प्रथम सप्ताह से लेकर नवंबर के अंतिम सप्ताह तक है। अगेती के लिये 120 से 150 कि0 ग्रा0 एवं मध्य एवं पिछैतीे के लिये 80- 100 कि0 ग्रा0 बीज प्रति हेक्टेयर आवाश्यक होती है।
प्रजातियाॅं – बेहतर तो यह होगा कि आप अपने क्षेत्र के अनुकूल रोगरोधी प्रजातियों का चयन किसी विशेषज्ञ से मशविरा करने के बाद करे। परन्तु फिर भी हम यहाॅ आपके सुविधा के लिये कुछ प्रजातियाॅं दे रहे है जो निम्न प्रकार है।
यदि हम इनके प्रजातियों व इनकी खासियत तथा उत्पादन क्षेत्र की बात करें तो
1.अर्किल जो कि 7-8 दानो से भरपूर गहरे हरे रंग की 8-9 से0 मी0हसियानुमा व अत्यन्त आकर्षक फलियाॅं लिये हुए होता है। इसका 50-55 दिन में फसल तैयार होती है एवं 40-70 कुन्तल प्रति हेक्टेयर पैदावार होते है। इसका उत्पादन पूरे देश में संभव है।
2. पंत सब्जी मटर -3 की बात करें तो यह 8-9 दानो से अच्छी तरह से भरी हुई झुर्रीदार व हरे बीज लिये हुए अर्किल से थोड़ा अधिक लम्बी व अर्किल की भाॅंति जल्दी उगने वाली प्रजाति है। किसान भाई इससे 90 कुन्तल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार लेते हैं तथा इसका उत्पादन क्षेत्र बिहार, झारखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश के तराई एवं पर्वतीय क्षेत्र, उत्तराखंड,सम्पूर्ण पंजाब एवं जम्मू कश्मीर है।
3. पंत सब्जी मटर -4 की वेरायटी के मटर को देखने पर पत्ती विहीनता का आभास होता है तथा यह 70 दिनो में तैयार होने वाली अगेती प्रजाति है। किसान भाई 90 कुन्तल/हेक्टेयर के तकरीबन पैदावार प्राप्त करते है। यह चूर्णिल आसिता (पाउड्री मिल्डयू)रोग के प्रति प्रतिरोधी है। इसका उत्पादन क्षेत्र बिहार, झारखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश के तराई एवं पर्वतीय क्षेत्र, उत्तराखंड,सम्पूर्ण पंजाब एवं जम्मू कश्मीर है।
4 पंत सब्जी मटर -5 की बात करें तो यह भी अगेती प्रजाति और इसकी फलियां लंबी होने के साथ ही पकते समय हरा झुर्रीदार बीज होती हैं। किसान भाई 90-100 कुन्तल/प्रति हेक्टेयर पैदावार लेते है। तथा यह चूर्णिल आसिता ( पाउड्री मिल्डयू )रोग के प्रति प्रतिरोधी है। और इसका उत्पादन क्षेत्र बिहार, झारखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश के तराई एवं पर्वतीय क्षेत्र, उत्तराखंड, सम्पूर्ण पंजाब एवं जम्मू कश्मीर है।
बुवाई- बीज से पैदा होने वाली बीमारियों जैसे जड़ सड़न,तना सड़न, एन्थ्रेक्नोज, बैक्टेरियल ब्लाइट एवं उकठा से बचाव के लिये बीज को 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करके बुवाई करे। पी0एस0बी0 कल्चर तथा राईजोबियम कल्चर से बीज को उपचारित करके बोने से 10 से 15 फीसदी तक उत्पादन में वृद्वि होती है, इसकेे लिए 1.5 कि0 ग्रा0 राइजोबियम कल्चर को 10 प्रतिशत गुड़ के घोल में मिलाकर प्रति हेक्टेयर बीज को अच्छी तरह से उपचारित करके सुखाकर उसी दिन बुवाई कर देना चाहिए। उकठा रोग से बचाव हेतु 4-5 ग्राम ट्राइकोडर्मा फफूद नाशक से प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करना चाहिए।
बीज की बुवाई सीडड्रिल अथवा देशी हल के पीछे कूड़ में सीधी कतारों में करनी चाहिए। जल्दी तैयार होने वाली किस्म को 30 से0 मी0 की दूरी पर तथा मध्यम अवधि की प्रजातियों को 45 से0 मी0 की दूरी पर कतार से कतार तथा 10-15 से0 मी0 पौध से पौध की दूरी पर रखना चाहिए। बीज की बुवाई 5-7 सें0 मी0 गहराई पर करें।
खाद एवं उर्वरक-वैसे बिना मृदा परीक्षण के खाद एवं उर्वरक की संस्तुत नही की जा सकती है।परन्तु मोटे तौर पर 20 टन खूब सड़ी हुयी एफ वाई एम (सड़ी गोबर की खाद) एवं 25 कि0 ग्रा0 नाईट्रोजन,50- 70 कि0 ग्रा0 फास्फोरस, तथा 50 कि0 ग्रा0 पोटाश युक्त उर्वरक प्रति हेक्टेयर देना बेहतर होता है। नाइट्रोजनयुक्त उर्वरको का अधिक प्रयोग नत्रजन स्थिरीकरण एवं गाॅंठो के निर्माण में बाधा पहुंचाती है। मटर हेतु फास्फेटिक उर्वरक अच्छा परिणाम देती है इससे गाॅठो का निर्माण अच्छा होता है। नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के लगभग 25-30 दिन बाद टाप ड्रेसिंग के रूप में देना चाहिए।
खरपतवार नियंत्रण- बुवाई के समय ही खरपतवार का रसायनिक विधि द्वारा नियंत्रण करना चाहिए। इसके लिए पेण्डीमेथलीन 30 ई0 सी0 का 3.3 लीटर/हे0 को 600-800 लीटर पानी में बुवाई के दो दिन के बाद तक अथवा 2.25 लीटर वासालीन/हेक्टर की दर से 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करे। बुवाई के 25-30 दिन बाद हाथ से एक निकाई-गुड़ाई करने से खरपतवार नियंत्रण के साथ ही साथ जड़ो के पास वायु संचार अच्छा रहता है।
सिंचाई- पहली सिंचाई फूल आते समय करना चाहिए यदि वर्षा हो जाये तो वह भी नहीं आवाश्यक है , आवश्यकता पड़ने पर दूसरी सिंचाई फलियाॅं बनते समय करना चाहिए। शुष्क क्षेत्रो हेतु बौछारी सिंचाई अधिक उपयुक्त होती है। ज्यादा सिंचाई कर देने पर श्वसन क्रिया प्रभावित हो सकती है।
रोग प्रबंधन- सब्जी मटर में लगने वाले प्रमुख रोग एवं उनका प्रबंधन इस प्रकार है।
चूर्णिल आसिता- यह एक बीज जनित बीमारी है। यह बीमारी पत्ती, तना तथा फलियो को प्रभावित करती है। इस बीमारी में पत्तियों पर हल्के गोल चिन्ह बन जाते है। जो बाद में सफेद पाउडर (चूर्ण) के रूप में पत्तियों को ढ़क देते है। जिसके कारण बाद में सभी पत्तियाॅं गिर जाती है। इसके प्रबंधन के लिये 2-3 कि0 ग्रा0 गंधक का चूर्ण 600-800 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
उकठा (फ्यूजेरियम विल्ट) एव जड़ सड़न – यह फफॅुूद से होने वाली भूमि जनित बीमारी है। पौधो की पत्तियाॅं नीचे से ऊॅंपर की ओर पीली पड़ने लगती है और अन्त में पूरा पौधा सूख जाता है।वही जड़ सड़न बीमारी प्रायः गर्मी बढ़ने के कारण बढ़ने लगती है। इसके प्रबंधन हेतु फसल चक्र को अपनाना चाहिए जिसमें ज्वार, बाजरा, गेंहूं की फसल सामिल हो सकती है। खेत में हरी खाद के साथ एक सप्ताह के अन्दर ट्राइकोडर्मा पाउडर 5 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए। बुवाई से पूर्व बीज को कार्बेन्डाजिम 2.5 ग्रा0 /किलो ग्राम बीज की दर से उपचारित कर लेना चाहिए।
रस्ट(गेरूई)- यह रोग फफूंद द्वारा फैलता है। प्रायः नम स्थानो पर अधिक फैलता है। प्रारंभ में पत्तियों की निचली सतह पर छोटे छोटे गेरूई या पीले रंग के उड़े हुये धब्बे बनते है। धीरे-धीरे इन धब्बों का रंग भूरा लाल पड़ने लगता है।कई धब्बों के आपस में मिलने से पत्तियाॅं सूख जाती है। इसके प्रकोप से पौधे जल्दी सूख जाते है, तथा उपज कम हो जाती है। इस रोग के प्रबंधन हेतु सर्वप्रथम रोग से प्रभावित पौधों के अवशेषों को नष्ट कर देना चाहिए। उसके बाद हेक्साकोनाजोल 1 मिली0 प्रति 3 ली पानी या विटरेटीनाल 1 ग्राम प्रति 2 ली0 पानी की दर से घोल बना कर 1 से 2 बार छिड़काव करें।
एन्थ्रेक्नोज-यह भी एक बीज जनित प्रमुख बीमारी है। इस बीमारी में पत्तियों के ऊपर पीले से काले रंग के सिकुड़े हुए धब्बे बन जाते है जो बाद में पूरी पत्ती को ढंक लेते है। छोटे फलो पर काले रंग के धब्बे आने लगते है, तथा रोगी फलियाॅं सिकुड़ कर मर जाती है। यह बीमारी बीज के माध्यम से एक मौसम से दूसरे मौसम में जाती है। इसके प्रबंधन हेतु बुवाई से पहले बीज को कार्बेन्डाजिम 2.5 ग्राम दवा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। रोग रोधी किस्मों का प्रयोग करना चाहिए। फूल आने के बाद कार्बेन्डाजिम का 1 ग्राम प्रति ली0 पानी में घोल बना कर छिड़काव करे।
बैक्टेरियल ब्लाइट- यह एक बीज जनित बीमारी है जो नमी युक्त वातावरण में अधिक फैलती है। इस रोग में डंठल के नीचे की पत्तियों, पत्तियों एवं तनों पर एक पनीला धब्बा बन जाता है। सफेद से क्रीम रंग का स्राव भी दिखता है। धीरे धीरे प्रभावित हिस्सा भूरा होने लगता है। इसके प्रबंधन हेतु रोग रहित बीज का इस्तेमाल एवं बीज शोधन अवश्य कर लेना चाहिए। फसल प्रभावित होने पर स्ट्रेप्टोसायक्लिन रसायन का छिडकाव फायदेमंद है।

कीट प्रबंधन- सब्जी वाली मटर में लगने वाले प्रमुख कीटों एवं उनके प्रबंधन की जानकारी निम्न प्रकार है।
माहूॅ- इस कीड़े का प्रकोप जनवरी के महीने में अधिक होता है। यह कीड़ा पत्तियों और कोमल टहनियों का रस चूसता है। इसके नियंत्रण हेतु मैलाथियान 50 ई0 सी0 कीटनाशक दवा का 1.5 मि0 ली0 प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर 10-10 दिन के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए।
लीफ माइनर (पत्ती में सुरंग बनाने वाला कीट)- यह कीट पौधे की पत्तियों में सफेद धागे की तरह बारीक सुरंग बनाता है। इसके अधिक प्रकोप से पत्तियाॅं सूख जाती है। प्रबंधन हेतु सुरंग बनाने वाली कीट से प्रकोपित पत्तियों को सूड़ी एवं कृमिकोष सहित तोड़कर जमीन में कही दूर स्थान पर गाड़ देना चाहिए। विशेषज्ञ के सलाह पर किसी उचित कीटनासी का प्रयोग करना चाहिए।
फली छेदक- यह कीट फलियों में छेद करके दाने को खाता रहता है। प्रकोपित फलियाॅं रंगहीन, पानीयुक्त तथा दुर्गुन्धयुक्त हो जाती है। इसके प्रबंधन हेतु थायोडान नामक दवा का 2 मि0 ली0 प्रति लीटर पानी मे घोल बना कर छिड़काव करें।
तुड़ाई- मटर की फसल से अधिक आय लेने के लिए समय से तुड़ाई करना आवाश्यक होता है। मटर की तुड़ाई हाॅथ से की जाती है। तुड़ाई के समय पौधो को हानि नही पहुचना चाहिए तथा फलियाॅं भरी हुई तथा मुलायम हरी तोड़नी चाहिए। तुड़ाई सुबह या शाम को करे, सामान्यतः 10 दिन के अन्तर पर 3-4 तुड़ाई करनी चाहिए।
बीज हेतु भण्डारण – हलाकि मटर का बीज उत्पादन एक विस्तृत प्रक्रिया है। परन्तु मोटे तौर पर ध्यान रखने वाली बात यह है कि मटर के आधार बीज के उत्पादन के लिए एक खेत से दूसरे खेत की दूरी 10 मीटर व प्रमाणित बीज के लियें 5 मीटर की दूरी पर्याप्त है।
वही भण्डारण हेतु जिन प्रमुख बातो का ध्यान रखना है वह निम्न प्रकार है।
बीज में नमी की मात्रा 9 प्रतिशत से नीचे तक घटा लेना चाहिए। अधिकतर कीट इतने कम नमी की अवस्था में प्रजनन कर पाने मे असमर्थ हो जाते है।
नये बीज रखने से पूर्व सम्पूर्ण प्रोसेसिंग और भण्डारण ढा़चों की अच्छी तरह साफ और कीटनाशी के छिड़काव द्वारा कीट रहित कर लेना चाहिए।
बीज भण्डारण हेतु यथासंभव नए बैग प्रयोग करने चाहिए।
कीट का प्रकोप होने पर बीज को 3-5 ग्राम की एल्यूमिनियम फास्फाइड की दो गोलयाॅं प्रति टन की दर से 3-5 दिनो तक रखकर फ्युमिगेट करना चाहिए।
इसके अलावा कुछ बाते जैसे बीज भण्डारण गृह की साफ सफाई एवं मौसम अनुकूल देखभाल अत्यन्त आवाश्यक है। (फार्म एन फूड से साभार)

