उमाशंकर सिंह
पटना:जलजमाव के अधिक समय तक बने रह जाने और समय से पहले पाला गिर जाने से टाल के दलहन किसानों पर आफत आ गई है। दलदल बने खेतों को देखकर किसान परेशान हैं। मरांची, मोर औंटा आदि निचले भूभागों में करीब चालीस प्रतिशत खेत खाली पड़े हैं। गंगा में बाढ आने से टाल क्षेत्र से जल निकासी समय पर नहीं हो पाई। मालूम हो कि टाल क्षेत्र का भूगोल ऐसा है कि दक्षिण बिहार की सभी नदियों का पानी इस इलाके में आता है और बरसात के बाद गंगा से होकर निकल जाता है। गंगा में सिल्ट जमा होने से इस प्राकृतिक चक्र पर असर पड़ा है। इस वर्ष स्थिति अधिक खराब हो गई।
जानकारों का कहना है कि रबी की फसल अर्थात गेहूं और विभिन्न दलहन चना,मटर, मंसूर की बुआई 15 दिसंबर के पहले हो जाना चाहिए। परन्तु इसबार एक तो खेतों में अधिक नमी है, दूसरे नोटबंदी की मार की वजह से बुआई पर असर पड़ा है। किसान अरविंद सिंह का कहना है कि घने कोहरे की वजह से खेतों के सूखने और बुआई लायक नमी बनने में काफी समय लगेगा। किसानों के पास इसका कोई समाधान नहीं है।
टाल क्षेत्र के किसानों का कहना है कि इस साल समूचे टाल में दलहनी फसलों बुआई समय पर नहीं हो पाई। बहुत सारा इलाका तो अभी तक परती पड़ी हुई है। नोटबंदी की वजह से खेतों की जुताई और बीज खरीद पर असर पड़ा। जिन किसानों ने कोई जुगत लगाकर खाद-बीज का इंतजाम कर लिया, उनके पास भी घने कोहरे और अत्यधिक ठंड से होने वाले नुकसान को टालने का कोई उपाय नहीं है।
ठंड का सबसे अधिक प्रभाव दलहन पर होगा। गेहूं को तो इससे थोड़ा लाभ मिलेगा। दलहन की फसल भी कई इलाकों की प्रमुख फसल है। उन इलाकों में मोकामा का टाल क्षेत्र भी है। टाल क्षेत्र के जिन खेतों में मसूर की बुआई हो गई हैं, उनपर पाला की गाज गिरी है। पाला की वजह से मसूर की फसल में फूल की जगह फफूंद लग जाती है। इससे मसूर की फसल एक चौथाई कम हो जाने का अंदेशा है। चना पर भी दस प्रतिशत से अधिक असर पड़ेगा। आलू के किसान भी इस पाला से परेशान हैं। लेकिन वे पटवन कर फसल बचा सकते हैं। इसके लिए उन्हें नोटबंदी के असर से उबरना होगा।
बिहार में दलहन की कमी पहले से है। इस वर्ष स्थिति खराब होने की आशंका है। दलहन की कुल खेती में एक चौथाई हिस्सा मसूर का होता है। समय से पहले ठंड बढ जाने से फसल सूखने लगी है। उसमें फफूंद लगने की शिकायत आम है। टाल के अलावा दियारा इलाके में मसूर की खेती बड़े पैमाने पर होती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि फफूंदनाशक दवाओं का छिड़काव कर और सिंचाई कर फसल को बचाया जा सकता है। नोटबंदी की वजह से किसान दोनों का इंतजाम करने में लाचार दिखते हैं।
बिहार में 7.25 लाख हेक्टेयर में दलहन की खेती होती है। जिससे करीब 5.14 लाख टन का उत्पादन होता है। राज्य में हर वर्ष 20.47 लाख टन दाल की खपत होती है। इस वर्ष 7.35 लाख टन उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था।
