बिहार में सिमटती जा रही है साल दर साल दलहन की खेती

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KAMLESH KUMAR SINGHकमलेश कुमार सिंह
पटना: सूबे में गरीबों का निवाला कही जाने वाली दाल-रोटी की कहावत भी गलत साबित होने लगी है। दरअसल, सूबे में पिछले 25 साल में दलहन की खेती में तेजी से गिरावट आई है।  फलस्वरुप, उत्पादन घटने से इसकी कीमत में आया हैै।   80 के दशक में बिहार में 9 लाख हेक्टेयर में दलहन की खेती होती थी, लेकिन आज यह घटकर 6 लाख हेक्टे यर हो गई हैै।   65 हजार हेक्टेयर में सिर्फ अरहर की खेती होती थी, लेकिन आज यह खेती घटकर 26 हजार हेक्टेयर पर पहुंच गई हैै।   गिरावट की यब बानगी सिर्फ अरहर की खेती में नहीं है, बल्कि चना और उड़द की खेती का भी यही हाल हैै।   लखीसराय एवं आसपास के जिलों को दाल का कटोरा कहा जाता था, लेकिन आज यहां भी काफी उत्पादन घटा हैै।

adu-c-2मौजूदा  साल की बात करें तो स्थिति भयावह ही नजर आती हैै।   राज्य में दलहन की कमी पहले से ही है और इस वर्ष मौसम की मार के कारण स्थिति और भी खराब होने की संभावना है।  कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, बिहार में कड़ाके की ठंड और पड़ रहे पाले की स्थिति में एक दो दिनों के अंदर यदि कमी नहीं आयी, तो किसानों को करीब तीन सौ करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता हैै।   ठंड का सबसे अधिक कुप्रभाव दलहन पर पड़ेगा।  इस तरह के मौसम में मसूर की फसल में एक चौथाई की कमी आयेगी। चना की खेती पर भी दस प्रतिशत असर पडऩे की संभावना है।  इस वर्ष सरकार ने 25 लाख क्विंटल मसूर और लगभग 17 लाख ङ्क्षक्वटल चना उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया है। मसूर का समर्थन मूल्य बोनस को लेकर 3950 रुपये प्रति क्विंटल है और यदि एक चौथाई फसल मौसम के मार के कारण प्रभावित होता तब किसानों को सिर्फ मसूर की खेती से लगभग 250 करोड़ का नुकसान होगा। इसी तरह चना के पैदावार में यदि 10 प्रतिशत की कमी हुयी तब किसानों को लगभग 63 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना होगा ।

matar-82354केंद्र और राज्य सरकार के बीच समनवय कैसा है यह  मंत्रियों के आरोप प्रत्यारोप से साफ समझा जा सकता है।  अगर सरकार की ओर से इस दिशा में कारगर कदम नहीं उठाए गए तो बिहार से दलहन को खत्म होने में ज्यादा वर्ष नहीं लगेंगे।  आईपीआर कानपुर के निदेशक डा. एनपी सिंह ने कहा कि बिहार में दलहन फसलों का रकवा काफी घटा है। खासकर अरहर (दलहन) की यह स्थिति है कि कहीं यह बिहार से लुप्त न हो जाए।
सरकार नई  नई  चीजों का बाजार  खोज रही है, जिसमे सिर्फ उपभोक्ताओं की एक नई  पीढ़ी  तैयार हो रही है।  बुनयादी  चीजों की उत्पादकता व उपलब्धता पर  ज्यादा  जोर  नहीं लगता।

panuuuuu_n हाल  ही में केंद्र सरकार  ने सूबे में  दलहन की उत्पादकता  बढ़ाने के लिए  दलहन बीज उत्पादन के लिए बिहार में नौ केन्द्र (हब) बनाने का निर्णय लिया है। बिहार के बीज हब से मसूर, मूंग, चना, मटर के बीच का गुणवत्तापूर्ण उत्पादन बढाया जाएगा। इन हबों के जरिए न सिर्फ बीज बल्कि बीज का उत्पादन करने वाले किसानों की उपज को बीज के रूप में खरीददारी सुनिश्चित करने का इंतजाम भी सरकार करेगी। किसानों को उनके द्वारा तैयार किये गये बीज की कीमत बाजार भाव से 15 से 20 प्रतिशत अधिक दिया जाएगा। देखना  होगा    इस  व इन  जैसे  दूसरे उपायों से  सूबे  में  लुप्त  होते दाल को बचाया जा सकता  है  या नहीं ?

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