अमरनाथ झा
पटना: बिहार में दलहन की खेती की चर्चा बिहार का दलहन का कटोरा माने जाने वाला मोकामा टाल के चर्चा के बिना पूरा नहीं होगा। जी हां, यहां के किसान अभी दोहरी मार से जूझ रहे हैं। एक ओर नोटबंदी की मार झेलना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर पटना ज़िले के फतुहा, बख्तियारपुर, बाढ़ पंडारक और मोकामा प्रखंडों की करीब 48517 हेक्टेयर ज़मीन जहां किसान चना, मटर, मसूर और राजमा जैसे दलहनों की खेती करते हैं, उसकी चर्चा न हो तो फिर सही परिदृश्य नहीं उभर पायेगा। राज्य में लगभग छह लाख हेक्टेयर ज़मीन में दलहन की खेती की जाती है, जिसका 30 फीसदी हिस्सा टाल क्षेत्र में आता है। पिछले कई वर्ष से यह पूरा क्षेत्र जलजमाव से परेशान है,और इस पूरे ईलाके की दलहनी फसल लगभग तबाह हो गयी है। बुआई के दिनों में खेत में पानी जमा रहता है, और जब पानी निकलता है तो दलहन की बुआई का मौसम लगभग खत्म हो गया है। हमारे बुर्जुगों ने कहा भी है अगिला खेती आगे आगे, पछिला खेती भागे जोगे। तो यहां की पूरी दलहनी खेती भागे जोगे चल रही है।
भाग्य भी ऐसा जो दुर्दिन को खत्म करने या पीछे छोड़ने का नाम नहीं लेता। रबी मौसम में दलहन की बुआई 15 अक्टूबर से 10 नवम्बर तक की जाती है। मोकामा के टाल में 20 हजार बीघा व मोकामा टाल में 56 हजार बीघा के साथ बड़हिया, ऊंटा और मरांची के लाखों एकड़ में दलहन की खेती होती है। लेकिन इस पूरे इलाके में महीनों तक बाढ़ का पानी जमा होता है। ऐसा भी नहीं है कि यह सिर्फ एक साल की बात हो, पिछले कई वर्षों से टाल की ज़मीन दगा दे रही है। इस पूरे ईलाके में चने की भरपूर फसल होती है। लोग बड़े पैमाने पर मसूर दाल की खेती भी करते हैं।
क्या है वर्तमान स्थिति
अन्य वर्ष की भांति इस वर्ष भी किसान बेहाल है। ज्यादातर किसान की खेत अभी भी परती है, और जो बोए गए हैं उन खेतों मेें देर से फसल बावग होने के कारण कीटों का प्रकोप है। मोकामा प्रखंड के कृषि पदाधिकारी रवीन्द्र कुमार जब अपने किसान सलाहकारों और इलाके के किसानों को लेकर इन ईलाकों में दौरा किया तो उनकी राय है कि मरांची टाल में एक हजार बीघा से अधिक रकबा में खेती नहीं हो पाई है। रवीन्द्र कुमार अपनी रिपोर्ट विभाग को देंगे ताकि किसानों को राहत मिल सके। वहीं इस इलाके के किसान नेता अरविंद सिंह का कहना है कि मरांची टाल के किसानों के समक्ष इस बार जबर्दस्त संकट है,और किसान किसान टूट गए हैं। मरांची उत्तरी पंचायत के मुखिया राम कुमार सिंह भी ऐसी ही राय रखते है। उनका कहना है कि इस इलाके में जल जमाव नयी बात नहीं रह गयी है। इस वर्ष भी जल जमाव के कारण दलहन की बावग एक तो कम हुई और जो हुई वो देर से हुई। देश के दूसरे बड़े दलहन उत्पादक क्षेत्र यानी टाल में इस बार दलहनी फसल पूरी तरह कीड़ों की चपेट में आ गई है. सैकड़ों हेक्टेयर की फसल चौपट हो चुकी है, जिससे उत्पादन में भारी गिरावट आने की आशंका है.
इलाके के किसान उमाशंकर सिंह बताते हैं कि मोकामा टाल में मसूर और चना की फसल पर काफी प्रभाव पड़ा है। पौधे बीमार हो रहे हैं और सूखा रोग से ग्रसित हो रहे हैं। सूखा रोग से ग्रसित दलहनी फसल के पौधों की पत्तियां पीली होने लगी हैं और जिस पौधे के पत्ते पीले होते हैं वह पौधा भी तुरंत सूख जाता है। इलाके के किसानों को मुआवजा मिलना चाहिए जिनका खेत परती रह गया है।
स्थाई समाधान की है जरूरत
कृषि विज्ञान केंद्र अगवानपुर के वैज्ञानिक डॉ. उमेश सिंह का कहना है कि टाल में लगातार एक ही फसल की बुआई करने से मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है। पहले जहां स्थानीय प्रभेद की खेती की जाती थी, वहीं अब उन्नत और हाईब्रिड बीजों का दौर आ गया है। बावजूद इसके किसान पारंपरिक तरीक़े से ही खेती कर रहे हैं, जिसका खामियाजा दलहन उत्पादन में गिरावट के रूप में भुगतना पड़ रहा है। कृषि के जानकार टाल में सिंचाई व्यवस्था का न होना इसका सबसे बड़ा कारण मानते हैं। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी दलहन की फसल समय पर लगे इसके लिए प्रशासन की तरफ से 20 अक्टूबर को बीडीओ सहित कई अधिकारी मोकामा के डुमरा गांव के पास हेमजा कट से पानी निकालने गये थे, लेकिन ग्रामीणों के विरोध के बाद खाली हाथ लौट गये।
किसान अपनायें नयी तकनीक
इस पूरे इलाके में किसान पारंपरिक तरीक़े से ही खेती कर रहे हैं, जिसका खामियाजा दलहन उत्पादन में गिरावट के रूप में भुगतना पड़ रहा है। कृषि विशेषज्ञों की राय है कि सिंचाई व्यवस्था का न होना इसका सबसे बड़ा कारण मानते हैं. मध्य प्रदेश में सिंचाई व्यवस्था कारगर है, जबकि टाल में आज भी दाल की पैदावार भगवान भरोसे ही निर्भर है। किसान डीजल पंपों की सहायता से कहीं-कहीं सिंचाई कर पाते हैं, जबकि ज़्यादातर किसान बुआई के बाद केवल फसल काटने ही खेत जाते हैं। सिंचाई के साधनों के अभाव में टाल के किसान किसी दूसरी फसल की खेती नहीं कर पाते हैं।
