साधारण किसान का असाधारण संकल्प

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विजय कुमार चौधरी

  • नील के मूल्य का निर्धारण मनमाने तरीके से किया जाता था। हालांकि नील के बदले मक्का, गेहूं, धान आदि का उत्पादन करना अधिक लाभप्रद था, लेकिन किसान अंग्रेजों के आतंक के कारण बेबस थे।

वर्ष 2017 को चंपारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष के रूप में मनाए जाने के चलते अपने ढंग के इस अनोखे आंदोलन के विभिन्न पहलुओं की चर्चा हो रही है, लेकिन कुछ पहलू ऐसे हैं जिन पर पर्याप्त प्रकाश नहीं पड़ सका है। इससे सब अवगत हैं कि 18वीं शताब्दी समाप्त होते-होते ईस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से आए अंग्रेजों ने अपना साम्राज्य पूर्वी भारत के ग्रामीण इलाकों तक फैला लिया था। वे अपने प्रभाव वाले इलाके में किसानों से जबरन नील की खेती कराते थे। हर किसान को बीस कट्ठे में कम से कम क्रमश: तीन कट्ठे में नील की खेती अनिवार्य रूप से करनी पड़ती थी।

नील के मूल्य का निर्धारण मनमाने तरीके से किया जाता था। हालांकि नील के बदले मक्का, गेहूं, धान आदि का उत्पादन करना अधिक लाभप्रद था, लेकिन किसान अंग्रेजों के आतंक के कारण बेबस थे। इस नीले आतंक से किसान विपन्नता की स्थिति में पहुंच गए। 1 भारत से पहले अंग्रेज अपने अमेरिकी उपनिवेश में नील की खेती कराते थे। 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अमेरिकी उपनिवेश में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह शुरू हो चुका था। वहां फैली अव्यवस्था के कारण नील की आपूर्ति बाधित हो रही थी। इसी कारण 1793 में लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा ‘स्थाई बंदोबस्ती’ प्रथा भारत में लागू की गई। इसके तहत एक निश्चित भू-भाग को लंबे समय के लिए किसी जमींदार को सौंप दिया जाता था।

किसानों से भू-लगान वसूली करने की जिम्मेदारी उक्त जमींदार की ही होती थी। इससे किसानों की जिंदगी नारकीय बन गई थी। इन हालात में चंपारण के पंडित राजकुमार शुक्ल का विद्रोही व्यक्तित्व अन्याय को सहने के लिए तैयार नहीं था। नरकटियागंज के नजदीक 1875 में मुरली भरहवा गांव में जन्में शुक्ल एक छोटे किसान थे। वह अपने इलाके में बेलवा की नील फैक्ट्री के अंग्रेज मैनेजर एमन के दमनकारी कार्यो का खुला विरोध करते थे। इस कारण उन्हें अनेक झूठे मुकदमे में फंसाया गया, फिर भी उनका क्रांतिकारी चरित्र एमन के सामने झुका नहीं। नीले आतंक के खिलाफ उस समय आवाज उठाने वालों में शेख गुलाब, हरवंश सहाय, पीर मुहम्मद आदि का नाम उल्लेखनीय है।

पीर मुहम्मद किसानों की दुर्दशा के संबंध में खबरें लिखा करते थे जो उस समय कानपुर से प्रकाशित होने वाले ‘प्रताप’ में छपती थीं। ‘प्रताप’ के संपादक स्वतंत्रता सेनानी गणोश शंकर विद्यार्थी थे। इस तरह शुक्ल जी गणेश शंकर विद्यार्थी के संपर्क में आए। उन्हें दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद नीति के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान एवं गांधी के व्यक्तित्व की जानकारी विद्यार्थी जी से मिली। 1अंग्रेजी आतंक के खिलाफ विद्रोह में स्थानीय लोगों को शामिल करने में पूर्ण सफल नहीं होने पर शुक्ल जी के मन में गांधी को चंपारण लाकर किसानों की दुर्दशा एवं अंग्रेजों की दमनकारी नीति का सीधा अनुभव कराने का विचार आया और वह इसके लिए संकल्पित हो गए।

इस एक संकल्प ने न सिर्फ आधुनिक भारत के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ दिया, बल्कि गांधी के नेतृत्व कौशल में गुणात्मक परिवर्तन करने की नींव तैयार की। यह शुक्ल जी का दृढ़ निश्चय ही था कि वह गांधी को चंपारण बुलाने में सफल हुए। गांधी को चंपारण बुलाने के लिए शुक्ल जी का दिसंबर 1916 के लखनऊ कांग्रेस के कार्यक्रम में गए। वहां से वह गांधी जी का पीछा करते कानपुर, अहमदाबाद, कलकत्ता पहुंचे। उनकी ओर से गांधी जी को चंपारण आने को मजबूर करना इतिहास में मील का पत्थर बन गया। लखनऊ में किसी ने शुक्ल जी को गंभीरता से नहीं लिया था, लेकिन बाद में कांग्रेस ने चंपारण के किसानों की दुर्दशा पर चर्चा की और गांधी कलकत्ता से पटना एवं मुजफ्फरपुर होते हुए चंपारण पहुंचे।

राजकुमार शुक्ल जैसे साधारण किसान का संकल्प कि किसानों को दुर्दशा एवं शोषण से त्रण गांधी का नेतृत्व ही दिला सकता है-एक विलक्षण एवं चिर-स्मरणीय घटना है। इस संकल्प ने चंपारण सत्याग्रह का बीजारोपण किया। इस सत्याग्रह की सफलता से किसानों की दशा में सुधार हुआ और गांधी महात्मा बन गए। इसी क्रम में राजेंद्र प्रसाद, जेबी कृपलानी आदि उनसे मिले एवं सरदार वल्लभ भाई पटेल एवं महादेव देसाई जैसे लोग उनके प्रभाव में आए। इसके पहले तक गांधी बुद्धिजीवियों, व्यवसायियों एवं चंद खास लोगों में ही लोकप्रिय थे। चंपारण के किसानों के दर्द की अनुभूति ने उन्हें आम लोगों का नेता बना दिया।

शायद यहीं से उनके राष्ट्रपिता बनने की बुनियाद भी पड़ गई। कल्पना करें कि यदि राजकुमार शुक्ल गांधी से न मिलते तो क्या होता? दोनों अगर न मिलते तो शायद शुक्ल एक विद्रोही स्वभाव के आंदोलनकारी किसान के रूप में अंग्रेजी हुकूमत के दमनकारी नीतियों के खिलाफ संघर्ष करते गुमनामी में ही अंतिम प्रयाण कर जाते। इसी तरह अगर गांधी चंपारण आंदोलन की कसौटी पर नहीं तपते तो शायद गांधी बनने में भी समय लग जाता। चंपारण सत्याग्रह के बाद ही गांधी के व्यक्तित्व की आभा फूटी और वह पीड़ित भारतीय जनमानस के उद्धारक के रूप में प्रकट हुए।

चंपारण से निकले गांधी के तेज ने सभी कांग्रेसियों को संगठित किया और सारा देश उनके साथ हो लिया। यहीं से उनके सारे आदर्श, सिद्धांत (सत्य, अहिंसा, प्रयोग आदि) स्पष्ट आकार लेने लगे। इसीलिए चंपारण सत्याग्रह के इस शताब्दी वर्ष में जब हम गांधी जी का नमन कर रहे हैं तो पंडित राजकुमार शुक्ल का भी श्रद्धावनत होकर स्मरण करना चाहिए। [लेखक बिहार विधानसभा के अध्यक्ष हैं..  दैनिक जागरण से साभार]

 

 

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