इथेनॉल उत्पादन में अग्रणी बनेगा बिहार,लगाई जाएंगी इथेनॉल उत्पादन ईकाईं

अमरनाथ झा
पटना: बिहार में इथेनॉल उत्पादन बड़े पैमाने पर होगा। इसे गन्ना, मक्का और सड़े हुए अनाज से बनाया जाएगा। राज्य कैबिनेट ने इथेनॉल प्रोत्साहन नीति को मंजूर कर लिया है। इथेनाल उत्पादन के लिए अलग उत्पादन नीति बनाने वाला बिहार पहला राज्य बन गया है।
राज्य सरकार इथेनॉल का उत्पादन इकाइयों को वर्ष 2016 की औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन नीति के अलावा पूंजीगत अनुदान भी देगी। यह रकम अधिकतम पांच करोड़ रुपया तक होगा। इकाई लगाने के लिए इस साल 30 जून तक आवेदन देना होगा। उद्योग विभाग एक सप्ताह के भीतर आवेदन का निपटारा करेगा। यह इथेनॉल प्रोत्साहन नीति 2025 तक प्रभावी रहेगी।

उद्योग मंत्री शाहनवाज हुसैन के अनुसार, बिहार में अभी 12 करोड़ लीटर इथेनॉल उत्पादन हो रहा है। इसे बढ़ाकर 50 करोड़ लीटर करने का लक्ष्य है। उन्होंने कहा कि बिहार से करीब 30 लाख टन मक्का पंजाब समेत दूसरे राज्यों में चला जाता है। इथेनॉल उत्पादन इकाइयों के लगने के बाद उसका यही इस्तेमाल हो सकेगा। इसके साथ ही धान,चावल और दूसरे सड़े अनाज से भी इथेनाल बनाया जाएगा। किसान सड़े अनाज भी इथेनॉल उत्पादन इकाइयों को बेच सकेंगे। उन्होंने कहा कि इथेनॉल प्रोत्साहन नीति बनने के बाद 30 निवेश प्रस्ताव मिले हैं। इसमें से चार निवेशकों ने आगे कदम बढ़ाए हैं। उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार ने अगर 2007 में राज्य सरकार की ओर से भेजे गए इथेनॉल उत्पादन के प्रस्ताव को अनुमति दी होती तो बिहार में 21 हजार करोड़ रुपए का निवेश आ चुका होता।
इथेनॉल उत्पादन इसलिए जरूरी है ​क्योंकि इथेनॉल को पेट्रोल में मिलाया जाता है जिससे पेट्रोल की ज्वलनशीलता बढ जाती है, कार्बन उत्सर्जन कम होता है, दूसरी ओर पेट्रोल की लागत भी कम होती है और आयात पर निर्भरता कम होती है। लेकिन गन्ना से इथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने से चीनी का उत्पादन घटने के अंदेशे में केन्द्र सरकार इसकी अनुमति देने में हिचकती रही है। पर चीनी के उत्पादन के दौरान निकले कचरा अर्थात मोलासेज से बने इथेनाल की उपयोगिता को देखते हुए इथेनॉल उत्पादन बढाने की सीमित अनुमति दी जाने लगी। इथेनॉल सीधे गन्ने के रस से भी बनाया जा सकता है और उससे चीनी बनाने की प्रक्रिया में तीन अलग-अलग स्तरों पर भी बनाया जा सकता है। अब मक्का, उसके तना और सड़े अनाज से इथेनॉल के उत्पादन की तकनीक आ जाने के बाद बड़े पैमाने पर इथेनॉल बनाने का रास्ता साफ हो गया है। अभी चीनी मीलों में इथेनॉल बनाने की ईकाइयां लगी हैं, लेकिन नई तकनीक के आने के बाद इसके स्वतंत्र इकाई लगाया जा सकता है।


चीनी मीलों में बने इथेनॉल तेल(पेट्रोल) बेचने वाली कंपनिया (ओएमसी) खरीदती हैं और उसे निर्धारित मात्रा में पेट्रोल में मिलाकर पेट्रोल बेचरी है। इथेनॉल की खरीद का मूल्य सरकार निर्धारित करती है। इस वर्ष पेट्रोल का मूल्य बढ़ने से बाजार में इथेनॉल की मांग बढ़ गई है, इसलिए कीमत बढ़ने की पूरी संभावना है। जानकारी के अनुसार, इस वर्ष तेल कंपनियां 283 करोड़ लीटर इथेनॉल खरीदने वाली है जिन्हें पेट्रोल में दस प्रतिशत तक मिलाया जा सकता है। तेल कंपनियों द्वारा इथेनॉल की खरीद 2013-14 में लगभग 38 करोड़ लीटर के बाद लगातार बढ़ती गई है। इथेनॉल का उत्पादन बढ़ने का कारण है।

आमतौर पर गन्ने के रस से चीनी बना लेने के बाद कचरे के रूप में बचे मोलासेज से होता रहा है। इसे सी-ग्रेड का मोलासेज कहा जाता है। अभी जितनी इथेनॉल की खरीद होने जा रही है, उसमें से केवल 59.9 करोड़ लीटर सी ग्रेड के मोलासेज से बना है। बाकी इथेनॉल में गन्ने के समूचे रस के फारमेटेशन के जरिए ( 42.2 करोड़ लीटर) और मध्यवर्ती मोलासेज अर्थात बी-ग्रेड मोलासेज से बना(181 करोड़ लीटर) से बना है। मीलों के बी-ग्रेड मोलासेज और सीधे गन्ने के रस से बने इथेनाल की कीमत अधिक मिलती है। पर चीनी का उत्पादन घट जाता है। इसलिए पहले इस तरह इथेनॉल बनाने की अनुमति नहीं थी। इसबार वर्ष 2020-21 में तेल कंपनियों द्वारा खरीद होने वाले इथेनॉल की कीमत लगभग 15, 800 करोड़ रुपए आंकी गई है। इस लिहाज से इथेनॉल उत्पादन बढ़ने की संभावना है।
इतना ही नहीं उत्पादन बढ़ने से चीनी मिलों की आमदनी बढ़नी तो तय है लेकिन गन्ना पैदा करने वाले किसानों को इसकी कितना लाभ मिलेगा, इसके बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। इस वर्ष बिहार की दो गन्ना मिलें-रीगा और सासामुसा चली ही नहीं। वहां के गन्ना किसान सैकड़ों मिल दूर की मिलों में गन्ना भेजने या उसे खेत में ही जला देने के लिए मजबूर हैं। इसे लेकर रीगा चीनी मिल के इलाके के गन्ना किसान आंदोलन भी कर रहे हैं, पर उनकी तकलीफों की कोई सुनवाई नहीं हुई है।

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