गाजीपुर: कृषि वैज्ञानिक अपने स्तर पर क्षेत्र के किसानों को समय—समय पर सुझाव देते हैं। उन्हें प्रशिक्षित करते हैं। उनकी जरूरतों को पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ाते हैं ताकि हमारे किसान भाई बिना किसी बाधा के कृषि का काम कर सकें। कृषि विज्ञान केन्द्र, पीजी कालेज, गाजीपुर द्वारा भी समय—समय पर किसानों साथ बैठक का आयोजन किया जाता है। इसी तरह की एक बैठक सह एक दिवसिय प्रशिक्षण शिविर का आयोजन केन्द्र के चेयरमैन राजेश्वर प्रसाद सिंह के दिशा निर्देशन में मनिहारी ब्लाक के शाहपुर गांव में आयोजित किया गया। जहां किसान भाईयों को बाढ़ ग्रसित क्षेत्रों में, पशुओं में होने वाली प्रमुख बीमारियों व उनकी रोकथाम पर जानकारी दी गयी।
इस दौरान केन्द्र के पशुचिकित्सा वैज्ञानिक डाॅ डीपी श्रीवास्तव ने किसानों को बताया कि कुछ घास-पात व खरपतवार ऐसे होते हैं जिन्हें बाढ़ के समय पशुओं को खिलाया जा सकता है। जैसे-हरी शैवाल या पानी की हरी काई को सुखाकर जानवरों को खिलाया जा सकता है। जापान में इसका पशुओं के हरे चारे के रूप में काफी प्रचलन है। इसमें 34-40 प्रतिशत प्रोटीन तथा 15 से 20 प्रतिशत वसा पायी जाती है। परन्तु यदि काई नीले रंग की है तो इसे पशुओं को नहीं खिलाना चाहिए।
पशुओं को दें कीड़े की दवा
बाढ़ ग्रसित क्षेत्रों में, बाढ़ खत्म होने के बाद कीड़े की दवा अवश्य दें, चाहे पशु गाभिन हो या दूध देने वाला हो। इस दौरान पशुओं को पेड़ों की पत्तियां जैल पीपल, गूलर तथा बरगद, तेंदू, पिलखन केला, तरबूज, खरबूज तथा झरबेरी आदि खिलाया जा सकता है। कीड़े की दवा देने के पश्चात् प्रतिजैविकी पदार्थ राशन के साथ प्रयोग किया जाता है, इसकी थोड़ी सी मात्रा कई जीवाणुओं को समाप्त करने की क्षमता रखती है। परन्तु इसका उपयोग स्वस्थ पशुओं को नहीं खिलाना चाहिए।
बाढ़ के पश्चात रखें विशेष ध्यान
इस दौरान पशुओं में गलाघोंटू तथा सर्रा की समस्या भी काफी आती है। ज्यादातर पशु बाढ़ समाप्त होने के बाद बीमार पड़ते हैं तथा उसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता जानवरों की घटती जाती है। इसी कारण से उसमें तरह-तरह के रोग होने के आसार ज्यादा रहते हैं। रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण कुछ बीमारियां जैसे गलाघोंटू इत्यादि ज्यादा फैलाता है। इसलिए इस दौरान पशुओं में खान-पान का ज्यादा ध्यान रखना चाहिए तथा वातावरण में छोटे-छोटे पेड़ पौधों के सड़ने की वजह से वायु प्रदूषित हो जाती है। इसके लिए नीम की सूखी पत्तियां शाम के समय उसका धुंआ करने से वातावरण में मौजूद हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट किया जा सकता है तथा कोशिश कर इस सड़े पौधों को साफकर दूर खाद गड़ढे या कहीं अन्य जगह रखकर उर्वरक बनाने में उपयोग किया जा सकता है। प्रशिक्षण के दौरान कुल 26 किसान मौजूद थे। इस दौरान किसानों को थनैला रोकथाम की दवा भी वितरित की गई। प्रशिक्षण शिविर में विभाग के वरिष्ट वैज्ञानिक एवं विभागाध्यक्ष डा दिनेश सिंह ने भी शिरकत किया।


