- जिले के पांच ब्लाकों में केवीके ने गोद लिए हैं गांव
- मत्स्य व मशरूम उत्पादन सहित होगा मधुमक्खी पालन
मऊ : देश में जगह—जगह से किसान आंदोलन की खबरे आ रही है। इस बीच किसान खरीफ की तैयारी में लगा है। लेकिन कृषि वैज्ञानिक भी जमीन पर उनका सहयोग कर रहे हैं। यही कारन है कि इस खरीफ सीजन में कृषि विज्ञान केंद्र पिलखी ने पांच ब्लाकों में गोद लिए गांवों को माडल रूप में विकसित करने की योजना बनाई है। धान में बीज उत्पादन के साथ उन्नत खेती के सभी आयामों को अपनाने के साथ पशुपालन, मत्स्य पालन का भी विकास किया जाएगा। इसके साथ ही मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन सहित छोटे-छोटे कार्यों से लोगों को रोजगार की दिशा में भी प्रेरित किया जाएगा। समग्र ग्रामीण विकास की अवधारणा के साथ इन गांवों को माडल रूप देने का प्रयास केंद्र करेगा।
वरिष्ठ केवीके वैज्ञानिक डा. वीके सिंह बताते हैं कि जिले के खुखुंदवा, सरवां, सेमरी जमालपुर, रामपुर सोहड़ और परमानंद पट्टी गांव को आदर्श रूप में विकसित करने के लिए केंद्र द्वारा गोद लिया गया है। इस खरीफ सीजन में इन गांवों में जीरोटील मशीन सहित सामान्य रोपाई विधि द्वारा बीज उत्पादन पर बल दिया जा रहा है। इस गांवों में कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा कृषक हित में सभी तरह की तकनीकों का प्रयोग करते हुए उनके समग्र विकास पर बल दिया जाएगा। गांव में खेती-किसानी के साथ पशुपालन और बागवानी और मत्स्य पालन पर भी विस्तार से कार्य किया जाएगा।
बेस लाइन सर्वे का काम हुआ पूरा
गोद लिए गांवों का बेस लाइन सर्वे पूर्ण कर लिया गया है। डाटा में प्रत्येक परिवार की परिसंपत्तियों के साथ पशुधन, बाग-बगीचों और जलाशयों का भी विवरण लिया गया है। गांव के लोगों को रोजगार से जोड़ने के लिए पुरुष व महिलाओं के अलग-अलग समूह बनाकर उन्हें प्रशिक्षित किया जाएगा। ग्रामीणों के निर्मित समूह द्वारा स्थानीय स्तर के उत्पादन पर जोर दिया जाएगा। रोजगार से संबंधित विषयों पर उन्हें प्रशिक्षित कर स्वावलंबी बनाया जाएगा। इस काम में केंद्र से जुड़े सभी विषय विशेषज्ञों द्वारा विकास की रणनीति पर व्यापक कार्य किया जा रहा है। एक गांव को माडल बनाकर आसपास के गांवों को प्रेरित किया जाएगा।
केवीके प्रभारी डा. डीपी सिंह ने बताया कि गांव में तकनीकों के प्रयोग में जैविक खेती पर जोर दिया जाएगा। अंधाधुंध रसायनों के प्रयोग से मिट्टी में हो रहे बदलाव के साथ खाद्यान्न पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इससे स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है। जैविक खेती को बढ़ावा देते हुए जैविक उर्वरक उत्पादन की इकाइयों का भी निर्माण किया जाएगा। परंपरागत खेती में जैविक खाद के प्रयोग के साथ उन्नत कृषि उत्पादन पर जोर देकर आसपास के गांवों को इससे जोड़ा जाएगा।


