दुर्गावती के चेहरिया गांव के इस कुनबे में 18 वर्ष की उम्र में दिव्यांगता के शिकार हुए परिवार के सारे सदस्य

मनोज कुमार

शासन और प्रशासन से आर्थिक मदद नहीं मिलने पर आत्मदाह की कही बात

बक्सर: कैमूर जिले के दुर्गावती के चेहरिया गांव में एक ऐसा भी परिवार है, जिसमें 18 वर्ष की उम्र में आते-आते लोग दिव्यांगता के शिकार हो जा रहे हैं। आर्थिक विपन्नता से जूझ रहे इस कुनबे के तीन सहोदर भाई के साथ ऐसा ही हुआ है। मां बाप गरीबी अभिसप्त जीवन में अपने होनहार तीन बच्चों की परवरिश बेहतर तरीके से किए लेकिन उन्हें यह पता नहीं था कि बुढ़ापे में हमें ही अपने तीनों बच्चों की परवरिश करनी होगी। खैर दुख दर्द भरी जिंदगी के बीच शीतल सिंह कोरोना काल में अपने तीन बच्चों को उसी हालात में छोड़ कर चले गए। अब बच्ची है तो 60 वर्षीय मां सावित्री देवी जो अपने तीनों दिव्यांग बच्चों की परवरिश कर रही है।

जी ये दुख भरी ये दास्तां है दुर्गावती के चेहरिया गांव में दिव्यांगता के शिकार एक परिवार की। बुधवार को एक छत के नीचे आंगन की फर्श पर एक जगह बैठे दीपक सिंह, प्रदीप कुमार सिंह और प्रभाकर सिंह ने जब बारी-बारी से अपनी व्यथा सुनाइ तो तीनों भाइयों की आंखें भर आई तो मां फूट-फूट कर रोने लगी। शारीरिक रूप से दिव्यांगता के शिकार प्रदीप कुमार सिंह ने बताया कि मस्कुलर डिस्ट्रॉफी नाम की बीमारी सबसे पहले मेरे बड़े भाई दीपक सिंह को हुई जिन्होंने 2001 में मैट्रिक की परीक्षा पास की 2003 में इंटर और जैसे ही स्नातक में दाखिला लिए यह बीमारी उनके भीतर घर कर गई। तब तक हम दोनों भाई शारीरिक रूप से स्वस्थ थे। बड़े भाई का इलाज बनारस, लखनऊ, दिल्ली के बाद कोलकाता में हुआ।

 दिव्यांगता के शिकार  परिवार को यह  तब पता चला कि इस बीमारी का इलाज भारत में नहीं है इसके लिए यूएसए जाना होगा और इस बीमारी के इलाज के लिए कम से कम 40 से ₹50 करोड़ खर्च होंगे जो हम लोगों की हैसियत नहीं है। इसके एक दो साल के भीतर मैं खुद इस बीमारी का शिकार हो गया और उसके एक साल बाद मेरा छोटा भाई प्रभाकर भी यानी एक-एक करके हम तीनों शिकार बन गए। आज 30/ 35 वर्ष की उम्र में किसी भी काम के लिए घर से दूर जाने के लिए किसी की गोद का सहारा लेना पड़ रहा है।
दिव्यांगता के शिकार  परिवार को सरकारी सुविधा के नाम पर सिर्फ शौचालय और अंत्योदय कार्ड ही नसीब हो सका है। राशन कार्ड भी अगस्त 2018 में बंद कर दिया गया। काफी प्रयास के बाद जून 2020 से राशन मिलना शुरू हुआ है। खैर मां सावित्री देवी को मलाल हैं कि अपने तीन बच्चों की दिव्यांगता के चलते तो पहले ही परेशान थीं, अब बच्चों की इस दशा ने सुख-चैन छीन लिया है। इसके आगे प्रभाकर बताते हैं कि अभी तो हम लोगों की सेवा मां कर रही है लेकिन मां भी चंद दिनों की मेहमान हैं। जब हम लोगों के सिर से मां का साया उठ जाएगा तो हम तीनों भाइयों की परवरिश कौन करेगा। ऐसे में बार-बार यही ख्याल आता है क्यों ना हम तीनो भाई एक साथ आत्महत्या कर ले कारण यह कि कई मर्तबा बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी से दिव्यांगता के शिकार  परिवार की बात हुई। रोजगार के सवाल पर उन्होंने दो टूक जवाब दिया रोजगार की बात बंद करें। सरकार की योजनाएं आपको मिलेगी। दिव्यांगता के शिकार  परिवार की बात इसके बाद पूर्व विधायक अशोक सिंह से लेकर एमएलसी संतोष सिंह और केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे तक से  हुई लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात वाली। वहीं दूसरों के सहारे दर्जनों मर्तबा साल 2012 से अब तक के जिलाधिकारी से दिव्यांगता के शिकार  परिवार के तीनो सदस्य मिल चुके हैं। वहा यही कहा गया कि अविवाहित लोगों के लिए कोई योजना नहीं है सबसे बड़ी बात यह कि केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी आयुष्मान भारत योजना का कार्ड मेरे पिता के नाम से था जब वे बीमार हुए और बीएचयू इलाज के लिए ले गए तो आयुष्मान भारत कार्ड को कूड़ेदान में फेंक दिया गया और कहा गया यहां यह नहीं चलता।

 

वैसे दिव्यांगता के शिकार  परिवार दिव्यांगता के बीच हर मुसीबतों से जूझ रहा है। एक-एक दाने को मोहताज भाइयों ने बताया कि पिछले 12 सालों से हम लोगों ने सूर्योदय और सूर्यास्त नहीं देखा है और ना ही बदन पर सूर्य का प्रकाश पड़ा है। चूकी एक कदम भी चलना मुश्किल है, बंद कमरे में ही जिंदगी कटती है ऐसी स्थिति में दिव्यांग सहोदर भाइयों ने स्वालंबन का रास्ता अख्तियार किया है और गांव के 10/20 बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते हैं जिससे 2 जून की रोटी नसीब हो रही है। खैर इनके हालात पर न सरकार को रोना आया और ना ही प्रशासन को साथ ही देशभर में भरे पड़े एनजीओ की। बड़े भाई दीपक बताते हैं कि मस्कुलर डिस्ट्रॉफी नाम की बीमारी केवल पुरुषों में होती है। महिलाओं में नहीं और हम मात्र तीन भाई हैं लिहाजा तीनो भाई इसके शिकार हो गए समय से शादी भी नहीं हुई। हम सब आज एक तरफ से अनाथ है।

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