खेती का लेखा जोखा, बचाये धोखा

0
1859

new manish_n

मनीष अग्रहरि

जनगणना 2011 के आकड़ो के अनुसार देश की 72 फीसदी जनसंख्या गाँव मे रहती है। देश की आधी से अधिक आबादी का पेट देश के खेत खलिहानो पर ही पलता है। मगर बिडंबना है कि अभी भी या तो किसान खेती के प्रति सही से जागरूक नही हुए है जिससे घाटे की खेती झेलने को मजबूर है या किसान तेजी से खेती से मुह मोड़ ले़ रहे है।

एक अनुमान के मुताबिक पिछले एक दशक में किसानो की संख्या करीब 1 करोड़ घटी है। सरकारी खामियों को छोड़ दे तो इसके लिये बहुत हद तक किसान भी जिम्मेदार है,क्यो कि किसान भाई खेती बागवानी का सही प्रबंधन नही कर पाते है।

simon baba 2

यदि किसान भाई सही प्रबंधन अपनाना शुरू करे तो खेती बागवानी का यह नुकसान तेजी से कम हो सकता है। खेती किसानी के प्रबंधन में एैसा ही एक जरूरी चीज है लेखा जोखा। लेखा जोखा कितना महत्वपूर्ण है हम इस बात से जान सकते है कि विगत दिनो भारतीय किसान यूनियन द्वारा सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसमें पता चला था कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक हेक्टेयर गेंहॅू का उत्पादन लागत 77,830 रूपये है जब कि इस गेंहू का बाजार मूल्य मात्र 61,400 रूपये ही है।

आम तौर पर किसान भाई कृषि उत्पादन का कोई लेखा जोखा नही रखते है जिससे यह पता नही चल पाता है कि कौन सी फसल से लाभ हुआ या हानि तथा किस मद मे अधिक खर्च करने पड़ रहे हैं किन बिन्दुओ पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है, मानव श्रम को महत्व दे या यंत्रीकरण को आदि की तुलना नही हो पाती है। वही दूसरी ओर व्यवसाय करने वाला छोटा सा छोटा व्यवसाय भी करता है तो उसका लेखा जोखा रखता है एवं उसका लाभ हानि ज्ञात करता है।बदहाली की मार झेल रही किसानी में अब किसान भाइयो को खेती सिर्फ जीवन निर्वाह के लिये भाग्य के भरोसे नही बल्कि ब्यावसायिक रूप से करना चाहिये। इस लिहाज से बहुत जरूरी हो जाता है कि खेती का बेहतर तरीके से लेखा जोखा हो।यह एक ओर जहाॅं फिजूल खर्चो में नियंत्रण के साथ ही साथ आगे की योजना बनाने मे पथ प्रदर्शक का कार्य करता है। वही दूसरी ओर कीमत सम्बन्धी जोखिम एवं पैदावार की अनिश्चित्ता कम करने का भी एक कारगर उपाय है।

कैसे होगा खेती का लेखा जोखा-

खेती का लेखा जोखा बहुत ही सहज कार्य है इसके लिये आप को फसल के उत्पादन के लिये खेत की तैयारी से लेकर अनाज के भण्डारण तक में किये गये कुल खर्चो एवं फसल के कटाई मड़ाई के बाद हासिल शुद्ध आय का लेखा जोखा रखना पड़ता है। कुल खर्चे एवं कुल आमदनी निकालने के बाद नफा नुकसान भी निकाला जा सकता है। आय की रकम, व्यय (खर्चे )से जितना अधिक होगी वही शुद्ध आय होगी। वैसे आय की गणना में प्रमुखतः फसल का मुख्य उत्पाद (जैसे गेंहू, धान,मक्का आदि) का बाजार मूल्य तथा फसल का अवशेष जैसे भूसा,पुवाल,रेशा आदि का बाजार मूल्य साथ ही साथ अन्य कोई अवशेष यदि हो तो उसका कुछ बाजार मूल्य रखते है। इसी प्रकार यदि व्यय (खर्चे )आमदनी से अधिक होगा तो वह शुद्ध नुकसान होगा। इन सब के लेखा जोखा हेतु आप एक डायरी अथवा अपने सुविधा अनुसार कोई रजिस्टर वगैरह प्रयोग में ला सकते है।

 

व्यय निकालने का तरीका-

दरअसल मे कृषि कार्यो में लगा वयय (खर्चे) दो तरीके का होता है जिसमें पहला स्थायी व्यय होता है और दूसरा अस्थायी व्यय होता है।

स्थायी व्यय- स्थायी व्यय वे व्यय कहलाते है जो एक सीमा तक उत्पादन मंे कमी अथवा वृद्धि होने पर स्थिर रहते है। इसमे प्रमुखतः निम्न प्रकार के व्यय शामिल होते है।

  •          स्थायी सम्पत्ति ( ट्रैक्टर,ट्यूबवेल, अन्य कृषि यन्त्रों) मे लगी रकम पर बैंक की वर्तमान दर से ब्याज की रकमं
  •          स्थाई सम्पत्तियों पर वार्षिक क्षति व मरम्मत में खर्च की रकम
  •          खेत का लगान, कर या मालगुजारी आदि की रकम
  •          खेत में कार्य करने वाले पशुओ पर किये खर्च की रकम
  •          स्थाई मजदूरो को दी गई मजदूरी
  •          अन्य सभी सम्भावित खर्चे जो छूट गये हो   (सभी व्यय रूपये में)

manregaaaaaaaaaaaaaa

अस्थायी व्यय

अस्थायी व्यय वे होते है जो उत्पाद इकाई में कमी अथवा वृद्धि के साथ साथ घटते अथवा बढ़ते है। इसमे प्रमुखतः निम्न प्रकार के व्यय शामिल होते है।

  •          मृदा परीक्षण, खेत की तैयारी (जुताई इत्यादि) में किये गये खर्चे की रकम
  •          बीज की कीमत यदि घर का बीज हो तो बाजार का मूल्य
  •          सिचाई (डीजल इत्यादि परं किये गये खर्च की रकम)
  •          फसल की निकाई गुड़ाई पर दी गई मजदूरी की रकम
  •          खाद, उर्वरक एवं जैव उर्वरको पर किए गए खर्च की रकम
  •          कीटनाशक एवं खरपतवार नाशक दवाओं पर किये गये खर्चे की रकम
  •          फसल की कटाई एवं मड़ाई पर किये गये खर्चे की रकम
  •          फसल से सम्बन्धित अन्य सभी छूटे हुये सम्भावित खर्चे की रकम
  •          अस्थाई व्यय की कुल खर्चे की रकम पर बैंक की वर्तमान दर से ब्याज (फसल की अवधि के आधे समय की) रकम
  •          अन्य सभी सम्भावित खर्चे जो छूटे हो         (सभी व्यय रूपये में)

लेखा जोखा से होने वाले लाभ- खेती का लेखा जोखा रखने से मदवार खर्चे, लाभ एवं हानि तो ज्ञात होगा साथ ही साथ प्राप्त आकडो़ से किसान अनेक उपयोगी निर्णय लेने में सफल होगे। मोटे तौर पर इसके प्रमुख फायदे निम्न प्रकार है।

         –आय-व्ययीकरण (बजटिंग) हेतु मार्गदर्शन मिलता है। यदि खेत के व्यसायों में शुद्ध आय कम है तो नवीन योजना पुनः बनाने, नये व्यवसायों को दोबारा चुनाव करने के लिये रास्ता दिखाता है।

       – अधिकतम शुद्ध लाभ प्राप्त करने के लिए उचित विधियों एवं प्रक्रियाओं को अपनाने या छोड़ने के लिये बाध्य करता है।

–  प्रक्षेत्रीय (खेती)क्रियाओ में सम्भावित अपव्ययों को रोकने में भी मददगार है।

       –  अधिक लाभ देने वाली फसलो के चयन हेतु सुविधा

       –  प्राप्त आकड़ो से प्रति इकाई उत्पादन व्यय का पता लगा सकते है।

        – प्राप्त आकड़ो के आधार पर लागत एवं आय के पारस्परिक सम्बन्धो को मालूम कर सकते है।

–  उपलब्ध कृषि तकनीकों तथा नवीन तकनीकों से लागत की तुलना कर कम लागत वाली तकनीक को अपनाने में मदद मिलती है।

इस प्रकार लेखा जोखा रखने से कृषक अपने खेती से अधिक आय कमाने तथा उत्पादन बढ़ाने के लिए फसल चक्र,उन्नत बीज,नवीन तकनीक से सम्बन्धित बहुत से निर्णय लेने में समर्थ हो सकता है और एक कुशल प्रक्षेत्र (खेत) प्रबन्धक की भूमिका निभाते हुए व्यवसायिक खेती करने में सफल हो सकता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here