मनीष अग्रहरि
देश में एक बड़ा हिस्सा उसर भूमि का है, जिसमें खास तौर पर लवणीय और क्षारीय भूमि मुख्य रूप से पाई जाती है। एक अनुमान के मुताबिक देश में लवणीय और क्षारीय भूमि उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, महाराष्ट्र, राजस्थान समेत अन्य प्रदेशो के बड़े क्षेत्र में पायी जाती है। ऊसरीले क्षेत्रो मे खेती करना मुश्किल है या फिर सम्भव ही नही है। ऐसे में इन समस्याग्रस्त भूमियों का जल्दी से सुधार करने के लिए एक अचूक तरीका है जिप्सम और पाइराइट से भूमि का सुधार ।
ध्यान देने वाली बात यह है कि जिप्सम और पायराइट न केवल उसर भूमि को सुधारती है बल्कि नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश के बाद सबसे जरूरी द्वितीयक पोषक तत्व जैसे सल्फर ,कैल्शियम,मैग्नीशियम और कुछ सूक्ष्म पोषक तत्वो जैसे लोहा वगैरह का भी अच्छा स्त्रोत है।
क्या है उसर भूमि की पहचान: एैसी भूमि जिसमें लवणो (सोडियम, सोडियम बाईकार्बोनेट, सोडियम क्लोराइड) वगैरह की अधिकता की वजह से उपरी सतह सफेद दिखाई देने लगती है या भूमि अत्यन्त कठोर हो जाती है और फसलें नही उगाई जा सकती है उसे उसर भूमि कहते है।
उसर भूमि की मुख्य पहचान है भूमि कड़ा हो जाना, पानी नही सोखना जिससे जमीन पर कटाव होता है और नाले बन जाते हैै, जहाॅं उसर क्षेत्र होता है वहाॅं मकानो में प्लास्टर जल्दी गिरने लगते है, यह धीरे धीरे ईटो को गलाने लगता है।बारिश होने पर यह मिट्टी साबुन की तरह फिसलने लगती है।
उसर भूमि प्रमुखतः तीन प्रकार की होती है, जिनमें लवणीय,क्षारीय और लवणीय व क्षारीय होती है।
1- लवणीय भूमिः लवणीय मिट्टी का निर्माण साधारणतः 55 सेमी से कम वार्षिक वर्षा वाले शुष्क एवं अर्द शुष्क क्षेत्रो में होता है।इस मिट्टी में मृदा स्तर की उपरी सतह पर सबसे ज्यादा लवण की मात्रा रहती है तथा सूखे मौसम में मिट्टी की सतह पर उजली पपड़ी सी नजर आती है।मिट्टी का पीएच 8ण्5 से कम पाया जाता है।
2- क्षारीय भूमिः इसे सोडिक मिट्टी या काली क्षारीय, अलवणीय क्षारीय मिट्टी भी कहते है।इसका रंग काला होता है।मिट्टी का पीएच 8.5 से 10 तक होता है। मिट्टी में कड़ी परत बनी होती है जिससे ऐसी भूभि का सुधार कठिन होता है,लिहाजा इसमें जिप्सम अथवा पायराइट का प्रयोग भूमि सुधारक के रूप मे करना बेहतर रहता है।
3-लवणीय क्षारीय भूमिः यह मिट्टी ज्यादातर भूरे रंग की पाई जाती है, और शुष्क क्षेत्रो में ज्यादा देखने में आती है।इसमें उपरी सतह पर लवण पाये जाते है लेकिन नीचे की सतह पर क्षारीय भूमि की भांति कड़ी परत पायी जाती है। इसका पीएच 8.5 से कम लेकिन निक्षालन के बाद 8.5 से अधिक होता है।
क्या है जिप्सम: जिप्सम को कैल्शियम सल्फेट के नाम से जानते है,इसमें 29.2 फीसदी कैल्शियम, 18.6 फीसदी सल्फर व 20.9 फीसदी भारानुसार जल होता है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्न प्रकार है।
यह भूमि सुधारक के साथ साथ कैल्शियम और सल्फर का मुख्य स्त्रोत होने के कारण मिट्टी को कैल्शियम और सल्फर जैसे द्वितीयक पोषक तत्व प्रदान करता है। इन दिनो ज्यादातर मिट्टी में इन दोनो तत्वो की भारी कमी है। जिसके कारण पैदावार पर नकारात्मक असर पड़ रहा है।
यह जल में घुलनशील होता है।
इसका कैल्शियम आयन क्षारीय मृदा में से विनिमेय सोडियम आयन को विस्थापित करके सोडियम क्ले को कैल्शियम क्ले (खराब आयन को लाभदायक आयन) में बदल देने का माद्दा रखता है।कैल्शियम कार्बनिक पदार्थो को मृदा के क्ले कणो को बांधता है, जिससे मिट्टी के कणो में टिकाउपन आता है, लिहाजा मिट्टी मेें वायु का आवागमन आसान हो जाता है।
यह सस्ता और सुलभ है।
क्या है पायराइट: इसे रसायनिक रूप से आयरन सल्फाइड कहते है। इसमें सर्वाधिक 22-24 फीसदी सल्फर, 20-22 फीसदी आयरन, 0.5-0.6 फीसदी मैग्नीशियम, 35-40 फीसदी सिलिका होता है।इसकी प्रमुख विशेषताएॅं निम्न प्रकार है।
पायराइट में द्वितीयक पोषक तत्वों मैग्नीशियम व सल्फर के अलावा भरपूर मात्रा में आयरन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व भी पाए जाते है। मिट्टी को मिलने वाले पोषक तत्वो के आधार पर यह जिप्सम से ज्यादा बेहतर है।
यह पानी व हवा से क्रिया करके तुरन्त ही सल्फयूरिक अम्ल और आयरन सल्फेट बनाता है। सल्फयूरिक अम्ल और आयरन सल्फेट मिट्टी के क्षारीयता को तेजी से घटा देता है।
इसके द्वारा बनाया गया सल्फयूरिक अम्ल ऊॅंसरीली मिट्टी में कैल्शियम कार्बोनेट से क्रिया करके कैल्शियम सल्फेट बनता है, जो मिट्टी को कैल्शियम मिट्टी में बदल देता है।
भूमि सुधार के समय जिप्सम के मुकाबले पायराइट जल्दी लगभग 7-10 दिनो में ही मिट्टी में क्रिया पूर्ण कर लेता है।वही दूसरी ओर जिप्सम को 10-15 दिनो तक पानी मेें डूबे रहने की जरूरत पड़ती है।
कब होगा प्रयोगः उसर भूमि का सुधार वर्ष भर किया जा सकता है। मगर सबसे उपयुक्त समय गर्मियों का महीना है। गर्मी के दिनो में मिट्टी में पानी पानी सोखने की शक्ति सबसे ज्यादा होती है इससे रिसाव की क्रिया आसान हो जाती है। रिसाव होने से नुकसानदायक लवण भूमि की निचली सतह में चले जाते है जिससे उपरी सतह में लवणो की सान्द्रता कम हो जाती है।
साथ में क्या होगा प्रयोग: उसर भूमि को सुधारने के लिए संस्तुत मात्रा में जिप्सम अथवा पाइराइट की आधी मात्रा और 10 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद अथवा 10 टन प्रेसमड अथवा 10 टन फ्लाईएैश प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करे। यदि गोबर की खाद, प्रेसमड, फ्लाईएैश वगैरह उपलब्ध न हो तो जिप्सम अथवा पायराइट की संस्तुत की गई पूरी मात्रा का प्रयोग करना चाहिए।
कैसे होगा प्रयोग: जिप्सम या पायराइट का प्रयोग करने से पहले खेत में 5-6 मीटर चौड़ी क्यारियां लम्बाई में बना लेना चाहिए। उसके बाद जिप्सम अथवा पायराइट को देशी हल अथवा कल्टीवेटर से भूमि की उपरी सतह में मिलाकर और खेत को समतल करके पानी भर करके रिसाव क्रिया सम्पन्न करना चाहिए। पहले खेत में 12-15 सेंटीमीटर पानी भरकर छोड़ देना चाहिए। 7-8 दिनो बाद जो पानी बचे उस जल निकास नाली द्वारा बाहर निकालकर फिर से 12-15 सेंटीमीटर पानी भरकर रिसाव क्रिया सम्पन्न करना चाहिए। उसर सुधार के बाद 2-3 साल अनिवार्य रूप से पहली फसल धान की लेनी चाहिए।
साभार- फार्म एन फूड
