आजादी से आर्थिक आजादी की ओर …

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nirbhay singh

निर्भय सिंह

जब पहली बार सरवाही पहुचें तो पता चला यह गाँव पनिका समाज के बुनकरों का गाँव है। कुछ तो बुनाई कर रहे और कुछ तो टेलरिंग व शहरी मजदूरी व खेतीहर मजदूरी में लगे हैं। बुनाई का तो सामान खपरैल के उस कोने में रखा है, जहां एक कोने में खाना बनता है या सोने की खटिया रखी है सिर्फ तीन लोग ही ऐसे थे जो बैगाओं के लिये कपडा बुनाई का काम कर रहे थे।

               अब शुरू होती है सरवाही गाँव में बढते आर्थिक स्वावलम्बन की कहानी जो यह गाँव डिण्डौरी जिला मुख्यालय से 60 किमी. बजाग ब्लाक के सरवाही पंचायत में आता है। जब आप डिण्डौरी से अमरकंटक रोड में जायेंगे तो गाडासरई से बजाग रोड में मुडकर बजाग के 3 किमी. सीधे सरवाही जायेंगे तो एक सुन्दर सा स्कूल व शासकीय खाद्य वितरण की दुकान के पास से कच्चे रास्ते से सरवाही के कबीर चबूतरा के पास पहुच सकते हैं । गाँव में पहुचते ही पीपल के पेड से लेकर सभी घरों में अब आपको खटखटा चलाते पनिका समाज के बुनकर मिल जायेंगें।

sarwahi 4_n  पहली गाँव की मिटिंग जो मजेदार बाते सामने आई कि आप लोग कपडा बुनाई का काम क्यों बन्द कर दिये, सभी महिला पुरूषों की तरफ से एक साथ जबाव आया कि हम लोग कपडा सिर्फ बैगा समुदाय के उन आदिवासी परिवारों के लिये बनाते हैं जो आपने पारम्परिक वेशभूसा के पहनावे के लिये जाने जाते हैं। परन्तु धागा और आज की महॅगाई ने सब महॅगा कर दिया और बाजार में आज बैगापूंगी के नाम की साडी 70-80 रू. में मिल जाती है तो हमारी साडी 120-125 तक की कौन खरीदेगा । बात आगे चल ही रही थी हमारे साथ हमारे मुम्बई के यतीष भाई मेहता ने कहा कि क्या जरूरी है कि आप लोग बैगाओं तक सीमित रहकर अपने कला को समेट रहे हो । आज के सौन्दर्य समय में अपने इस कला के माध्यम से नई-नई डिजाइन तैयार कर सकते हो और पूरे गाँव को भी जोड सकते हो जबकि इस गाँव के बुनकरों की सरकार द्वारा बुनकर समिति भी बनाई गई सरकारी मदद भी काफी दी गई परन्तु बिक्री के लिये बाजार न उपलब्ध होने के कारण आगे चल नहीं सका । खटखटा व अन्य सरजांम भी उपलब्ध कराया गया था। गाँव के सब लोग तो यह काम करने के लिये तैयार थे व हैं परन्तु समस्या थी उन नोजवानों की जो इस उबाऊ पद्धति में लगने की बिल्कुल इच्छा नहीं जता रहे थे कोई सिलाई व कोई मोबाईल, रेडिया राज मिस्त्री जैसे कामों में लगने की रूचि दिखाते थे।

sarwahi_nधीरे-धीरे बात आगे बढ ही रही थी कि अचानक गाँव के लोगों ने अपनी सहमति प्रदान किये कि यदि हम सब लोग कपडा बुनाई का कार्य करते है तो क्या आप खरीद सकते हैं या हमें बाजार उपलब्ध कराने में मदद कर सकते हैं । बात सिस्टम समझौते की चलते-चलते यह तय हुआ कि जो आप कपडा बनाते है वह बनाते रहिये परन्तु उसमें कुछ सुधार क बनायेंगे तो अच्छा होगा जो मुम्बई जैसे महानगरों में भी जा सके । बात बन रही थी जो पहले से तीन लोग सुनीलदास, गंगूदास रोहन दास ने बना रहे कपडे बुनाई का काम कर रहे थे उन्होंने अपनी सहमति प्रदान किये । हम लोगों को कुछ कपडा खरीदा कुर्ता बनवाया धीरे धीरे प्रचार प्रसार हुआ इसी बीच यतीष भाई के सहयोग जैन महिला संस्था द्वारा मुम्बई के वर्डसेन्टर व दिल्ली के हस्तकार बाजार में दो एक्जविषन लगाये गये जहां पर हम मिलकर सरवाही गाॅव में बने कपडों की प्रदर्शनी लगाई काफी अच्छा प्रमाण रहा बस यहां पर जो 5000 रू. का फायदा हुआ एक दिन हम लोग यतीष भाई, शोभा तिवारी वह फायदे का 5000 रू. लेकर गाँव पहुचे यह कहते हुए कि जो आप लोगों ने कपडा दिया था उन कपडों को बेचने के बाद 5000 रू. का फायदा हुआ है तो यह पैसा गाँव के विकास के लिये लगाया जाये तो यह पैसा आप लोग अपने कमेटी में रखे और गजब की ईमानदारी बैठक के बीच में ही गंगू भाई खडे होकर बोलते हैं कि साहब हमने जो कपडा बनाया आपको बेचा उसके लागत का पैसा हम तो पहले ले लिये है यह पैसा हमारा नहीं है आपका है हम लोग नहीं लेंगे सबके सब स्तब्ध रह गये कि इतने जंगल के अन्दर बसे गाँव में आज भी कितनी ईमानदारी है चोरी बदमासी की नाममात्र की झलक नहीं है फिर भी वह पैसा गाँव में हम लोगों ने दे दिया।

बस यहीं से प्रारम्भ होती है सरवाही गाँव में कपडे के बनुाई के प्रति लोगों की लगन व विश्वाश 3 से 4 व 4 से 10, 10 से 16 व आज के पिछले माह के अनुसार 23 लोग कपडे बुनाई का काम करने लगे और एकता परिषद व एलाईव कम्पनी के माध्यम से कपडों को लेकर मुम्बई में नए-नए डिजाईन बैग, बैग सीट, जूता कव्हर, चष्मा कव्हर, योगा सीट आदि तमाम तरह के डिजाईन बनवाकर सनव मेहता के साथ पनिका प्रोजेक्ट के नाम से उस गाँव की आर्थिक हालत सुधारने के लिये गाँव वालों के साथ प्रयासरत है।

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मजेदार बात यह है कि जो धागा जबलपुर से खरीदकर पहले 3 लोग लाते थे आज 23 लोग खरीदने लगे तो दुकानदार ने पूछा ये क्या हो गया भाई सरवाही में जबकि एक सर्वे के आधार पर 15 से 20 गाँव में 100-150 बुनकर समाज के लोग यह काम करते आ रहे हैं । जो लोग पलायन करने के लिये मजबूर, मजदूरी के लिये बाध्य थे वे आज सबके सब अपने घरों में कपडा बुनाई का कार्य कर रहे हैं जैसे ही नये-नये कपडे बनाने लगे तो डिण्डौरी जिला प्रशासन द्वारा भी जो नए शासकीय भवन बनाये जा रहे हैं वहां के दरवाजा व खिडकी के पर्दा भी लगवाने का आर्डर गंगू भाई के माध्यम से मिलने लगा और जब कभी भी हस्तकार, दस्तकार, बुनकरों की प्रदर्शनी शासन के स्तर पर लगती है तो सरवाही को भोपाल, खजूराहो के लिये बुलाया जाता है।

                गाँव में 80 रू. से लेकर 200 रू. मीटर तक काटन के कपडे बनाये जाने लगे सुनने में तो लगेगा की थोडा महॅगें है परन्तु क्या करें । धागा ही महॅगा खरीद में आने लगा फिर भी 23 परिवार आज की तारीख में अपने पैरों में खडे हैं और बाकि घरों को जोडने की प्रक्रिया चल रही है गाँव में स्कूल, स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हो इस ओर भी प्रयास किया जा रहा है । देश की जीडीपी. प्रदेष का कृषि कर्मण अवार्ड तथा डिण्डौरी जिले की उत्पादक क्षमता से दूर इस गाव में गाँधी के सपनों को सकार करते हुए ये पनिका समाज अपने आप अपने पैरों में खडे हो रहे हैं । गाँधी जी कहते भी थे कि जिस दिन घर घर में चरखा चलने लगेगा मानो उस दिन देश और गाँव स्वालम्बी हो जायेगा यहां तो सभी घरों में नही चल रहा परन्तु उस ओर बढ रहे हैं।

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