भारतीय कृषि का हो रहा है महिलाकरण, मदद को तत्पर कृषि मंत्रालय: राधामोहन सिंह

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संतोष कुमार सिंह

  • विभिन्न प्रमुख योजनाओं/कार्यक्रमों और विकास संबंधी गतिविधियों के अंतर्गत महिलाओं के लिए कम से कम 30% धनराशि का आबंटन।
  • आर्थिक रुप से सक्रिय 80 प्रतिशत महिलाएं कृषि क्षेत्र में कार्यरत हैं। इनमें से 33 प्रतिशत मजदूरों के रुप में और 48 प्रतिशत स्व-नियोजित किसानों के रुप में कार्य कर रही हैं।

 

 नई दिल्ली:  केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने महिला किसानों को यह भरोसा दिलाया​ कि कृषि मंत्रालय लगातार इस दिशा में प्रयासरत है कि महिला किसानों को सरकार द्वारा चलायी जा रही योजनाओं का लाभ मिले और इसके जरिए मुख्यधारा में जुड़कर वे न सिर्फ उत्पादन बढ़ाने में सहयोग दें अपितु किसानों की आमदनी दुगुनी करने के सरकारी प्रयासों के साथ कदम ताल मिला कर चलें। कृषि मंत्री ने यह बात राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा आयोजित “महिला किसानों के अधिकारों की सुरक्षा- कार्रवाई के लिए एक रोडमैप की तैयारी” विषय पर आयोजित कार्यक्रम में कही। इस कार्यक्रम का आयोजन राष्ट्रीय महिला आयोग, यूएन महिला और महिला अधिकार किसान मंच द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था।

कृषि मंत्री ने कहा कि कृषि में महिलाओं की अहम भागीदारी है। एनएसएसओ (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय) के आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले तीन दशकों में कृषि क्षेत्र में महिलाओं एवं  पुरूषों  दोनों  की संख्या में गिरावट आई है। जहाँ पुरुषों में संख्या 81 प्रतिशत से घटकर 63 प्रतिशत हो गई है, वहीं महिलाओं की संख्या 88 प्रतिशत से घटकर 79 प्रतिशत ही हुई है, क्योंकि महिलाओं की जनसंख्या में गिरावट पुरूषों की जनसंख्या में गिरावट से काफी कम है, इसलिए इस प्रवृति को आसानी से “भारतीय कृषि का महिलाकरण” कहा जा सकता है। उन्होंने कहा कि भारत सहित अधिकतर विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था में ग्रामीण महिलाओं का सबसे अधिक योगदान है। आर्थिक रुप से सक्रिय 80 प्रतिशत महिलाएं कृषि क्षेत्र में कार्यरत हैं। इनमें से 33 प्रतिशत मजदूरों के रुप में और 48 प्रतिशत स्व-नियोजित किसानों के रुप में कार्य कर रही हैं।

क्या कहते हैं आंंकड़े

एनएसएसओ (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय) रिपोर्ट के मुताबिक भारत में लगभग 18 प्रतिशत खेतिहर परिवारों का नेतृत्व महिलाएं ही करती हैं। कृषि का कोई कार्य ऐसा नहीं है जिसमें महिलाओं की भागीदारी न हो।

उन्होंने कहा कि बतौर श्रमिक उन्हें पुरूषों की अपेक्षा मिलने वाली कम दरों तथा पुरूषों की अपेक्षा अधिक समय तक काम करने जैसी कई असमानताओं का सामना करना पड़ता है। साथ ही अपने अधिकारों, अवसरों और सुविधाओं की अनभिज्ञता उनकी कृषि में भागीदारी को और जटिल कर देती है। महिलाएं कृषि में बहुआयामी भूमिकाएं निभाती हैं जहाँ बुवाई से लेकर रोपण, निकाई, सिंचाई, उर्वरक डालना, पौध संरक्षण, कटाई, निराई, भंडारण आदि सभी प्रक्रियाओं से वो जुडी हुई हैं, वहीं घर गृहस्थी के काम जैसे कि खाना पकाना, जल संग्रहण, ईंधन लकड़ी का संग्रहण, घरेलू रख-रखाव आदि के कार्य भी उन्ही के क्षेत्र में आते हैं।

अन्य गतिविधियों में भी योगदान

उन्होंने कहा कि इसके अलावा महिलाएं कृषि से सम्बंधित अन्य धंधो जैसे, मवेशी प्रबंधन, चारे का संग्रह, दुग्ध और कृषि से जुडी सहायक  गतिविधियों जैसे मधुमक्खी पालन, मशरुम उत्पादन, सूकर पालन, बकरी पालन, मुर्गी पालन इत्यादि में भी पूरी तरह सक्रिय रहती हैं।

महिला कृषकों के लिए क्या कर रहा है मंत्रालय-

(i) विभिन्न प्रमुख योजनाओं/कार्यक्रमों और विकास संबंधी गतिविधियों के अंतर्गत महिलाओं के लिए कम से कम 30% धनराशि का आबंटन

 (ii) विभिन्न कार्यक्रमों/योजनाओं और मिशनों के घटकों का लाभ महिलाओं तक पहुचाने के लिए महिला समर्थित गतिविधियां शुरु करना

(iii) महिला स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के गठन पर ध्यान केंद्रित करना ताकि क्षमता निर्माण जैसी गतिविधियों के माध्यम से उन्हें माइक्रो क्रेडिट से जोडा जा सके और सूचनाओं तक उनकी पहुंच बढ़ सके एवं साथ ही विभिन्न स्तरों पर निर्णय लेने निकायों में उनका प्रतिनिधित्व हो।

(iv) किसान मंत्रालय द्वारा पिछले वर्ष से प्रतिवर्ष 15 अक्टूबर को महिला किसान दिवस मनाने का फैसला किया है। यह महिला सशक्तिकरण की दिशा में बढ़ते कदम का प्रतीक है।

 

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