- कानपुर में एक प्रोफेसर ने तंबाकू और दूब घास से तैयार किया कीटनाशक, वैज्ञानिक परीक्षण में भी सफल साबित हुआ पारंपरिक ज्ञान
विक्सन सिक्रोड़िया
कानपुर: फल, सब्जी और अनाज में लगने वाले कीटों को मारने के साथ फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले रासायनिक कीटनाशक की जगह अब जैविक कीटनाशक लेंगे। यहां के दयानंद गल्र्स डिग्री कालेज की जीव विज्ञान की प्रोफेसर डा. सुनीता आर्य ने दूब घास, तंबाकू,कंडे की राख और मैदा की मदद से ऐसे जैविक कीटनाशक तैयार किए हैं जो केवल हानिकारक कीटों को मारेंगे। खास बात यह है कि इस पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक परीक्षण के बाद प्रकृति भारती शिक्षण एवं शोध संस्थान में प्रमाणित किया गया है।
इस कीटनाशक के प्रयोग से फल व सब्जी की फसलों को सफेद मक्खी, नियली बग, कैटर पिलर, एफिड जैसे कीट चट नहीं कर सकेंगे और न ही इनका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। खासियत यह भी है कि लेडी ब्रिटिल, ग्राउंट ब्रिटिल, एथेमिन बग, होवर फ्लाई लार्वे, लेस्विंग लार्वे जैसे लाभदायक कीटों को कोई नुकसान नहीं होगा। ये वे कीट होते हैं जो माहू, स्केल इनसेट व एफिड जैसे फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले हानिकारक कीटों को खाकर फसलों को बचाते हैं।
प्रो. आर्य ने कानपुर देहात समेत आसपास के अन्य गांवों में टमाटर, बैगन व लौकी में प्रयोग करके यह फामरूला इजाद किया है।
कैसे बनती है यह जैविक खाद
दूब घास व तंबाकू को सुखाकर पहले उसका पाउडर बनाया जाता है। फिर उसे मिट्टी के बर्तन में पानी के साथ दो से तीन दिनों तक सड़ाया जाता है। सूखे हुए 500 ग्राम पाउडर को 25 लीटर पानी में डालकर सड़ाते हैं। यह एक ऐसी क्रिया होती है जो एक निश्चित तापमान व छांव में की जाती है। इसके बाद मिक्चर को छान लेते हैं और कीटनाशक तैयार हो जाता है। इसके अलावा गोमूत्र, कंडे की राख व मैदा को मिलाकर भी कीटनाशक बनाया गया, जिसका प्रयोग भी सफल रहा है।
चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर के एसोसिएट प्रोफेसर डा. नौशाद खान कहते हैं कि जैविक कीटनाशक से मिट्टी का स्वास्थ्य अच्छा रहता है। फल, सब्जी व अनाज की गुणवत्ता भी बेहतर होती है। जबकि रासायनिक कीटनाशक से वातावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा फसलों के दानों व फलों में इसके अवशेष चले जाते हैं जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं।
शोध पर लगी मुहर
प्रो. सुनीता आर्य ने बताया कि साल भर तक प्रयोगशाला में शोध कार्य के बाद इन जैविक कीटनाशकों का प्रयोग खेतों में किया गया। लखनऊ के मोहनलालगंज स्थित प्रकृति भारती के फार्म हाउस पर बोई गई टमाटर, बैगन, मटर व गोभी की सब्जियों पर इसका प्रयोग सफल रहा। इस शोध का एक पेपर इंटरनेशनल जनरल ऑफ इनोवेटिव साइंस इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलाजी में प्रकाशित हो चुका है।

