चंद्रशेखरजी प्रधानमंत्री क्यों बने?

अरविंद कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

23 अक्तूबर 1990 को चंद्रशेखरजी से उनके निवास पर मिला था और बातचीत की थी तोे सारे समीकरण पक्ष में होने और तमाम चर्चाओं के बाद भी प्रधानमंत्री बनने को तैयार नहीं थे। देश चुनाव के कगार पर खड़ा था। वीपी सिंह की सरकार तो मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने के फैसले के बाद ही ल़ड़खड़ा गयी थी। भाजपा के कई नेता मंडल आयोग के विरोध में आंदोलनों को हवा दे रहे थे। चंद्रशेखरजी ने तब माना कि वे चौधरी चरण सिंह नहीं बनना चाहते हैं। (मैने उस समय जो लिखा था वह साझा कर रहा हूं) और उनकी प्रधानमंत्री बनने में दिलचस्पी नहीं। ये बात वे पहले भी कहते रहे हैं।
1989 में उन्होंने कहा भी था कि 1962 से 1984 तक लगातार संसद में रहने के बावजूद मेरे मन में कभी किसी पद या ओहदे पर पहुंचने की लालसा नही जगी। मैं सत्ता के नजदीक रहते हुए भी कभी किसी के पास कुछ पाने के लिए नहीं गया। बेशक वे चाहते तो सत्ता का केंद्र बने रहते और 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से सीधा टकराव न मोल लेते।


लेकिन वे यह भी मानते थे कि राजनीति संभावनाओं का खेल है। और शायद इसी संभावना के चलते वे 10 नवम्ब र, 1990 को प्रधानमंत्री बन गए। 21 जून, 1991 तक उनका कार्यकाल काफी हलचलों भरा रहा। उनके प्रधानमंत्री बनने और बनाने की वास्तविक अंतर्कथा कुछ लोग जानते हैं लेकिन वे उस पर क्यों नहीं लिखते पता नहीं। फिर भी यह तो तय है कि उस दौरान उनकी सरकार बनाने में मुलायम सिंहजी का बड़ा योगदान था और गिरवाने में भी। हालांकि सात महीनों के प्रधानमंत्री काल में उन्होने देश को राहत तो दी ही थी। लेकिन उनको सबसे करारा झटका तब लगा था जबकि चंद्रेशेखरजी और राजीव गांधी को भरोसे में लिए बिना मुलायम सिंह ने अपने नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार को बर्खास्त कर चुनाव कराने की संस्तुति तत्कालीन राज्यपाल को दे दी। बाद में रामगोपाल यादवजी जब राज्य सभा में आए तो चंद्रशेखरजी और मुलायम सिंह के बीच लड़ाई गहरा गयी और समाजवादी पार्टी नाम से नया दल मुलायम सिंहजी ने बना लिया और चंद्रशेखरजी अपनी राह पर रहे।

मैने चंद्रशेखरजी की राजनीति को 1983-84 से काफी नजदीक से देखा। उनके समीप रहने और उनके साथ कई बार दौरों पर जाने का मौका भी मिला। कई बार बलिया और और भुवनेश्वरी आश्रम में भी गया। कई समारोहों को भी देखा। वे अपने तरीके के अनूठे राजनेता थे। उनकी संसदीय पारी लंबी रही। वे चार दशकों से अधिक तक भारत की संसद के सदस्य रहे और इस दौरान अपने भाषणों और कार्यकलापों से संसदीय गरिमा को नयी बुलंदी प्रदान की। उनको उत्कृष्ट सांसद पुरस्कार से भी नवाजा गया। उनका अध्ययन और जमीनी जुड़ाव व्यापक था इस नाते उनके शब्दों की ताकत औरों से अलग थी। संसद में चाहे कितना भी गतिरोध क्यों न रहे, चंद्रशेखरजी बोलना आरंभ करते तो सन्नाटा पसर जाता था।

(फेसबुक पोस्ट साभार)

 

 

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