
केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्री राधामोहन सिंह भले ही वायदा कारोबार को किसानों के लिए हितकर बता रहे हों लेकिन विशेषज्ञों की राय है कि पिछले दिनों अरहर की बढ़ी कीमतों और खाद्य पदार्थो की बढ़ी मंहगाई से इस वायदा कारोबार का सीधा नाता है। केंद्रीय मंत्री भले ही औद्योगिक विकास के साथ कृषि विकास की बात कर रहे हों लेकिन भारत जैसे देश में जहां कृषि में अनिश्चितता है, वहां वायदा कारोबार की वकालत किसानों खासकर छोटे किसानों को नुकसान ही पहुंचायेगी।
केन्द्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने एसोचैम द्वारा आयोजित किये जाने वाले 14वें जिंस वायदा शिखर सम्मेलन की पूर्व संध्या पर कहा कि, ‘जब तक देश के किसान समृद्ध नहीं होंगे, तब तक देश का विकास सही दिशा में अपना मार्ग प्रशस्त नहीं कर पाएगा। इसलिए, औद्योगिक विकास के साथ कृषि विकास भी आवश्यक है। कृषि जिंसों के लिए आवश्यक समझा जाने वाला विकसित वायदा बाजार किसानों के लिए अहम साबित होगा। इससे किसानों को अपने उत्पादों का उचित मूल्य पाने में मदद मिलेगी। इस प्रणाली की बदौलत किसानों के सामने आने वाली कीमतों में उतार-चढ़ाव की समस्या ज्यादा गंभीर नहीं होगी। इस सीरीज में इस तरह के किसान चूंकि वायदा बाजार में सीधे शिरकत नहीं कर सकते, इसलिए ऐसी स्थिति में भी उनके लाभान्वित होने की पूरी संभावना है, क्योंकि बाजार में समय-समय पर मूल्यों में होने वाले उतार-चढ़ाव से संबंधित अंतर कम हो जाएंगे और फसल कटाई के बाद बाजार में अक्सर लगने वाले झटकों का सामना किसानों को नहीं करना पड़ेगा।’

राधा मोहन सिंह ने कहा, ‘यह देश के आर्थिक परिदृश्य के लिए अच्छा संकेत है कि एसोचैम उत्कृष्ट तकनीकों को अपनाकर कृषि क्षेत्र में नई जान फूंकने में दिलचस्पी दिखा रहा है, ताकि कृषि क्षेत्र के उत्पादन में बेहतरी लाई जा सके। आज की कांफ्रेंस का मकसद इस खास विषय पर विचारों का आदान-प्रदान करना था कि जिंस वायदा बाजार किस तरह मूल्य संबंधी संतुलन एवं खतरों के लिहाज से माकूल हो सकता है। मौजूदा समय में भारत में 22 पंजीकृत बाजार हैं। जैसा कि आपको पता है, भारत ने तीन राष्ट्र स्तरीय मल्टी कमोडिटी एक्सचेंजों को मान्यता दी है। ये हैं – मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज ऑफ इंडिया (एमसीएक्स), नेशनल कमोडिटी एंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज लिमिटेड (एनसीडीईएक्स) और नेशनल मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज इंडिया लिमिटेड (एनएमसीई)।’
उन्होने यह भी कहा, ‘कृषि क्षेत्र से जुड़ी बड़ी समस्या यह है कि ज्यादातर भारतीय किसान छोटे एवं सीमांत हैं और वे संबंधित सौदे सही ढंग से करने में समक्ष नहीं होते हैं। वे कारोबारी सौदे कम लाभ वाले बाजारों में करते हैं और इस तरह विपणन को लेकर सीमित जागरूकता के चलते शोषण के शिकार हो जाते हैं। कृषि जिंसों के लिए आवश्यक समझा जाने वाला विकसित वायदा बाजार किसानों के लिए खास अहमियत रखता है। समूचे भारत के लिए इलेक्ट्रॉनिक ट्रेड पोर्टल नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट (एनएएम) केन्द्र सरकार द्वारा इस दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है। ’
क्या है वायदा कारोबार
वायदा कारोबार वह होता है जब भविष्य की जरूरत के लिए आप ट्रैडिंग करते हैं। मान लीजिए आप खरीद कर रहे हैं तो वह उसकी कीमत देने औऱ उससे जुड़े सौदों के लिए आप पहले से ही तय कर लेते हैं। लेकिन एस्पाइयरी की तारीख आने तक आपको उस सौदे को क्लियर करना जरूरी होता है। वायदा कारोबार कमोडिटी एक्सचेंज में होता है। देश में एमसीएक्स, एनसीडीईएक्स, एनएमसीई और आईसीईएक्स आदि एक्सचेंज आदि प्रमुख हैं। दरअसल, कमोडिटी एक्सचेंज इंटरमीडिएट का काम करते हैं जो वायदा कारोबार के लिए एक प्लेटफॉर्म देते हैं। जिनके माध्यम से कारोबार किया जाता है। यह एक पुल का काम करते हैं। यह एक्सचेंज भारत सरकार के तहत आने वाला वायदा बाजार के नियमन के लिए स्थापित वायदा बाजार आयोग के नियंत्रण में काम करते हैं।
क्या कहते हैं जानकार
बढ़ती महंगाई का वायदा कारोबार से रिश्ता
जयंतीलाल भंडारी, अर्थशास्त्री
महंगाई फिर से बढ़ती हुई दिख रही है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में भी और थोक मूल्य सूचकांक में भी। इस साल खराब मौसम के कारण खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि की संभावना भी कम है, इसलिए कीमतें बढ़ने की आशंका ज्यादा है। खासकर इसलिए भी कि सट्टेबाज ऐसे मौकों की तलाश में रहते हैं।
अरहर की कीमतों के मामले में हम यह पहले ही देख चुके हैं। इसीलिए यह मांग फिर उठने लगी है कि कृषि जिंसों के वायदा कारोबार पर रोक लगाई जाए। नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब उनकी अध्यक्षता में महंगाई पर नजर रखने के लिए गठित कार्यसमूह ने सर्वसम्मति से ऐसी रोक की सिफारिश की थी। यह उम्मीद इसलिए भी की जा रही है कि दालों की कीमतें तेजी से बढ़ने के बाद सरकार ने काफी तेजी से सटोरियों और जमाखोरों के यहां छापे मारे थे। इससे यही बात सामने आई थी कि दालों की कीमतें उत्पादन में कमी की वजह से नहीं, बल्कि सट्टेबाजी की वजह से बढ़ी थीं।
इतना ही नहीं, आयकर विभाग द्वारा की गई दस्तावेजों की जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि 30-50 रुपये प्रति किलो की दाल को कमोडिटी ट्रेडिंग के जरिए धीरे-धीरे 200 रुपये प्रति किलो के पार कर दिया गया था। सटोरिए सुनियोजित रूप से पहले दाल एक्सपोर्ट करते रहे और फिर इंपोर्ट करके भारत लाते रहे। यह पाया गया कि ब्रोकर्स और वायदा कारोबारी विदेशों में सस्ते भाव में दाल के सौदे करते थे। और फिर दाल के भाव वायदा बाजार में बढ़ाने के लिए बाजार में कृत्रिम कमी पैदा करते थे। यह भी पाया गया कि ब्रोकर और सटोरिए विदेशों से दाल लेकर आने वाले जहाजों को जान-बूझकर समुद्र में घुमाते रहते थे और उन्हें तब तक भारतीय बंदरगाह पर नहीं पहुंचने देते, जब तक कि भारतीय बाजार में दालों की कमी के चलते भाव नहीं बढ़ जाते।
यह भी पता चला है कि अरहर दाल के बाद 2016 में सट्टेबाजों की नजर शकर, चना, मूंग व अन्य कृषि जिसों के भाव पर थी। चीनी में कुछ हद तक असर दिखाई भी दिया। चीनी के भाव अगस्त 2015 में करीब 2,100 रुपये प्रति क्विंटल थे, जो सट्टे के चलते जनवरी 2016 में करीब 3,000 रुपए पहुंच गए। इस बीच यह खबर भी आई है कि वायदा कारोबार में मार्च के चीनी का सौदा करीब 3,200 रुपये प्रति क्विंटल पर खोला जा रहा है, जबकि चीनी का उत्पादन ज्यादा होने की संभावना जताई जा रही है।
कृषि जिंसों के वायदा व्यापार से खाद्यान्न की महंगाई पर विभिन्न अध्ययन रिपोर्टों में यह स्पष्ट कहा गया है कि आवश्यक खाद्य वस्तुओं, जैसे गेहूं, दलहन, खाद्य तेल और चावल में वायदा कारोबार की अनुमति नहीं होनी चाहिए। क्योंकि इनके दाम बढ़ने से आम आदमी पर सीधा असर पड़ता है, जबकि सोने-चांदी जैसी चीजों की कीमतें बढ़ने से आम आदमी पर कोई असर नहीं होता, इसलिए वहां इसकी इजाजत दी जा सकती है। (आलेख हिंदूस्तान से साभार)
