आजादी के 68 बर्ष..नहीं बदली गांव की तस्वीर

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अखिलेश अखिल, वरिष्ठ पत्रकार

इसमें कोई शक नहीं हैं कि आजादी के 68 बरस में भारत की तस्वीर नहीं बदली है। आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक और विदेशिक नीति स्तर पर भारत दुनिया के कई देशों से आगे निकल गया है तो कई विकसित देशों के समानांतर खड़ा होने के लिए प्रयासरत है। देश की दशा बदली तो लोगों की तस्वीर भी बदली। उदारीकरण और नव उदारीकरण के बाद जो ग्लोबल गांव की तस्वीर सामने रखी गई उसमें देखते ही देखते ही गरीब अमीर बनते चले गए और अमीर गरीब की सूची में आ गए। गांव भी बदल गए। बाजारवाद और उपभोक्तावाद ने गांव और ग्रामीणों को वह सब कुछ दे दिया जिसे पाकर शहरी लोग रंगरेलियां मनाते थे। गांव में बाजार पहुंचा तो राजनीति भी पहुंची। दोनों में से पहले कौन पहुंचा यह शोध का विषय बना हुआ है। आप किसी भी गांव में चले जाइए वहां लोकतंत्र आपको दिखाई पड़ेगा। हर पार्टी के झंडे बैनर और पार्टियों के कार्यकर्ता हर गांव में मिल जाऐंगे। इसके साथ ही राजनीति के हर दांव पेंच भी आप वहां देख सकते है। झूंड के झूंड लोग वोट भी देते मिलेंगे और जात, धरम पर मिटने वाले नेता कार्यकर्ता भी। लेकिन एक चीज आपको देखने को नहीं मिलेगी वह है विकास।

मामला चाहे पंचायती राज से पहले का हो या फिर बाद का, विकास अभी भी गांवों से कोसो दूर है। गांवों के विकास के लिए सरकार न जाने कितनी योजनाएं चलाती है लेकिन ये योजनाएं और इनके पैसे कहां चले जाते हैं किसी को पता नहीं। देश में 6 लाख से अधिक गांव हैं जिनमें पौने दो लाख गांवों में आज भी विजली नहीं पहुंची है। डेढ लाख से ज्यादा गांवों में सउ़के नहीं हैं। ये गांव बाहरी दुनिया से सालो भर कटे ही रहेते है। हर साल 75 हजार से ज्यादा गांव बाढ की भेंट चढते हैं और दो लाख से ज्यादा लोग हर साल विसथापन के शिकार हो जाते हैं। आंकडों पर जाएं 4 लाख से ज्यादा गांवों में स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध नहीं हैं। सरकार की योजना हर गांव में प्रशिक्षित नर्स से लेकर स्वास्थ्य की अन्य सुविधाएं मुहैया कराने की है लेकिन इतने सालों बाद भी यह संभव नहीं हो सका। गांवों में जो शिक्षा व्यवस्था है उसकी कल्पना नहीं की जा सकती। आप कह सकते हैं कि देश में भारत और इंडिया का अंतर आज भी है और इस अंतर की खाई और चैरी हो गई है।

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बेरोजगारी, गरीबी, बीमारी अब गांव की नई तस्वीर हो गई है। आप उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम के किसी गांव में चले जाइए गांवों की दशा बदली हो ऐसा नहीं कहा जा सकता। शहरी अपसंस्कृति अब वहां भी पहुंच गई है। अपभोक्तावाद ने गांव में जो उदंडता लाया है वह शहरों को भी मात दे रहा है। किसान बेबस और मजबूरी में रह रहे हैं।

सरकार चाहे जो भी दावा करले हकीकत तो यही है कि गांवों के लोग आज भी महाजनी लोन पर ही ज्यादा निर्भर है, और महाजनी लोन के जरिए ही वे जीवन यापन करने में सक्षम हैं। गांवों के लोगों को सरकारी लोन देने की जो कागजी प्रक्रिया है उससे न तो गांवों का भला हो रहा है और न ही गरीब गुरबे किसान और छोटे व्यवसायियों को। आलम ये है कि सरकार की ग्रामीण लोन नीति कागज के पन्नों तक ही सीमित रह गई है। बिहार झारखंड,उत्तरप्रदेश,मध्यप्रदेश और महाराश्ट् के ग्रामीण लोग सरकारी बैंक ऋण नीति से बेहद उदासीन हैं।

केंद्र सरकार ने गरीबों,बंचितों और ग्रामीण इलाकों में छोटे मोटे व्यवसाय करके अपना गुजारा करने वाले लोगों को कर्ज देने के लिए कई तरह की योजनाएं चला रखी है। आपको बता दें कि ये योजनाएं सालों से चल रही हैं और इस बार फिर आम बजट पेश करते हुए वित्तमंत्री ने गांव में रहनेवाले लोगों को कर्ज सुविधा मुहैया कराने की बात कह रही है ताकि गांव के लोग सस्ते कर्ज के जरिए स्वरोजगार कर सके। इसके लिए वित्तमंत्री ने   60 हजार उन गांवो में सरकारी बैंकिंग शाखा खोलने की बात कही जा है जहां की आवादी 2000 से ज्यादा की है। लेकिन इन गांवों में बैंकिंग सुविधा कैसे पहुंचे सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है। संभव है कि सरकार इस चुनौती को साकार भी कर ले, लेकिन सबसे बड़ी बात तो यह है कि बैंकों से जो कर्ज लेने की कागजी प्रक्रिया है वह देश की गरीब जनता को रास नहीं आती। आलम ये है कि गांवों के लोग बैंकों से कर्ज लेने के बजाए स्वंसहायता समूहों और महाजनों से लोन लेना ज्यादा आसान समझते हैं। और हकीकत भी यही है।

जरा इस रिपोर्ट को गौर से देखिए। ये रिपोर्ट है सरकारी बैंकों से गा्रमीणों को मिलने वाली कर्ज सहायता के बारे में। बैंको राष्ट्ीयकरण के दो दशक तक छोटी राशि के कर्ज खातों में बढोतरी हुई। 1972 से लेकर जून 1983 तक ग्रामीण क्षेत्रों में 2 करोड़ से ज्यादा बैंक खाते खुले। इनमें 93 फीसदी खाते ऐसे थे जिनमें 10 हजार या उससे कम लोन लिए गए थे। इसके बाद मार्च 1992 तक 3 करोड़ 81 लाख खाते अलग से खोले गए जिनमें 3 करोड़ 60 लाख नए कर्जदार थे। और इनकी कर्ज सीमा 25 हजार या उससे कम थी। 90 के दषक के बाद बैंक का ब्यवहार बदल गया और उसका घ्यान छोटी कर्ज सहायता से हटने लगा। मार्च 92 से मार्च 2001 के बीच छोटे कर्ज के खातों में एक करोड़ 35 लाख की कमी आई। इनमें 25 हजार और इससे कम राशि के खाता धारकों में भारी कमी दर्ज की गई। यही वह समय है जब से अधिक राशि लेने वाले खातों की वृद्धि हो गई। मार्च 92 से लेकर मार्च 2008 के दौरान कुल मिलाकर छोटा कर्जलेने वाले बैंक खातों की संख्या में 2 करोड़ 24 लाख तक की कमी दर्ज हुई।

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सरकार की ग्रामीण लोन व्यवस्था से संबंधित उपरोक्त रिपोर्ट से साफ जाहिर होता है कि न तो सरकार की मनसा गरीबों को कर्ज सुविधा उपलब्ध कराने की है और न ही गरीब जनता सरकार की इस ब्यवस्था से लाभ उठा पाने में सक्षम है। दरअसल सरकारी कर्ज लेने की एक जटिल प्रक्रिया है और ऐसी प्रक्रिया से तंग आकर लोग सीधे महाजनों से या स्वयंसेवी संस्थाओं से लोन लेना ज्यादा आसान मानते हैं। सरकार के पास इस बात की जानकारी भी है कि गांवों में बैंकिंग लोन का लाभ जनता को नहीं मिल पाता फिर भी सरकार गांवों में रोजगार देने के नाम पर हर साल इस तरह की घोषणा करती रहती है।   यही वजह है कि देश के कई राज्यों में सरकारी घोषणाओं में गरीब लोगों को रोजगार करने के लिए लोन देने की बात तो की जाती है ,लेकिन उन घोषणाओं का सतह पर अमल नहीं हो पाता । सरकारी लोन की एक और कमजोरी है। कर्जदाता बैंक की तरफ से कर्ज वापसी के लिए कर्जदारों को एक समान राशि बांध दी जाती है जिससे मूल राशि में कमी का पता ही नहीं चलता।

सरकार कहती है कि बीते सालों में गांव की तस्वीर बदली है। लोगों के हालात बदले हैं लेकिन हकीकत कुछ और ही है। हम आपको लेकर चलेते हैं झारखंड, बोकारो के सटे जंगलों में और मिलवाते ऐसे लोगों से जिनकी अपनी अलग ही दुनिया हैं। आजाद भारत के नागरिक होने के बावजूद, भारत से इनका नाता नहीं है। कौन है ये लोग, क्या है इनकी पहचान, आइए जानते है इनके बारे में।

कच्चे मकान, धूल भरे रास्ते,,, कच्ची पगडंडियां,,,, चूल्हा से उड़ते धुएं के गुबार, ये तस्वीरें याद दिलाती है उस दौर की, जब भारत को आज़ादी मिली थी। तब कृषि पर आधारित देश की अर्थव्यवस्था थी और गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, बेरोज़ंगारी जैसी समस्याएं देश के सामने खड़ी थी। कुछ वैसी ही तसवीर है बोकारों के जंगलों में रहे इस गुलगुलिया समाज की। आजादी के 65 साल बाद देश के हालात बदले लेकिन नहीं बदला यह समाज और नहीं बदली इनकी दुर्दशा। इसमें सच्चाई है कि पहले से हम सुविधा संपन्न हो गए है और सरकार ये भी कहती है कि देश में अब न कोई भूखा है न कोई नंगा। सबके पास काम है और सबके दमरी में नोट। सरकार रोटी,कपडा और मकान सबको देने का वादा करती है और वादा पूरा हो जाने का ऐलान भी करती फिर रही है। बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर नारे के साथ हम दुनिया के पांच तेजी से बढ रहे विकासशील देशों में शामिल हैं । लेकिन बोकारो के स्वांग कोलियरी से सटे जंगलों में बसी बस्तियां कम से कम सुविधा संपन्न भारत की ओर इशारा नहीं करती। यह न सिर्फ विकास की पोल खेलती है वल्कि निर्लज सरकारी ब्यवस्था के लूटतंत्र का भी बयान करती है।   गुलगुलिया समाज की तसवीर उभरते भारत के दामन पर दाग है। गरीबी, बेरोज़़गारी, सुविधाओं से तंग यह समाज अपनी बदहाली पर आंसू बहाने को मजबूर है। 92 परिवारों की बस्ती, बच्चें-बूढ़े औरत-मर्द, सभी इस आबादी का हिस्सा है। लेकिन ये विकास का हिस्सा नहीं बन पाए। गुलगुलिया समुदाय की मुफलिसी की ये कहानी अस्सी साल पुरानी है। अस्सी साल पुराना है इन लोगों का इस जगह से नाता। गांव- शहर की घनी आबादी से दूर, बियाबान में इन लोगों ने अपना आशियाना बनाया हुआ है। इनकी माने तो ये यही पैदा, हुए यही बड़े हुए, बचपन से बुढ़ापा आ गया, लेकिन इनके हालात नहीं बदले। बिहार से अलग राज्य बना झारखंड, राज्य का नाम बदला, दस सालों में झारखंड में कई सरकारें भी बदली, नहीं बदले तो गुलगुलिया समुदाय के हालात।

गुलगुलिया समुदाय के लोगों के पास पहुंचना आसान नहीं है। इन लोगों तक पहुंचने के लिए सड़क नहीं है, पक्के रास्ते नहीं है, बल्कि धूल भरी पगडंडियों के जरिए ही इन तक पहुंचा जा सकता है। जाहिर है, कच्ची पगडंडियों से होकर कोई भला कैसे इन गरीबो ंकी दुनिया में पहुंचेगा। दुनिया इस समुदाय का ख्याल नही रखती तो भला इन्हें दुनिया को जानने की क्या जरूरत है? ये देश के राष्टपति और प्रधानमंत्री को नहीं जानते। सरकार बाबूओं को आज तक देखा नहीं।

गुलगुलिया समुदाय के लोग आसपास की दुनिया से उतने ही अंजान है, जितने अंजान है बाकी लोग इनकी दुनिया से। बाहर की दुनिया कैसी है, ये लोग नहीं जानते। सुविधाऐं किसे कहते है, इन्हें नहीं मालूम। सरकार कागज के नाम पर इनके पहचान पत्र बने हुए। इन 92 परिवारों के बालिग सदस्यों के नाम वोटर लिस्ट में दर्ज है, इनकी माने तो ये लोग वोट भी डालते है, लेकिन इनके वोट भी इनके लिए सुविधाएं नहीं जुटा पा रहे है। मतदाता की सूची मे ंनाम होने के बावजदू बुनियादी सुविधा लेने वालों की सूची में इनका नाम नहीं है। केन्द्र सरकार का फ्लैगशिप कार्यक्रम या फिर राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाएं, इन्हें किसी का भी फायदा नही मिल पा रहा है। इनके नाम से जो सुविधाएं मुहैया करायी जाती है,वह अब तक कहां गई इसकी पडताल करने की जरूरत होगी।

प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के बावजूद सड़के इनकी बस्ती तक नहीं पहुंच पाई है। इंदिरा आवास योजना के तहत इन्हें पक्के घर नहीं मिल सके है। राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी योजना इन्हें सौ दिन के रोज़गार की गारंटी नहीं दे पा रही है। ऐसे में सवाल उठता हैं कि ये लोग अपनी रोज़ी रोटी का जुगाड़ कैसे करते है। गुलगुलिया समुदाय के ज्यादातर लोगों का पेशा भीख मांगना है। दूसरों के सामने हाथ फैलाकर ही ये लोग, अपना और अपने बच्चों का पेट भर पाते है। इसके अलावा, यहां के लोग चाकू-छुरी में धार लगाकर, और खिलौने बेचकर अपने लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम कर पाते है। ऐसे में सवाल उठता है क्या है इनके बच्चों का भविष्य,,? कैसा होगा इनके बच्चों का आने वाला कल? पीढ़ी दर पीढ़ी, क्या ये बच्चें भी दूसरों के सामने हाथ फैलाएंगे ?-

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नौनिहाल, देश का भविष्य, देश का आने वाला कल, ना जाने ऐसे कितने जुमले इनके बच्चों के लिए इस्तेमाल किए जा सकते है, लेकिन देश के इस कल का, ज़रा आज तो देखिए,,,। जिन हाथों में कलम और किताबें होनी चाहिए, उनमें झाड़ू नज़र आ रही है। जिनके कांधों पर स्कूली बस्ते होने चाहिए, वो खुद से छोटे अपने भाई बहनों की जिम्मेदारी संभाले हुए है। जाहिर है, जिस तबके को दो वक्त की रोटी के लिए भी जद्दोजहद करनी पड़ती हो, उनके बच्चों के लिए शिक्षा की बात करना बेमानी ही होगा। हैरानी की बात हैं कि केन्द्र सरकार का सर्वशिक्षा अभियान इस इलाके से कोसों दूर है। 6 से 14 साल तक के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का दावा करने वाली केन्द्र सरकार गुलगुलिया समुदाय के बच्चों को शिक्षा मुहैया नहीं करा पा रही है। हालांकि गुलगुलिया समुदाय के बच्चों के लिए उम्मीद की किरण जरूर नज़र आ रही है। इन बच्चों को किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़े, इसके लिए एक एनजीओ ने इन्हें पढ़ाने का बीड़ा उठाया है। ऐसे में सवाल उठता हैं कि ऐसी ही ठोस पहल केन्द्र या राज्य सरकार ने क्यों नही की,,? सर्वशिक्षा अभियान और सभी के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का दावा करने वाली सरकार, इन बच्चों को स्कूल तक ले जाने में नाकाम है। और ये बच्चें सरकार के ऐसे सभी अभियानों को मुंह चिढ़ाते नज़र आ रहे है। बेहद गरीबी में गुजारा कर रहे इस समुदाय के 92 परिवारों के लगभग 150 लोग सरकारी दावों की पोल खोलते हुए विकास के सबसे आखिरी पायदान पर खड़े हैं। खिलौने बेचना, चाकू और कैंचियों की धार तेज करना और भीख मांगना इन लोगों का शगल नहीं,मुख्य पेशा है।

हैरानी की बात यह है कि इस समुदाय के लोगों के पास फोटो पहचान पत्र तो है और ये वोट भी डालते हैं लेकिन अब तक इन्हें कोई सरकारी सुविधा नहीं मिल सकी है। गंदा पानी पीने और बीमारियों के बीच रहने को मजबूर इस समुदाय के लोग शिक्षा से कोसों दूर हैं। प्रखंड कार्यालय से महज तीन किलोमीटर, जबकि जिला मुख्यालय से आठ किलोमीटर की दूरी पर है रह रहे इस समुदाय के लोगों के बीच नेताओं और पार्टियों के झंडे बैनर तो आपको मिल जाऐंगे लेकिन सही मायने में यहां लोकतंत्र नहीं पहुच सका हैं सरकार हर बार और बार-बार इनके विकास की बात करती है लेकिन विकास की राशि कहां चली जाती है किसी को पता नहीं। ऐसे लोगों के लिए चल रही करोड़ो की योजनाओं का फायदा उन्हें नहीं मिल पा रहा है। सरकारी उदासीनता की वजह से इन लोगों के पास न तो लाल कार्ड या पीला कार्ड है और न ही समुदाय के बुजुर्गों को किसी तरह की पेंशन सुविधा मिल पाई है। आजाद भारत के 68 साल बाद भी गुलगुलिया समुदाय जिस हालात में जीने को अभिशप्त है इसे लोकतंत्र के लिए कलंक ही कहा जा सकता है।

यह झारखंड के एक गांव की तस्वीर है। इसी तरह आप इसी राज्य के अन्य गांवों के साथ ही अन्य राज्यों के गांवों की समस्या को जान सकते हैं। गांव बदले तो देश बदले अगर ऐसा हो जाता है तो वाकई भारत और इंडिया का अंतर समाप्त हो जाएगा।

 

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