संतरे की खेती करने वाले किसानों पर बड़ा संकट, रोग से उजड़ रहे हैं बाग

0
346

वर्षा वर्मा

मुंबई: उत्पादन की बढ़ती लागत और निर्यात में मंदी की दोहरी मार झेल रहे विदर्भ के संतरा किसान अब एक और संकट से घिर गए हैं। बगीचों में डिंक्या नामक रोग फैलने के कारण महाराष्ट्र की किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। विदर्भ के संतरा किसानों के लिए डिंक्या रोग एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

यह संकट कितना बड़ा है, इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि पिछले बीस वर्षों में इस बीमारी के कारण विदर्भ में लाखों संतरे के पेड़ों को नष्ट करना पड़ा है। इस कारण संतरा उत्पादकों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। साफ दिख रहा है कि, यह संकट कम होने की बजाय तेजी से फैल रहा है, जिससे संतरा किसानों की चिंता बढ़ती जा रही है। देखा गया है कि हाल ही के दिनों तक संतरे के बगीचों में डिंक्या रोग का खतरा और अधिक बढ़ गया है।

डिंक्या खतरनाक रोग है, जो संतरे की पूरी फसल को चौपट कर सकता है। नए बगीचों में भी धीरे—धीरे फेलना शुरू हो गया है जिसे किसानों को समझ नहीं रहा है कि वे क्या करें इसके अलावा, इस वर्ष विदर्भ के कुछ क्षेत्रों के संतरा बगीचों में काली और सफेद मक्खी का प्रकोप भी देखने को मिला है।

यदि समय रहते प्रबंधन नहीं किया गया तो नुकसान की भरपाई करना मुश्किल हो जाएगा। लेकिन, समस्या यहीं खत्म नहीं होती है, क्योंकि किसान इससे निपटने के लिए करें भी तो क्या वजह है कि इस दौरान खाद, कीटनाशक और खेती के लिए जरूरी सामग्री की कीमत में भी तेजी से बढ़ोतरी हुई है। वहीं, परिवहन लागत भी बढ़ गई है। नतीजा, संतरे के उत्पादन की लागत तो बढ़ गई, लेकिन कीमत अपेक्षाकृत कम ही रही।

​खेती पर पड़ा बुरा असर

अपने स्वाद और आकर्षक आकार के कारण नागपुर का संतरा देश भर में पहचान रखता है। यहां के संतरों का छिलका बहुत ढीला होता है और इसे आसानी से छीला जा सकता है। देश में उपलब्ध संतरे की किस्मों में मंदारिन संतरा सबसे अधिक लोकप्रिय है, जिसकी खेती नागपुर और इसके आसपास के इलाकों में बड़े पैमाने पर की जाती है। पूरे महाराष्ट्र में लगभग दो लाख हेक्टेयर क्षेत्र में संतरे की खेती की जाती है।

इनमें से एक लाख 80 हजार हेक्टेयर बाग अकेले विदर्भ में हैं। इसमें भी अमरावती और नागपुर जिलों में संतरे के बगीचों का क्षेत्रफल सबसे अधिक है। सर्वाधिक 90 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल अकेले अमरावती जिले में है। अब संतरे के बगीचों पर बीमारियों और कीड़ों का संकट मंडराने से संतरे की पूरी खेती पर बुरा असर पड़ा है। इसे नियंत्रित करने के लिए संतरा किसानों को वैज्ञानिक मार्गदर्शन की आवश्यकता है।

रोग से संक्रमित हुए संतरे

विदर्भ में लोगों के पास खेती का विकल्प नहीं है और यह भी एक वजह है कि विदर्भ में संतरे की खेती का क्षेत्र बढ़ रहा है। लेकिन, पिछले काफी समय से जो परिस्थितियां रही हैं वे संतरे के प्रतिकूल ही रही हैं। वहीं, काली और सफेद मक्खियों में संतरे के बगीचों में बढ़ते अटैक ने संतरे की खेती को गंभीर खतरे में डाल दिया है।

हालांकि, कीट विज्ञानियों ने इस पर नियंत्रण के लिए छिड़काव और कीट प्रबंधन की सलाह दी है, मगर वैज्ञानिक जानकारी अभी तक किसानों तक नहीं पहुंच पाई है। दूसरी तरफ, डिंक्या नामक रोग के कारण संतरे के पेड़ की छाल और तनों में गोंद जमा हो जाता है।

इसके चलते संतरे के पेड़ की छाल फट जाती है और उसमें से गोंद निकलने लगता है। ऐसा होने पर संतरे के फल भी इस रोग से संक्रमित होते हैं। इससे फल पर तैलीय नारंगी रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। संतरा किसानों को समय रहते इस प्रकोप से निपटना चाहिए, मगर जागरूकता और धन की कमी के कारण वे इस दिशा में बहुत अधिक प्रयास नहीं कर पा रहे हैं।

किसानों की चिंता का कारण

देखा जाए तो घरेलू बाजार में विदर्भ के संतरे की मांग पिछले कुछ वर्षों से स्थिर रही है। लेकिन, निर्यात में मंदी के कारण संतरे की कीमतों में गिरावट आई है। बांग्लादेश संतरे का सबसे बड़ा आयातक देश है। लेकिन, 2019 में बांग्लादेश ने भारत सरकार की आयात-निर्यात नीति की अवहेलना करते हुए संतरे पर 20 रुपए प्रति किलोग्राम का आयात शुल्क लगा दिया था।

फिर, 2023 में यह आयात शुल्क 88 रुपए कर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि विदर्भ से संतरे का निर्यात करीब 65 से 70 फीसदी तक कम हो गया। इसका सबसे अधिक असर यहां के उन किसानों पर पड़ा जो बड़े पैमाने पर संतरे बांग्लादेश को निर्यात करते थे। यहां 35 प्रतिशत संतरा उत्पादक किसान अपने संतरों का निर्यात बांग्लादेश में करते थे। लेकिन, नीति में आए बदलाव के कारण यहां के किसानों को संतरे घरेलू बाजार में बेचने पड़े।

फसल बीमा योजना से किसान हुए परेशान

विदर्भ के अधिकतर संतरा उत्पादक किसानों की मांग है कि केंद्र सरकार संतरे की खरीद करे और किसानों की समस्या का स्थायी समाधान निकाले। संतरा उत्पादक किसान चाहते हैं कि केंद्र सरकार संतरे की कीमत तय करे और सही बाजार उपलब्ध कराए। वह हर साल संतरे खरीदे और संतरे को ‘मिड डे मील’ में शामिल करे। वहीं, कहने के लिए संतरा उत्पादक किसानों के लिए फसल बीमा योजना है, मगर उचित रिटर्न नहीं मिलने से किसानों में निराशा है।

दूसरी फसलों की तुलना में संतरे का बीमा प्रीमियम अधिक है, जबकि संतरा उत्पादक किसानों की मांग है कि उन्हें कम लागत पर बीमा सुरक्षा दी जाए। संतरा उत्पादक किसान चाहते हैं कि महाराष्ट्र की राज्य सरकार संतरे की खेती पर भी अंगूर की तरह ही ध्यान दे। दरअसल, अंगूर उत्पादक संतरा उत्पादकों के मुकाबले एक बहुत मजबूत लॉबी है। शराब राज्य के लिए पैसे कमाने का एक जरिया है, जबकि संतरे के उप-उत्पाद नहीं हैं।

हालांकि, कुछ व्यवसायिकों द्वारा संतरे के विभिन्न उप-उत्पादों के उत्पादन करने के प्रयास किए गए हैं, लेकिन ये प्रयास काफी हद तक असफल रहे हैं। इसलिए संतरा उत्पादक किसानों का मानना है कि उन्हें संतरे की खेती में बने रहने के लिए राज्य से समर्थन की आवश्यकता है। और सरकार संतरे की फसलों पर भी ध्यान दें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here