राजनीति, राजनेता , राजनीतिक विमर्श छोड़.. शौचालय समस्या पर एकजुट हुए नामचीन संपादक

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संतोष कुमार सिंह

नयी दिल्ली:आमतौर पर राजनीति और राजनीतिक खबरों के आगे पीछे भागमभाग करने वाले खबरनवीश और नामचीन संपादक जब शौचालय की समस्या और खुले में शौच को लेकर माथापच्ची करते दिखें, समस्या की गहनता, इससे प्रभावित होने वाला समाज, होने वाली बीमारियों, व्यवहार में होने वाले बदलाव, महिलाओं की सुरक्षा, सरकार की योजनाओं,योजनाओं की व्यवहारिकता, सुधार की संभावनाओं, धन की कमी, मंदिरों में जमा धन और इस धन से शौचालय अभियान को मिल सकने वाली सहूलियतो पर व्यापक विमर्श करते दिखें तो ऐसा लगता है कि देश का शौचालय के विषय में सोच बदल रहा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्वच्छता अभियान को जमीनी स्तर पर बदलाव लाने से कोई नहीं रोक सकता। कुछ ऐसा ही नजारा था राजधानी के पंच सितारा होटल में यूनिसेफ द्वारा आयोजित संपादको की बैठक का।

jiwa cover_nवैसे आमतौर पर और देश के दूर दराज के ग्रामीण ईलाकों में जमीन पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता ऐसे पंच सितारा विमर्शों को खाये, पिये, अघाये लोगों का विमर्श क​हते हैं, जिसका जमीन पर कोई असर नहीं होता। लेकिन यूनिसेफ के सौजन्य से और जीवा अर्थात ग्लोबल इन्टरफेथ वाश अलायन्स के बैनर तले देश के अलग—अलग धार्मिक समुदाय के गुरूओं के साथ ​इस तरह से सघन विमर्श करते हुए दिखे मानो खबरनवीश और नामचीन संपादक शौचालय की समस्या और खुले में शौच की कुप्रथा के हर पहलू पर खुल के अपनी बात रखना चाहते हों। वे ऐसा करते हुए दिखे भी।

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मूल रूप से राजनीतिक पत्रकार और विश्लेषक के रूप में देश व्यापी पहचान समेटे नीरिजा चौधरी ने कहा कि ये अपने आप में क्रांतिकारी विचार है कि विभिन्न धार्मिक गुरू एक मंच पर सिर्फ इसलिए इकट्ठा हुए है कि शौचालय की समस्या को हल करना है। उनका सुझाव था कि इसको लेकर अलग—अलग जगह पर पायलट प्रोजेक्ट चलाया जाये। जिसमें तकनीकि का इस्तेमाल हो। सतत रूप से चले। नीरिजा ने कहा कि शौचालय की समस्या है यह सर्व विदित है,कैसे इसे हल करना है और मिल जुलकर हल करना है इसपर सोचा जाना चाहिए।

बीबीसी हिन्दी के संपादक निधिश त्यागी,ने कहा कि आखिर एक ही जाती के लोग कैसे शौचालय की साफ सफाई में लगते हैं, और इससे जुड़ा जो व्यापक विमर्श हैं जो जरूरी सवाल हैं,उनकी चर्चा की जानी भी जरूरी है। हम शौचालय की साफ सफाई का काम किसी एक जाती विशेष के जिम्मे छोड़ शौचालय अभियान को सफल नहीं बना सकते।

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आउट लुक के संपादक आलोक मेहता और एनडीटीवी के ​वरिष्ट पत्रकार अभिज्ञान प्रकाश ने मंदिरों या अन्य धार्मिक संस्थाओं में जमा धन को लेकर सवाल किया और कहा कि इस धन को यदि शौचालय निर्माण के काम में लगाया जाए तो बड़ी संख्या में शौचालय बनवाये जा सकते हैं। अभिज्ञान प्रकाश ने क​हा कि सबसे ज्यादा गंदगी धार्मिक नगरी में ही होती है, आस्था से जुड़े धार्मिक नेताओं को शुरूआत वहीं से करनी चाहिए। द स्टेट्समैन की फीचर एडिटर आशा रामचंद्रण ने ​कहा कि ​किस तरह का शौचालय बनाया जाना चाहिए इसके लिए अलग—अलग जगह के भौगोलिक जरूरतों, स्थानिय प्रचलनों को ध्यान में रखकर निर्णय लिया जाना जरूरी होगा।

द स्टेट्समैन की फीचर एडिटर आशा रामचंद्रण ने ​कहा कि ​किस तरह का शौचालय बनाया जाना चाहिए इसके लिए अलग—अलग जगह के भौगोलिक जरूरतों, स्थानिय प्रचलनों को ध्यान में रखकर निर्णय लिया जाना जरूरी होगा। वहीं हिंदूस्तान टाईम्स की पत्रकार ललिता पाणिक्कर ने कहा कि सांसदो एवं विधायकों को संसद और विधानमंडल निधि से क्षेत्र विकास के नाम पर बड़े—बड़े फंड मिलते हैं। उन्हें शौचालय के साफ सफाई से जुड़े ​कर्मियों के वेतन भत्तों को बेहतर करने की दिशा में प्रयास करना चाहिए इससे कार्य आसान होगा और साफ सफाई को बढ़ावा मिलेगा।

new_nवरिष्ट पत्रकार राखी बख्शी ने कहा कि जब हम स्वच्छता और शौचालय जैसे सामाजिक विषयों पर चर्चा करते हैं तो हमें संवेदन शील मसलों मसलन धार्मिक भावनायें,लोगों की धारणा पर भी गौर करना होगा क्योंकि ये सारे मसले जाती, वर्ग और समाज को गहराई से प्रभावित करते हैं। खुले में शौच की समस्या और इसकी वजह से महिलाओं को हो रही परेशानियों पर चर्चा के लिए हमारे धर्म, कॉरपोरेट और मीडिया से जुड़े लोग एक मंच पर आते हैं तो यह बड़ी बात है, और इससे आगे का रास्ता निकलेगा।

दैनिक जागरण से जुड़े संजय मिश्रा ने अपने गंवई पृष्टभूमि और गांव की समस्याओं पर चर्चा करते हुए कहा कि एक तरफ गांव में साफ सफाई के कारण और शौचालय की अनुपलब्धता के कारण नीचले तबकों की जीवन प्रत्याशा कम हुई है, वहीं सामान्य या आर्थिक रूप से संपन्न लोगों की जीने की आयु बढ़ोतरी देखी गई है। वरिष्ट पत्रकार मधुरेंद्र सिन्हा ने भी सामाजिक स्तर पर हो रहे भेदभाव और आर्थिक असमानता के मसले को शौचालय की अनुपलब्धता से जोड़ते हुए अपनी बात रखी। दैनिक भाष्कर से जुड़े दीपक द्विवेदी ने कहा कि धर्मगुरूओं को शौचालय अभियान को गांवों की तरफ ले जाना चाहिए और जो भी अभियान चले उसकी पर्याप्त मोनिटरिंग हो तभी इस तरह के विमर्श का फायदा जमीन पर दिखाई देगा। परिचर्चा का संचालन वरिष्ट पत्रकार पंकज पचौरी ने किया। जबकि बड़ी संख्या में विभिन्न मीडिया माध्यमों से जुड़े संपादकों ने भी इस विषय पर अपनी राय रखी।

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डटे रहे धर्म गुरू

आमतौर पर संपादको और खबर नवीशों की बातों पर बगले झांकने वाले धर्मगुरूओं ने शौचालय के मसले पर आयोजित इस गोलमेज सम्मेलन में  न तो उनकी बातों से परेशान होते दिखे और न हीं हैरान। मानो ये सोच के आये हों कि बात निकलेगी तभी दूर तक जाएगी,और खुले में शौच की कुप्रथा पर आम जन का ध्यान जाएगा। परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष और जीवा के सह संस्थापक चिदानंद सरस्वती ने अन्य धर्मगुरूओं के साथ संपादकों के सवालों का खुल कर जवाब दिया। उन्होने कहा कि देश में प्रत्येक 30 सेकेंड में एक शौचालय बनाये जाते हैं। इससे साफ है शौचालय पर लोगों का ध्यान है। लेकिन इसके साफ—सफाई, रख रखाव, ग्रामीण भारत की जरूरतों और भविष्य की रणनीति पर काम करने में इस विमर्श से काफी मदद मिलेगा। इस लिहाज से सभी धर्म के धर्मगुरू एक मंच पर आये हैं और वे अपने अपने समाज में शौचालय की समस्या और खुले में शौच की कुप्रथा पर लोगों को जागरूक करेंगे।

यूनिसेफ की तरफ से यूनिसेफ इंडिया की एडवोकेसी एंड कम्यूनिकेशन प्रमुख कैरोलिन डेन डल्क, वास की प्रमुख सु कोट्स, कम्युनिकेशन स्पेशलिस्ट मनीषा मिश्रा और कम्युनिकेशन आफिसर सोनिया सरकार ने आंकड़ो के जरिए शौचालय की समस्या को रेखांकित किया और यूनिसेफ द्वारा इस समस्या के निदान की दिशा में किये जा रहे योगदान पर अपनी बात रखी। इस गोलमेज सम्मेलन की सबसे बड़ी बात यह थी कि कॉरपोरेट से जुड़े लोगों मसलन गायत्री सुब्रमण्यम (आईआईसीए), राजेश कुमार सहिजवानी (इफको टोकियो), प्रत्यूश पांडा (प्रमुख-सीएसआर, एसीसी लिमिटेड), सुदीप सिन्हा (वरिष्ठ उपाध्यक्ष- एनवायरनमेन्ट प्रोजेक्ट्स, स्टोन इण्डिया लिमिटेड)

ने भी चर्चा में न सिर्फ शिरकत की बल्कि उनके संगठन द्वारा जमीनि स्तर पर किये जा रहे प्रयोग, नवीनतम प्र​वीधि और आगे की रूपरेखा सामने रखा।

अगला जीवा सम्मेलन लद्दाख में

जीवा से जुड़े धार्मिक संगठनों ने अगला सम्मेलन 29-30 अगस्त को लद्दाख में आयोजित करने का निर्णय लिया है। लद्दाख सम्मेलन का आयोजन महाबोधी इन्टरनेशनल मेडिटेशन सेन्टर में किया जाएगा, जिसमें विशेष रूप से लद्दाख क्षेत्र में इस पूरे क्षेत्र में शौचालय की समस्या, व्याप्त असमानता, अनुपलब्धता, व इस क्षेत्र से सम्बन्धित अन्य मुद्दों पर विशेष रूप से अल्पसंख्यक आबादी पर चर्चा की जाएगी। यदि लद्दाख के भौगोलिक स्थिति और स्वच्छता की व्यवस्था पर चर्चा करें तो यह क्षेत्र कठोर एवं सुदूर इलाका होने के साथ, लेह-लद्ददाख को भारत सरकार के द्वारा उन ज़िलों में से माना गया है जहाँ अल्पसंख्यक आबादी सबसे ज़्यादा है, इस दृष्टि से क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक आंकड़े राष्ट्रीय औसत से नीचे हैं। सेनिटेशन, पेयजल की आपूर्ति से सम्बन्धित राष्ट्रीय कार्यक्रमों की दृष्टि से भी इसकी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है।

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