आज नयी दिल्ली में गोलमेज सम्मेलन। यूनिसेफ की मदद से जीवा से जुड़े धार्मिक संगठनों ने अगला सम्मेलन 29-30 अगस्त को लद्दाख में आयोजित करने का निर्णय लिया है।
संतोष कुमार सिंह
नई दिल्ली–मोबाईल जरूरी या शौचालय..सोच से शौचालय की बहस अब काफी पुरानी हो चुकी है। देश में शौचालय निर्माण का काम काफी तेजी से चल रहा है। इस कार्य में सामाजिक संगठनों के साथ ही देश के धार्मिक संगठन भी बढ़ चढ़कर भागीदारी कर रहे है। अब तो ये नारे भी सुनाई देते हैं ‘देवालय से ज्यादा जरूरी है शौचालय’। यूनिसेफ के सौजन्य से और जीवा अर्थात ग्लोबल इन्टरफेथ वाश अलायन्स के बैनर तले देश के अलग—अलग धार्मिक समुदाय के प्रणेता शनिवार को एक मंच पर इकट्ठा हो रहे हैं, ताकि बेहतर पेय जल, सेनिटेशन एवं हाईजीन की उपलब्धता पर विस्तार से चर्चा किया जा सके । स्वामी चिदानन्द सरस्वती (परमार्थ निकेतन), मौलाना काल्बे सादिक (शिया विद्वान), ज्ञानी गुरबचन सिंह जी (अकाल तख्त के पूर्व जत्थेदार), लामा लोबज़ांग (अन्तरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ के महासचिव), आर्कबिशप डाॅ. अनिल जेटी क्युओटो (आर्कबिशप, दिल्ली के आर्कडियोसीज़) जैसे धार्मिक शख्सियत पहले भी परमार्थ आश्रम ऋृषिकेश में एक मंच पर आकर अपने अनुयाइयों को शौचालय और साफ—सफाई के महत्व पर जागरूक कर चुके हैं। पूर्व में प्राप्त अनुभवों को मीडिया एवं स्वच्छता के क्षेत्र में कार्य कर रहे लोगों के साथ साझा करने के साथ ही आगे की रणनीति पर भी दिल्ली के कार्यक्रम में चर्चा की जाएगी। इसके साथ ही ये धर्मगुरू अपने अनुयायियों को स्वच्छता एवं सेनिटेशन के महत्व के बारे में जागरुक करने की प्रतिज्ञा लेंगे।
जीवा से जुड़े धार्मिक संगठनों ने अगला सम्मेलन 29-30 अगस्त को लद्दाख में आयोजित करने का निर्णय लिया है। लद्दाख सम्मेलन का आयोजन महाबोधी इन्टरनेशनल मेडिटेशन सेन्टर में किया जाएगा, जिसमें विशेष रूप से लद्दाख क्षेत्र में इस पूरे क्षेत्र में शौचालय की समस्या, व्याप्त असमानता, अनुपलब्धता, व इस क्षेत्र से सम्बन्धित अन्य मुद्दों पर विशेष रूप से अल्पसंख्यक आबादी पर चर्चा की जाएगी। यदि लद्दाख के भौगोलिक स्थिति और स्वच्छता की व्यवस्था पर चर्चा करें तो यह क्षेत्र कठोर एवं सुदूर इलाका होने के साथ, लेह-लद्ददाख को भारत सरकार के द्वारा उन ज़िलों में से माना गया है जहाँ अल्पसंख्यक आबादी सबसे ज़्यादा है, इस दृष्टि से क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक आंकड़े राष्ट्रीय औसत से नीचे हैं। सेनिटेशन, पेयजल की आपूर्ति से सम्बन्धित राष्ट्रीय कार्यक्रमों की दृष्टि से भी इसकी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है।
परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष और जीवा के सह संस्थापक चिदानंद सरस्वती कहते हैं कि ‘भारत में पेयजल, स्वच्छता और हाईजिन की बहुत बड़ी समस्या है। ग्रामीण भारत में यदि शौचालय बने भी हैं तो लोग उसका इस्तेमाल नहीं करते। ऐसा या तो वे जागरूकता के अभाव में करते हैं या परंपरागत सोच के कारण। हम इसी सोच से लड़ रहे हैं । जीवा सम्मेलन के दौरान लोगों के सोच में बदलाव पर चर्चा की जाएगी।
चिदानंद कहते हैं कि हमारा लक्ष्य है कि हम लोगों को मेडिटेशन के साथ शौचालय के इस्तेमाल के फायदे पर जागरूक कर सके। प्रत्येक व्यक्ति को न सिर्फ ये बताये जाने की जरूरत है कि कैसे उनके शरीर मे खुले में शौच के कारण कीटाणु प्रवेश करते हैं बल्कि उन्हें यह भी जानना होगा कि यह जल प्रदूषण का बहुत बड़ा स्रोत है।
गौरतलब है कि लद्दाख सम्मेलन में विभिन्न क्षेत्रों के धार्मिक नेता, कोरपोरेट, मीडिया एवं स्थानीय लोग कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे जहाँ देश के पांच प्रमुख धर्मों के नेता लोगों को सम्बोधित करेंगे।


