पंचायत खबर डेस्क
देश में सूखे को लेकर त्राहिमाम हैं। सरकार बैठकों में व्यस्त है। जनसंघटन और ग्रामीण अपने—अपने स्तर पर जल संभरण का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन यदि बात आदिवासी गांव की हो तो आज भी आदिवासी सरकार से ज्यादा खुद की मेहनत और कौशल पर भरोसा करते हैं।
छत्तीसगढ़के आदिवासी गांव पीपरटोला में सभी आठ बोरवेल सूखने पर लोग पानी के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाकर थक गए। इसके बाद बैगा आदिवासियों ने तय किया कि गांव के पास पहाड़ खोदेंगे। 23 अप्रैल को 40 ग्रामीण (पुरुष-महिलाएं बच्चे) एकत्र हुए। दिन-रात ये पहाड़ खोदते रहे। इन चालीस लोगों का खाना-पीना भी साथ होता था। महिलाएं मिट्टी ढोतीं तो बच्चे जितनी मिट्टी हटा सकते थे, हटाने में मदद करते। 24वें दिन गीली मिट्टी निकली, 26 दिन बाद 45 फीट गड्ढे के बाद पानी रिसना शुरू हो गया। अभी खुदाई जारी है, ताकि खोदे गए कुएं की गहराई ज्यादा हो और आने वाली गर्मी में पानी की दिक्कत हो।

यह व्यवस्था और सरकार पर आदिवासियों का अविश्वास है
आदिवासी समुदाय की ऐसी कोशिशें बताती हैं कि वे अब भी अपने परंपरागत जीवनदर्शन से जुड़े हैं और परनिर्भरता की बजाय ‘स्वशासन’ पर विश्वास करते हैं. उसे अपने व्यवहार में लाते हैं. यह प्रयास व्यवस्था और सरकार पर आदिवासियों के अविश्वास की भी बानगी है. राजनीति में भी संख्या आधारित लोकतंत्र से बाहर रहकर ही वे अपना अस्तित्व बचा सकते हैं, जैसा कि वे करते आये हैं. परंतु यह तभी हो पाएगा जब वे अपने भीतर के ‘पढ़े-लिखे व्यवस्थालोलुप’ और ‘संस्कृताइज्ड’ हो चुके आदिवासियों को अपने प्रतिनिधित्व से हटा सकेंगे.
फोटो/कंटेंट: परमेश्वर डडसेना
