जड़ी-बूटी का प्रयोग कर कोरोना मुक्ति अभियान को राह दिखाते ये आदिवासी बहुल गांव,टीकाकरण साबित होगा बूस्टर डोज

मंगरूआ
पटना/रांची: एक तरफ कोरोना के दूसरे लहर में गांवों के कोरोना के संक्रमण के चपेट में आने की खबरे हैं वहीं कई गांवो ने स्वत: प्रेरित कोरोना मुक्ति अभियान की राह चुन अन्य गांव के समक्ष मिसाल पेश किया है।   इन दिनों योग गुरू बाबा रामदेव और देश के डॉक्टरों के बीच इस बात को लेकर तकरार है कि कोरोना के खिलाफ लड़ाई में आर्युवेद कारगर है या एलोपैथ। दोनो एक दूसरे को कमतर बताते हुए अपने—अपने दावे कर रहे हैं कि कोरोना के खिलाफ आम लोगों के जीवन बचाने में उनका योगदान ज्यादा है। लेकिन आईये आपको देश के उन आदिवासी गांवों की ओर ले चलें जहां के ग्रामीणों ने इस कोरोना महामारी के दौरान भी अपने परंपरागत जीवन शैली,बेहतर खानपान,परंपरागत औषधीय ज्ञान की बदौलत खुद को कोरोना महामारी के दूसरे जानलेवा अटैक में भी खुद को बचा कर रखा है।  इन गांवों में कोरोना का टीकाकरण अभियानके प्रति सजगता का अभाव थोड़ी चिंता भी पैदा करती है।                                                                                                                                                                                                        …..कोरोना मुक्ति अभियान

झारखंड के ये आदिवासी बहुल गांव
सबसे पहले चर्चा करते हैं झारखंड के बोकारो जिला मुख्यालय से लगभग 70 किलोमीटर दूर और जिले के कसमार प्रखंड मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर स्थित हिसिम पहाड़ पर बसे इन चार गांवों की। जहां न तो पहली लहर में और न ही दूसरी लहर में कोरोना का कोई पॉजिटिव केस दर्ज नहीं किया गया है। ये गांव हैं हिसीम, केदला, त्रियोनाला एवं गुमनजारा। वैसे तो इनमें से 3 गांव पूर्णत:आदीवासी आबादी वाले गांव है लेकिन सिर्फ हिसिम हुए हैं. ये सभी आदिवासी बहुल गांव है. तीन गांव (केदला, त्रियोनाला एवं गुमनजारा) तो पूर्णतः आदिवासी बहुल है लेकिन हिसिम गांव में आदिवासियों के साथ गांव की लगभग आधी आबादी गैर आदीवासी भी है जिसमें कुर्मी—महतो जैसी जातियों की बहुलता है। लेकिन चाहे आदिवासी हों या गैर आदीवासी इन आदिवासी गांवों में गांव के लोगों का रहना सहन आदिवासी बहुल गांवों के लोगों से मिलती जुलती ही है।                                                                                                       …  कोरोना मुक्ति अभियान
क्या है खास
एक तरफ कसमार गांव के ज्यादातर गांव कोरोना की चपेट में आ चुके हैं वहीं हिसीम पहाड़ के इन चार गांवो को कोरोना छू तक नहीं पाया है। ऐसा भी नहीं है कि ये सुनी सुनाई बाते हों और ग्रामीणों के दावे का कोई आधार न हो। सबसे बड़ा आधार तो यही है कि चिकित्सा विभाग के द्वारा हिसिम पहाड़ के इन चारों गांव में कई बार कोरोना जांच शिविर भी लगाया गया। अनेक लोगों के सैंपल लिये गए, पर बड़ी बात यह है कि उनमें भी कोई पॉजिटिव नहीं निकला।
यह सर्वविदित है कि वैश्वीकरण और शहरीकरण के इस दौर में भी दूर दराज के आदीवासी बहुल गांवों का प्रकृति के प्रति प्रेम और प्रकृति से उनका नाता बदस्तूर जारी है। आदिवासी बहुल गांवों का परंपरा, जीवनशैली, प्रकृति के साथ गहरा नाता एवं शुद्ध खानपान इन गांवों के निवासियों के बीच कोरोना से बचाव में सबसे बड़ा ढाल बना हुआ है। हिसिम पहाड़ी के इन गांवो के लोगों का कहना है कि ग्रामीणों की जीवनशैली, खानपान सब-कुछ मैदानी ईलाके के गांवो या गैर आदीवासी बहुल गांवों से अलग है। विशेषज्ञ भी ये दावा करते आये हैं कि कोरोना से लड़ाई में व्यक्ति के अंदर की सकारात्मकता, रोग प्रतिरोधक क्षमता सबसे बड़ी ढ़ाल है और इस महामारी के दौरान यही विशेषता इन ग्राम वासियों को कोरोना से बचने का आधार साबित हुई हैं। इन्हीं खासियत और मजबूत इच्छा शक्ति की बदौलत हिसिम पहाड़ी के ये चारों गांव और उनके निवासी खुद को कोरोना के प्रभाव से बचा पाने में सफल हुए हैं जबकी इसी प्रखंड के अन्य गांवों में कोरोना ने खतरे ने अपनी जड़ें गहरी जमा ली है।                                                                               …  कोरोना मुक्ति अभियान
चतरा जिले का सरिया टांड आदिवासी टोला
कोरोना प्रूफ गांवों में एक और नाम है उत्तरी छोटानागपुर क्षेत्र के चतरा जिले वैसे तो नक्सली उग्रवाद प्रभावित माना जाता है। चतरा जिले में स्थित कुंदा प्रखंड का जबड़ा पंचायत का सरियाटांड़ गांव। कोरोना के खतरे से अप्रभावित इस आदिवासी टोले के महिला—पुरूष, बच्चे कोरोना के इस महामारी के बीच भी गांव को बचाने में कामयाब रहे हैं। यह गांव दुर्गम ईलाके में है और बिना बात शायद ही कोई शहर बाजार या गांव से बाहर जाता हो। आम दिनों के लिए ये भले ही परेशानी का सबब हो लेकिन कोरोना के इस महामारी के दौरान जिस तरह सोशल डिस्टेंसिंग और बाहरी संपर्क से कटाव महामारी के रोकथाम का हथियार साबित हुआ। न कोई गांव से बाहर जाता है और न ही कोई बाहरी इस दौरान गांव में आया। पहाड़ पर बसे दुरूह गांव होने के कारण प्रशासन का हस्तक्षेप भी कम और बाहरी लोगों को पहुंचना भी मुश्किल। यही बात इनके लिए कोविड 19 के दूसरे दौर में भी कवच साबित हुई है। ग्रामीण कहते हैं कि हमारे गांव में कोरोना का खतरा नहीं है। बच्चे खुले में खेल कूद रहे हैं। पांरपरिक खान—पान और औषधियों का ज्ञान उनके खूब काम आ रहा है। यानी लगभग 100 घरों की आबादी वाले इस टोला में सभी स्वस्थ हैं। कोई परेशानी होने पर जड़ी-बूटी खाते हैं। मलेरिया और बुखार के लिए चिरयता, हड़जोड़, गिलोय, कोरकोरो की छाल, पपीते का पत्ता, नीम का पत्ता उबाल कर पीते हैं। पेट खराब होने पर बेल सहित पारंपरिक जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करते हैं। जरूरत पड़ने पर पारंपरिक जड़ी-बूटियों से इलाज करते हैं, खूब मेहनत करते हैं। स्वस्थ भी हैं। केवल इसी गांव में ही नहीं बल्कि इस इलाके के कई गांवों के आदिवासी तो कोरोना से भी अनभिज्ञ हैं। जबकी प्रखंड मुख्यालय और उसके आसपास के लोग कोरोना के दहशत के बीच दिन रात बिता रहे हैं।                                                                                     …  कोरोना मुक्ति अभियान


क्या कहते हैं पंचायत प्रतिनिधि
जबड़ा पंचायत के उप मुखिया लालदेव कुमार साव ने बताया कि इस आदिवासी टोला के लोग न तो कहीं बाहर जाते हैं और न ही बाहर के लोग यहां आते हैं। लगभग 100 घरों की आबादी वाले इस टोला में सभी स्वस्थ हैं। कोई परेशानी होने पर जड़ी-बूटी खाते हैं। मलेरिया और बुखार के लिए चिरयता, हड़जोड़, गिलोय, कोरकोरो की छाल, पपीते का पत्ता, नीम का पत्ता उबाल कर पीते हैं। पेट खराब होने पर बेल सहित पारंपरिक जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करते हैं। वे कहते हैं इन औषधियों और बाहरी आन जान पर रोक की वजह से कोरोना से गांव अभी तक बचा हुआ है और आगे भी बचा रहेगा।                                                                                     …  कोरोना मुक्ति अभियान
जमुई जिले के चकाई प्रखंड का बेहरा गांव
झारखंड से सटे बिहार का जमुई जिले आदिवासी प्रभाव वाले वन क्षेत्र के गांवों में कमोबेश यही स्थिती है। चकाई प्रखंड के चंद्र मंडी में बसे आदिवासी गांव भी कोरोना की दूसरी लहर के बावजूद को खुद को कोरोना प्रूफ बनाये रखने में कामयाब हुए हैं। यदि चकाई प्रखंड के बेहरा गांव की बात करें तो अभी तक इस गांव में कोरोना का कोई प्रभाव सामने नहीं आया है। झारखंड के आदीवासी बहुल कोरोना प्रूफ गांव की तरह ही इस गांव में भी ग्रामीणों ने वहीं तौर तरीके अपनाये हैं। शहर से पूरी तरह कट जाना। न बा​हरियों का प्रवेश और ग्रामीणों का शहर भ्रमण। ग्रामीण अनिल मुर्मू बताते हैं कि यदि कोई बाहर से गांव आता भी है तो उसे बिना कोरोना जांच के गांव में प्रवेश की अनुमती नहीं है। यहां भी झारखंड की तरह ही आदिवासियों का रहन—सहन,खान—पान, जड़ी बूटी युक्त दवा दारू के इस्तेमाल का परंपरागत और गांव की स्वच्छ हवा ने ऐसा कोविड कवच बनाया है गांव वाले पूरी तरह से कोरोना प्रूफ महसूस करते हैं।     …  कोरोना मुक्ति अभियान

इसी तरह आस पास के गांवों में भी ज्यादातर आदीवासी चिरैता,बेलपत्र, गिलोय, बेल पत्र, नीम, कोनिया साग और परंपरागत जड़ी बूटी के सहारे न सिर्फ अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बरकरार रखे हुए हैं। चाहे ईलाके का हरणी गांव हो या बेलखरी गांव इन्हीं परंपरागत उपायों की बदौलत ग्रामवासी कोरोना के प्रभाव से मुक्त हैं और इन गांवों में मेरा गांव कोरोना मुक्त का सपना जमीन पर उतरता दिख रहा है।
लक्ष्मीपुर का सुहिया तथा सिकंदरा का धधौर गांव कोरोना प्रूफ
ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ आदिवासी बहुल गांवों में ही बल्कि वैसे गांव जहां महादलितों की आबादी अच्छी खासी है इन गांवों ने भी स्वयं के जतन और परंपरागत रहन सहन को बढ़ावा देते हुए गांव को कोराना मुक्त बनाये रखा है। इतना ही नहीं बाहरी लोगों के गांव में आने वाले पर पहरे का इंतजाम किया गया है और बाहर से आने जाने वालों पर सख्‍त पहरा है। लोगों पर नजर रखी जा रही है।
कैसे सुरक्षित रहा सुहिया और सिकंदरा
कोरोना की दूसरी लहर फैलते ही जो आंकड़े सामने आये वो साफ ईशारा कर रहे थे कि भले ही पहली लहर में गांव सुरक्षित रहे हों लेकिन दूसरी लहर गांवो पर भारी है। बावजूद इसके आपदा के विगत 14 माह जिस तरह से मजबूती से मुकाबला इन दोनों गांवो ने किया है वह निश्चित रूप से प्रशंसनीय है। ग्रामीण कहते हैं शाषण की तरफ से कोरोना से बचाव के लिए जो सोशल डिस्टेंसिग का मंत्र दिया गया है यानी बेवजह बाहर आने जाने से बचना और यदि जाना भी पड़े तो कोरोना से बचाव के नियमों का अनुपालन। इसी का पालन करते हुए इस गांव के लोगों ने कोरोना संक्रमण की पहली लहर कमजोर पड़ने के बाद भी बेवजह घर से बाहर नहीं निकलने की रीत नीत का पालन किया। इसी का फायदा गांव वालों को मिला है कि विगत 14 माह में इन दोनों गांवो में कोरोना से संक्रमित एक भी मरीज सामने नहीं आये हैं।
इस तरह से जमुई जिले के सिकंदरा प्रखंड अंतर्गत 3500 की आबादी वाले धधौर गांव तथा लक्ष्मीपुर के 300 की महादलित आबादी वाले सुहिया गांव न सिर्फ ईलाके के अन्य गांवों के लिए मिसाल बन गया है बल्कि जिले और प्रदेश के अन्य गांव को भी मेरा गांव कोरोना फ्री का मिसाल बन कर सामने आये हैं। क्त इस गांव के लोगों ने बताया कि संक्रमण की लहर कमजोर पड़ने के बाद भी यहां के लोगों ने बेवजह घर से बाहर नहीं निकलने के नियम का पालन किया। जिससे गांव में महामारी के दूसरे लहर का असर नहीं हुआ।  …  कोरोना मुक्ति अभियान


टीकाकरण को लेकर सजगता का अभाव
ये बात सही है कि प्रकृति पूजक ये आदिवासी गांव अपने रहन—सहन और खान पान और जंगल से प्राप्त वनोपज यानी जड़ी बूटी की बदौलत अपना रोग प्रतिरोधक क्षमता बनाये हुए हैं और कोरोना के खिलाफ लड़ाई में उन्हें इन बातों का फायदा भी मिला है। लेकिन कोरोना से बचाव का सबसे पुख्ता तरीका टीकाकरण ही है और टीकाकरण को लेकर अभी भी इन गांवों में जागरूकता का अभाव दिखता है। लोग टीका लगाने से यह कहते हुए बच रहे हैं कि जब उन्हें बीमारी है ही नहीं तो टीका की क्या जरूरत। यह बात सही है कि शहर में बीमारी का प्रकोप ज्यादा है लेकिन गांव भी इससे अछूते नहीं हैं या उनमें संक्रमण का खतरा बना हुआ है ऐसे में बेहतर जीवन चर्या और रोग प्रतिरोधक क्षमता के साथ यदि कोरोना का टीका भी ले लिया जाए तो ये निश्चित रूप से बूस्टर डोज होगा और कोरोना का खतरा कम होगा।

…  कोरोना मुक्ति अभियान

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