
कैमूर: बेशक शिक्षा की तरक्की तालीम की गलियों से होकर गुजरती है। ऐसे में तालीम की गलियां अगर सकरी हो जाए तो सवाल उठेगा ही। कैमूर जिले में शिक्षा का मतलब कंधे पर झोला हाथ में थाली और कटोरा का कंसेप्ट है। वह भी तब जब सर्व शिक्षा अभियान पर करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी बच्चों को गुणवत्तापरक शिक्षा मिलती नजर नहीं आ रही है। खैर, यह हकीकत उस वक्त सामने आया जब पंचायत के मुखिया संजय मल्होत्रा ने विद्यालय का औचक निरीक्षण किया। सबसे पहले आठवीं की कक्षा में दाखिल होकर जब एक छात्रा से जिले का नाम पूछा तो उसने कैमूर के बजाय जिले का नाम बिहार बताइ। यही सवाल सातवीं के छात्र और छात्राओं से भी किया और किसी ने अपने जिले का नाम नहीं बताया। इसके बाद कक्षा 3 में जब मुखिया ने प्रवेश किया तो छात्रों से वन से से हंड्रेड तक की गिनती पढ़ने को कहा तो एक छात्रा इलेवन पर जाकर रुक गई।
आपको बता दें कि शिक्षा का यह स्तर उच्च विद्यालय का है जिस विद्यालय में छात्रों की अनुपातिक संख्या से शिक्षकों की संख्या बहुत ज्यादा है। यह विद्यालय है कैमूर जिले के दुर्गावती में स्थित उत्क्रमित कन्या मध्य विद्यालय खजुरा। विद्यालय में शिक्षकों की संख्या 15 है एक शिक्षक प्रतिनियुक्ति पर हैं। बच गए 14 शिक्षक। छात्र-छात्राओं की संख्या मात्र 440 है। जबकि सरकार प्रति 40 बच्चों पर एक शिक्षक का पैमाना मानकर चल रही है। लेकिन 14 शिक्षकों के एवज में इस विद्यालय में 560 छात्र होने चाहिए। इधर 440 छात्रों को पढ़ाने के लिए 14 शिक्षक इस विद्यालय में नियुक्त हैं। अब सवाल उठता है कि इतने अधिक शिक्षक होने के बावजूद विद्यालय में शिक्षा का स्तर इतना नीचे क्यों है। मुखिया ने यह भी बताया कि दोपहर 12:40 बजे मध्यान भोजन शुरू हुआ। आधे बच्चे भोजन किए और एमडीएम का भोजन खत्म हो गया। बिन भोजन किए आधे छात्र विद्यालय कैंपस में घूम रहे थे।
पूछे जाने पर प्रधानाध्यापिका मंजू कुमारी ने बताया कि आधे घंटे के भीतर खाना बन जाएगा। पर क्या यह जायज है। बच्चे जब विद्यालय में उपस्थित हुए सबकी उपस्थिति बनाई गई तो उस अनुपात में मध्यान्ह भोजन क्यों नहीं बनाया गया। बहरहाल उत्क्रमित कन्या मध्य विद्यालय खजूर कैमूर जिले के शिक्षकों का पहली पसंद है। इसके पीछे की असल वजह यह है कि सभी तो नहीं मगर बहुतेरे शिक्षक बनारस से आते हैं और खजुरा विद्यालय यूपी बिहार बॉर्डर पर है। शिक्षकों को आने जाने में सुविधा रहती है।

यही कारण है कि शिक्षा विभाग के अधिकारियों को मैनेज कर इस विद्यालय में जरूरत से ज्यादा शिक्षक नियुक्त हैं। जबकि दुर्गावती में 50 से अधिक ऐसे विद्यालय हैं जहां छात्रों की संख्या बहुत अधिक है और शिक्षकों की संख्या बहुत कम। किसी किसी विद्यालय में 100 छात्रों पर एक शिक्षक है। वहीं खजुरा विद्यालय में 30 छात्रों पर एक शिक्षक नियुक्त हैं। वैसे कैमूर में शिक्षा विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार किसी से छुपा हुआ नहीं है। डीओ डीपीओ कार्यालय में व्याप्त भ्रष्टाचार की जांच तत्कालीन डीएम डॉ नवल किशोर चौधरी ने एक टीम गठित कर किया था। लेकिन शिक्षा विभाग के अधिकारियों की पकड़ राजनीतिक गलियारों में अच्छी मानी जाती है। यही कारण है कि वह बच जाते हैं। आम लोगों की निगाहें बिहार में बनी महागठबंधन की सरकार पर है खासकर नए शिक्षा मंत्री पर।


