बदले हुए निजाम ने बदल दिया दिल्ली विश्वविद्यालय का नजारा

0
311

 

  • तदर्थवाद के दौर पर भारी दिख रहा है वीसी प्रो योगेश सिंह के स्थाई नियुक्ति का संकल्प
  • दिल्ली विश्वविद्यालय में चार हजार नियुक्ति, नयी शिक्षा नीति और पांच हजार से अधिक प्रमोशन
डॉ सीमा सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय

 

 

 

 

 

एक साथ, एक लक्ष्य और एक जुनून लेकर स्वतंत्रता को अंतिम लक्ष्य मानकर जब हम मैदान में उतरे तभी हमें सफलता प्राप्त हुई। विश्वविद्यालयों ने इस दौरान देश की चेतना को जागृत किया। विश्वविद्यालय के शिक्षकों ने युवा पीढ़ी के भीतर नयी चेतना और विचार का संचार किया। ‘‘कोई चरखा चलाता था वो भी आजादी के लिए, कोई विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करता था, वह भी आजादी के लिए, कोई कविता सुनाता था, वह भी आजादी के लिए। कोई किताब या अखबार में लिखता था वो भी आजादी के लिए। कोई अखबार के पर्चे बांटता था वह भी आजादी के लिए। ये बातें देश के प्रधानमंत्री नरेंद मोदी ने Develop India@2047 के लांचिंग के मौके पर कही।

जाहिर है हमारे प्रधानमंत्री जी समझते हैं कि युवा शक्ति साथ हो तो कोई भी लक्ष्य मुश्किल नहीं। इन्हीं युवाशक्तियों को गढ़ने के लिए प्रधानमंत्री ने 2014 से लेकर अब तक के कार्यकाल में कई प्रयास किये हैं। वो समझ रहे हैं कि चाहे कोई भी कालखंड हो इस युवा शक्ति के सहारे मुश्किल राहें भी आसान हो जाया करती हैं। छोटी—छोटी पहल भी जनअभियान का रूप ले लेती हैं और इन युवा शक्ति को गढ़ने में जिस पर किसी भी देश का भविष्य निर्भर होता है उस युवा को शिक्षित करने वाले शिक्षकों का भविष्य सबसे अधिक मायने रखता है। उनके जीवन का स्थायित्व देश के वर्तमान और भविष्य को और अधिक उड़ान देगा।

कुछ ऐसा ही नजारा दिल्ली विश्वविद्यालय सहित देश के अन्य विश्वविद्यालयों का है जहां तदर्थवाद से मुक्ति और स्थाई नौकरी की दिशा में पहल ने जन​अभियान का रूप ले लिया है। क्योंकि देश की युवा शक्ति को दिशा देने की जिम्मेदारी जिस शिक्षक समुदाय पर वही तदर्थवाद का शिकार लंबे समय से रहा है।

 

चाहे बात दिल्ली विश्वविद्यालय की हो या देश भर में रूकी हुई तमाम स्थायी नियुक्तियों पर। वर्तमान सरकार ने दस लाख लोगों को सरकारी रोजगार देने की दिशा में पहल किया और समय—समय पर रोजगार मेले का आयोजन कर खुद प्रधानमंत्री और उनकी पूरी सरकार लाखों लोगों को स्थाई रोजगार पाने के सपने को साकार कर चुकी है। दिल्ली विश्वविद्यालय सहित देश के तमाम विश्वविद्यालयों 2020 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू की गयी है। विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम को बदला गया और उसे समयानुकूल बनाया गया ताकि उनका भविष्य सुनिश्चित किया जा सके।

विद्यार्थी और शिक्षकों के बीच के अनुपात में जो खाई देखी जा रही थी उसे पाटने की दिशा में भी पहल हुए हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय भी इस पहल से अछूता नहीं रहा और दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने पांच हजार से अधिक सीटों को भरने का बीड़ा उठाया है। जाहिर है कोई भी समाज विद्यार्थियों का भविष्य उनके शिक्षकों के भविष्य से अलग कर के नहीं देख सकता है। शिक्षकों के जीवन की अनिश्चितता को दूर करने के लिए स्थायी नियुक्ति बहुत आवश्यक है। शिक्षा के क्षेत्र में लंबे समय से चली आ रही तदर्थवाद की व्यवस्था हमारी इन दोनों पीढ़ी के साथ खिलवाड़ था।

15 जुलाई 2023 तक चार हजार नियुक्तियां दिल्ली विश्वविद्यालय में अबतक हो चुकी है। जिनमें लगभग तीन हजार तदर्थ शिक्षक शामिल हैं जो कि स्थायी नियुक्ति पाने में सफल हुए हैं। करीब नौ सौ साथी रोस्टर में परिवर्तन के कारण बाहर हुए है। बाहर होने वालों मेें करीब 550 तदर्थ की नियुक्ति कहीं न कहीं हो चुकी है।

दिल्ली विश्वविद्यालय में समय से इंटरव्यू न होने के कारण बैकलाॅग निरंतर बढ़ता गया। नियुक्ति समय से नहीं होने के कारण ही आज यह दशा हुई कि एडहाॅक से कई साथी अपनी रिटायमेंट लेने को विवश है। अभी हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय में स्थायी होने वालों में चौसठ उम्र पार कर गए शिक्षक भी शामिल हैं। जीवन के इस उम्र में उनका स्थायी होना इस पूरे सिस्टम पर सवालिया निशान है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के वाइंस चांसलर प्रो. योगेश त्यागी ने यह बीड़ा उठाया और पिछले एक वर्ष में लगभग चार हजार स्थायी नियुक्तियां करवाई। अभी भी लगभग एक तिहाई इंटरव्यू होने बाकी है। इन वेकेंसिस पर एडहाॅक, गेस्ट और काॅन्ट्रेक्ट टीचर्स काम कर रहे हैं। वीसी ने कुछ दिन पूर्व नवनियुक्त शिक्षकों को एक स्थान पर एकत्र किया। वह दृश्य देखने योग्य था। स्टेडियम में बैठने का स्थान नहीं दिख रहा था। सभी कुर्सियों पर नवनियुक्त शिक्षक बैठे हुए थे। यह कार्य यदि समय पर हुआ होता तो आज की स्थिति नहीं होती। कितने ही लोगों का भविष्य इस गेस्ट और तदर्थवाद के चंगुल से मुक्ति पाने को छटपटा रहा था। कई पीढ़ियां गेस्ट और तदर्थ पद से रिटायर तक हुई। दिल्ली विश्वविद्यालय में एक विभाग ऐसे भी हे जहां 1991 के बाद स्थायी नियुक्तियां नहीं हुई है। ऐसी ही स्थिति कई विभागों में देखी जा सकती है।

किसी को इनका दर्द नहीं दिखाई दिया। ऐसा भी नहीं है कि इस दौरान शिक्षक संगठन सक्रिय नहीं थे लेकिन तदर्थवाद से मुक्ति का यह दौर राजनीति के भेंट चढ़ता रहा। पांच हजार से अधिक प्रोफेसर को प्रमोशन दिलाने को भी सफल कार्य वीसी के माध्यम से अबतक किया जा चुका है। कई नये विभाग भी इस दौरान खोले गये है जो भारतीय ज्ञान परंपरा को पोषित करने में सफल योगदान देते हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि दिल्ली विश्वविद्यालय का नजारा बदला-बदला सा प्रतीत हो रहा है और यह सुखद भी है। उम्मीद की जा सकती है कि देश के प्रधानमंत्री के संकल्पों पर खड़ा उतरने का जिस तरह का प्रयास दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो योगेश सिंह ने शुरू की है वही सिलसिला अन्य जगहों पर भी चल रहा होगा और बदलाव का इस बयार का लाभ शिक्षक और छात्र समान रूप से उठाने में कामयाब होंगे।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here