ढाई साल बाद भी गंगा में गंदगी उड़ेल रहे गांव

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सुरेंद्र प्रसाद सिंह

  • दो अक्टूबर 2019 तक देश के सभी साढ़े छह लाख गांवों को पूर्ण स्वच्छ बनाने का लक्ष्य है, लेकिन अभियान की गति बहुत धीमी है

 

नई दिल्ली: स्वच्छ भारत मिशन शुरू हुए ढाई साल बीत चुके हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों की हालत में बहुत सुधार नहीं हुआ है। गंगा के किनारे बसे गांवों तक को स्वच्छ बनाने की योजना पूरी तरह सफल नहीं हुई है। इस संबंध में पांच राज्यों और केंद्र के तीन मंत्रलयों की कोशिशें नाकाम साबित हो रही हैं। दस्तावेजों में बनी योजनाओं को गांवों तक पहुंचाने में सरकार और प्रशासन के पसीने छूट रहे हैं।स्वच्छता और पेयजल मंत्रालय पर इस पूरे अभियान को सफल बनाने का दायित्व है। वर्ष 2019 के दो अक्टूबर तक देश के सभी साढ़े छह लाख गांवों को पूर्ण स्वच्छ बनाने का लक्ष्य है। लेकिन अभियान की गति बेहद धीमी है और इसके चलते लक्ष्य को पूरा कर पाना मुश्किल नजर आने लगा है।  स्वच्छता मंत्रालय के साथ संबंधित राज्य सरकारों की हालत भी कमोबेश एक जैसी ही है। गंगा को प्रदूषण से मुक्त बनाने में जहां पर्यावरण मंत्रालय प्रयास कर रहा है, वहीं इस दिशा में जल संसाधन मंत्रालय का नमामि गंगे मिशन जोर लगा रहा है। घरेलू सीवर लाइनों की गंदगी और खुले में शौच से गंगा को बचाने के लिए पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय को लगाया गया है। यही मंत्रालय पूरे अभियान को सफल बनाने के केंद्र में भी है।

गंगा किनारे की 1,651 ग्राम पंचायतों के 5,169 गांवों को स्वच्छ बनाने का एलान बड़े जोर-शोर से किया गया। गंगा के ये गांव पांच राज्यों उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में फैले हुए हैं। लेकिन, किसी भी राज्य शत प्रतिशत सफलता नहीं मिल पाई है। सरकारी कोशिशें नाकाम साबित हुई हैं। इन गांवों को स्वच्छ बनाने की तारीख कई बार तय की गई और फिर आगे बढ़ाई गई। लेकिन, अभी तक यह कार्य पूरा नहीं हो सका है। स्वच्छता अभियान की इस गति से अगले दो सालों में समूचे देश को स्वच्छ बनाना आसान नहीं होगा। इसके विपरीत ग्रामीण विकास, पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय के आंकड़े एक अलग कहानी कहते हैं। देश के पांच राज्य पूरी तरह खुले में शौच मुक्त हो चुके हैं। इनमें हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और केरल प्रमुख हैं। लेकिन, इनमें कोई बड़ा राज्य आज तक शामिल नहीं हो सका है। स्वच्छता के प्रचार-प्रसार पर भले ही काफी जोर दिया जा रहा है। लेकिन उसके मुकाबले जमीनी हकीकत कुछ और ही है। स्वच्छता मंत्रालय सिर्फ राज्यों को धन आवंटित कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। राज्य सरकारों, संबंधित मंत्रलयों और विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल से ही यह संभव है। तालमेल के अभाव का तथ्य पहले भी सामने आ चुका है, लेकिन इसे अब तक दूर नहीं किया जा सका है। (दैनिक जागरण से साभार)

 

 

 

 

 

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