संतोष कुमार सिंह
नयी दिल्ली: चंद्रशेखर प्राण ऐसे व्यक्ति हैं वो उस काम को कर रहे हैं जिसे कोई नहीं कर रहा है। ये शब्द है पद्म श्री और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के चेयरमैन रामबहादुर राय के। रामबहादुर राय राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में तीसरी सरकार के जरिए पंचायतों के अधिकार के विषय में सतत रूप से लोगों को जागरूक कर रहे चंद्रशेखर प्राण के अभिनंदन समारोह में मुख्य अतिथी के तौर पर अपनी बात रख रहे थे।
उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश के पंचायतों में ठीक लोग चुन कर आएं, पंचायत प्रणाली में सुधार हो,इसके लिए वे लोगों को प्रदेश में घूम घूम कर सक्रिय करते रहे हैं। वे कितना सफल हुए यह बात अलग है। उन्होने कहा कि पंचायत व्यवस्था ठीक होगी, तभी राज्य व्यवस्था भी ठीक हो पाएगी। उन्होंने जेपी को याद करते हुए कहा कि ‘जेपी ने 1954—55 में राज्य व्यवस्था की पुर्नरचना नामक पुस्तक लिखी और नेहरू के पास भेज दिया। दोनों के संबंध बेहतर थे। इसके पश्चात नेहरू ने सबसे पहले मेहता कमिटी बनाई। उसकी पहली रिपोर्ट 57—58 में आई है। पहली बार 1993 में नरसिंह राव ने संसद में बिल रखा। इसके जरिए केंद्रीय स्तर पर पंचायतों के विकेंद्रीकरण का राह खुला। लेकिन ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर मेहता की रिपोर्ट के बाद इस दिशा में कारवाई क्यों नहीं हुई? ऐसा हुआ होता तो हमारी राज व्यवस्था जो उल्टे पिरामिड पर खड़ी है, वो सही रास्ते पर आ जाती। राज्य व्यवस्था गांव की ओर जाएगी,तभी पलायन रूकेगा। आज गांव उजड़ रहे हैं, न रहने की व्यवस्था है न रोजी रोटी का इंतजाम है। जब संविधान में इस तरह की बात उठी तो डॉ अंबेडकर ने कहा ‘गांव रहने लायक नहीं हैं।’
1948 में आज से कई गुणा बेहतर गांव होंगे, आज तो कई गुणा बुरे हालात हैं। सुधार की कोई गुंजाईश भी नहीं हैं। जादू की छड़ी घुमाएंगे और गांव सुधर जाएगें। आज जो पंचायत प्रणाली है,उसमें लगता है कि हम अपने को धोखा दे रहे रहे है। गांव के संबंध में, पंचायत प्रणाली के संबंध में खुद को धोखा दे रहे हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव हुए। बिहार में पंचायत चुनाव चल रहे हैं। खबर मिल रही है कि चुनाव जीतने के लिए करोड़ों रूपए खर्च हो रहे हैं। ऐसा लगता है कि पंचायत लूट का जरिया बन गया है। पंचायती राज के मूल में था कि गांव स्वावलंबी होंगे। गांव का अपना शासन होगा। 1993 में पंचायतों को यह अधिकार मिला कि वे 29 विषयों पर अपना फैसला कर सकती है। लेकिन जमीन पर हकिकत कुछ और हैं।
चंद्रशेखर प्राण के तीसरी सरकार अर्थात पंचायत अभियान को स्वाभिमान आंदोलन अपना अभियान बनाए तो पंचायत पटरी पर आ सकता है। स्वाभिमान आंदोलन यदि तय कर ले तो पंचायती राज प्रणाली को बेहतर बनाने में सफलता हासिल कर सकता है। आज पंचायती राज के सपनों के मुताबिक उस तरह की व्यवस्था बनाने की जरूरत है, जब सत्ता गांव से चले और दिल्ली आए। पैसा गांव से चलकर दिल्ली आए। स्वाभिमान आंदोलन की सार्थकता इसी बात में है कि वह इस दिशा में कदम उठाए।

